मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

दीपोत्सव


जुड़े पाँत से पाँत

माटी का दीया ,करदे जगमग आँगन , करदे सुवासित सबका मन और इस संसार को करे सुखी और  सम्पन्न !
 हरदीप कौर सन्धु और रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ताँका

1-डॉ हरदीप कौर सन्धु


दीपक होता 
है पर उपकारी
खाए अँधेरा
स्वयं को जलाकर
करता है उजाला
2
जला तू दीप
रोशनी माँगने की
न जरूरत
नहीं जलता दीप
आप के कहने से
3
जग त्रिंजण
रौशन ही रौशन
दीप से दीप
जुड़े पाँत से पाँत
दिल यूँ जुड़ जाएँ
-0-
चोका 
डॉ हरदीप कौर सन्धु
आई दीवाली 
जगमग रौशन
घर आँगन 
जब मिट्टी का दीया 
स्नेह बाती से 
परोपकार-तेल 
डाल जलाया 
दीए को माना 
जीवन का आदर्श 
शुभ संकल्प
कभी न माँगा 
अंधकार हमने 
दिव्य ज्योति से 
असंख्य दीप जले 
भीतर छाया
अज्ञान का तमस 
तेज पुंज से 
तिरोहित हो जाए 
बुहारो तुम 
ज्यों कर्म का कचरा 
जमा जो हुआ 
चेतना के आँगन 
मोह दीप की 
जला अखंड ज्योति 
कौन बुझाए !
आँधियों में भी जले 
दिव्य प्रकाश मिले !
-0-
2-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’
1-
आशा के दीप 
फैलाएँगे उजाला
भाव-नदी में
डूबेंगे तो तैरेंगे
ले आएँगे मोती भी
2
सूरज ढला तो
चन्दा से निकलेंगे
अँधियारों की
दुनिया बदलेंगे
बच्चों-सा मचलेंगे
3
पास न आए
कभी दुख की घड़ी
प्यार मुस्काए
दर पे लहराए
खुशी की फुलझड़ी ।

4

जब तक है
नेह बचा दीप में
करे उजाला
खुशी गले लगाएँ
आँच कभी न आए
-0-


चोका - होगा सवेरा
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
होगा सवेरा
ठान लो जो मन में
दिया जलाओ
मन के आँगन में ।
दिवाली सजे
व दिल में अँधेरा,
आए कभी क्या
द्वार पर सवेरा ?
ये ईर्ष्या सदा
अंगारे ही बिछाए,
बुराई नहीं
भलाई को जलाए ।
अपना खोए
नहीं कुछ भी पाए
चला जो यहाँ
संग लेके सभी को
पूजेगा जग
युग-युग उसी को ।
धरा पे दुखी
उन्हें गले लगाले,
नेह से भरे
दीपक जला ले
ये दुनिया सजा ले ।
-0-
3-प्रियंका गुप्ता






1
धरती पर
झिलमिलाते दिए
दीपावली के
काली रात में सजी
तारों की दीपमाला
-0-
4-डॉ  अनीता कपूर , कैलिफोर्निया (यूएस)
1
फुलझड़ियाँ
गूंथें रिश्तें सरस 
हर बरस
अनमोल सौगात 
दिवाली हर रात
2
मन पुलके 
सात सागर पार
दिवाली आई 
खुशबू अपनों की 
दीपमाला ले आई

3

रात रौशनी
सितारों के है साथ
खिलखिलाती
हँसती दिया बाती
मना दिवाली साथ
4
मिट्टी का दिया
प्रेम की भीगी बाती
लौ  ले प्यार की
सजा सुंदर थाली
शंखनाद दीवाली
5
हाथ मिलाये
अँधेरे से उजाला
जलाए दीप
बोला,कभी न हारो
दीप माला बना लो
-0-

5-डॉ भावना कुँअर
1      
आसमान से
टूट पड़ा झरना
नहाने लगे
बाग और बगीचे
जंगल में हिरना

6-ऋता शेखर मधु
1
ज्योत जो जली
हँस के दीप बोला
राज़ ये खोला-
जलने का न दुःख
पाऊँ रोशनी सुख
2
बुझने न दो
थरथराती लौ को
दे दो तो साया
अपने दो हाथों का
संबल वो बनेगा
3
सत्य का दीया
तप का डाला तेल
प्रकाश-पुँज
निकल के बिखरे
उसका नहीं मेल|
-0-
7-नीलू गुप्ता, कैलिफोर्निया (यूएस)
1
मंगलमय
दीवाली -दीप जग
तम हर लें
दीप ज्योति से सजे
अखंड भूमंडल
2
प्यार के नन्हें
फुलझड़ी-से फूल
झरें जग में
हो त्रासदी -भय
प्यार ही प्यार पले
3
रंग -बिरंगी
आतिशबाजी छूटे
प्यार के रंग
रुपहले बिखेरें
धरा -गगन सजें
-0-
8-मुमताज-टी एच खान
1
रहे रौशन
चिराग़ ख़ुशियों का
आपके द्वार
रिमझिम बरसे
सुखभरी बौछार
-0-

9 -डॉ श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’

1
अँधेरा घटा
विश्लेषित किया क्या
इस बात को
फिर क्योंकर  जले
तेल -बाती रात को
 2
कहाँ से लाऊँ ?
रोज़ नई कहानी
नहीं मिलती
वो जो प्यार  सिखाए
तुम से बतियाए
-0-

 ***************               *****************                   *****************       **************

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

1-टिप्पणी के लिए सूचना


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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

कौन चाहेगा ?


डॉ हरदीप कौर सन्धु
कौन चाहेगा 
  मन को यूँ रुलाना 
इन आँखों में
आँसुओं को बसाना
दर्द देता है
जब यह  ज़माना
बन जाती हैं 
तब ये डरी आँखें 
दर्द से भरे
आँसुओं का ठिकाना 
भीगी अँखियाँ
छल-छल छलकीं
जग छलावा
ये अब देखने के 
काबिल हुईं 
इन आँखों में कभी
आँसू न लाना 
जीने न देगा यहाँ
तुझे ज़माना
कोई पोंछे न पोंछे 
आज ये आँसू
तो कोई गम नहीं
आज के बाद 
देखोगे  साफ़-साफ़ 
यह ज़माना 
कभी भी न तिरेंगे 
आँखों में आँसू
ये तरल नयन 
बनेगे अब 
हिम्मत का ठिकाना 
देखेगा ये ज़माना !

-0-
(सभी चित्र गूगल से साभार)

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

पीर जो पली


डॉoउमे महादोषी
1.
पीर जो पली
अन्तस में गहरे
आँख में भली
सम्हाल रे मन तू
दिल की ये गगरी!
2.
रहा न पता
डाकिया भटकता
वापस हुआ
पत्र वो पढ़ूँ कैसे
लिखा था जिन्दगी ने!
3.
पाई पिता से
सौंपूँ पुत्र को कैसे
विरासत वो
मैं अनुगामी साया
वो नायक नभ का!
4.
गिद्ध कहता
हंस का चोला मेरा
कौआ ऐंठता
फड़फड़ाता पंख
देखता चिड़ियों को
5.
बाज उड़ते
आका में अनेक
दिखता एक
दुनिया नहीं होगी
बाजहीन कभी भी!
-0-

चाँद तराशा



सुप्रीत कौर सन्धु
1
तारे बिखरे 
जब चाँद तराशा 
ज्यों हीरे मोती
टूटकर बिखरे
टिम-टिम करते 
2
सिर झुकाए
लाल फूल लगाए 
ख्यालों में खोई 
वहाँ खड़ी देखूँ मैं 
बरसात बारूदी 
3
गर्म हवाएँ
हमको यूँ सताएँ 
गर्मी की रातें 
मच्छर तान छेड़ें 
सारी रात जगाएँ 
-0-

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

बिखरा मन


डॉ0अनीता कपू
1
 डँसता रहा 
 अतीत अब तक
परछाई-सा
कराहती जिन्दगी 
फसाना बन गई
  
2
बिखरा मन
सर्द-सी हुई सोच
बिखरा तन
सर्द-सी हुई देह
आसमान गीला था
      

डॉ अनीता कपूर 
फ्रीमोंट सिटी ( यू. एस. ए)

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

चाँद माथा तुम्हारा

1
दिल में छेद
बन बाँसुरी बहे 
दर्द की  नदी
समझेगा भी कौन
जीवन बना मौन ।
2
तुमने बाँचा
आखर हर साँचा
जो न पढ़े
समझेगा वो कैसे
गहराई मन की ।
3
तुमको कहूँ
रब या मनमीत
खिंची हो बन
तुम भाग्य- रेखाएँ
दिल की हथेली पे
4
पथ दुर्गम
साथ रहना तुम
हाथों में हाथ
थामे दिन औ’ रात
जब तक जीवन
5
कुछ न दिया
हमने किसी को भी
दर्द के सिवा
पाना चाहा जो नूर
हो गया वह दूर ।
6
रिश्तों के नाम
होते तो हैं अनेक
उगते सभी
प्रेम उपवन में
भाव भरे मन में
7
नाम क्या दे दूँ
प्रेम होता अनाम
धरा से नभ
इसका है विस्तार
जीवन का है सार

8
हम न होंगे
जब इस जग में
बचा रहेगा
स्पर्श  मधुर तेरा
भोर की हवाओं में ।
9
छूने दो आज
अधरों से जीभर
अमृत झरा
चाँद माथा तुम्हारा
कतकी पूनो खिली

10
घिरते रहे
उदासियों के मेघ
बरसे सदा
छूटे जब अपने
टूटे जब सपने

11
शातिर लोग
मीठा जब बोलते
याद रखो कि
ज़हर वे घोलते
मुस्कान बिखेरते
    *****
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु '

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मिले किनारे



                       पूरा पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक कीजिए ]        

                              मिले किनारे 

                                       ताँका - चोका संग्रह 

                                रामेश्वर काम्बोज' हिमांशु ' / डॉ.हरदीप कौर सन्धु 
                                              संस्करण - 2011
                                                     

काम्बोज जी से व्यक्तिगत परिचय बरेली आने पर आज से 24 वर्ष पूर्व हुआ | इनकी रचनाओं  से मैं पहले से ही परिचित था | लघुकथा , कविता ,व्यंग्य , समीक्षा , लेख आदि  सभी में इनकी पकड़ सदा समाज की नब्ज़  पर रही है | सामाजिक सरोकार कभी भी इनकी रचनाओं से ओझल नहीं हुए |

         हाइकु 1986 से लिख रहे थे , लेकिन उस समय जिस तरह की रचनाएँ आ रही थीं , ये उनसे संतुष्ट नहीं थे | ' मिले किनारे ' संग्रह के ताँका और चोका रचनाओं में भी इनके वही सामाजिक सरोकार , वही अनुभूति की ईमानदारी , वही बेबाक अभिव्यक्ति दिखाई देती है , जो इनके जीवन का भी अटूट हिस्सा रही है |मैंने इनको शिक्षक एवं प्राचार्य के रूप में भी निकटता से देखा है |ये जीवन और साहित्य में एक ही जैसी क्षमता से कार्य करते नज़र आते हैं |इनके चाहे ताँका  हों या चोका , वे व्यक्ति और समाज के दुःख -सुख के साक्षी ही नहीं , भागीदार बने दिखाई देते हैं| पर-दुखकातरता की इनकी विशेषता एक ओर इनकी भावभूमि है तो भाषा पर मज़बूत पकड़ , सार्थक शब्द -चयन  में इनकी परिपक्वता और क्षमता भाषा -संस्कार के रूप में हर पंक्ति में दृष्टिगत होती है |पाठक इनकी रचनाओं को पढ़कर इन्हें जान सकता है ,इसमें दो राय नहीं है |

                                                          ------- सुकेश साहनी


यह सुखद है कि हिन्दी जगत में ‘हाइकु’ के पूर्णत: प्रतिष्ठित एवं समादृत होने के पश्चात् अब जापान की अन्य काव्य शैलियों-ताँका ,चोका, हाइगा की ओर रुझान बढ़ रहा है ।

डॉ हरदीप कौर सन्धु एक ख्यात हाइकुकार हैं और नवीन प्रयोगों में रुचि रखती हैं।प्रस्तुत संग्रह ‘मिले किनारे’ में उनके एक सौ ताँका और ग्यारह चोका  कविताएँ संगृहीत हैं । ‘ताँका’ में उन्होंने ग्राम्य जीवन और लोक संस्कृति के ऐसे अनूठे चित्र उकेरे हैं,जिन्होंने उनकी कविता को एक नई ताज़गी प्रदान की है । आंचलिक शब्दों के प्रयोग ने कविता में अपूर्व माधुर्य एवं विश्वसनीयता भर दी है । उनकी रचनाओं में रिश्तों की पावन महक-विशेष रूप से माँ के प्रति लगाव  दर्शनीय है! डॉ सन्धु के ताँका आर्जव , माधुर्य एवं लालित्य से भरपूर हैं।

           चोका कविताओं में तारत्म्य और नैरन्तर्य  बना रहता है;जो चोका का विशेष गुण है, साथ ही आन्तरिक लय भी है । ‘गुलमोहर’ , ‘वसन्त ॠतु’, ‘तेरी ख़्वाहिश’ ,’रब की चिता’, ‘अपना घर’ और  ‘रब जैसी माँ’ शीर्षक चोका  कविताएँ विशेष मोहक बन पड़ी हैं ।

 -डॉ0 सुधा गुप्ता

पवित्रा एकादशी 9 अगस्त ,2011



मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

वो रूठा ऐसे


 डॉ. हरदीप कौर सन्धु
1. 
हुआ सवेरा 
लो उड़ गए पाखी 
मार उड़ारी
दूर ऊँचे गगन 
पहले ही मुझसे !


2.
चाँद - चाँदनी
करे मुझसे बातें 
मेरी तन्हाई 
खामोश अँधेरे में 
छुप-छुप आँचल !


3. 
दिल चाहता 
रहे करीब कोई 
मैं रूठ जाऊँ
जग रूठा ज्यों लगे 
वो मुझको मनाए !

4 .

वो रूठा ऐसे 
मैं रही मनाती 
वो नहीं माना
सपनों में बताऊँ 
उसे मन की बातें !


5 .
मन त्रिंजण
काते प्यार किसीका 
वो नहीं जाने 
दिल चीर दिखाया 
बिखरा रेशे -रेशे !

***************

श्रम के बल


1                                                                                                           

बरसे मेघ
मन मयूर नाचा
हुआ विभोर
पुलकित हवाएँ
आनंदगीत गाएँ।

  
2

तृप्त हो मन
मिटती भूख सारी
बिठा के पास
जब अम्मा परोसे
अपने हाथ रोटी।


3

बोल न पाये
हँस के जतलाये
अपनी खुशी
बच्चे की किलकारी
लगे बहुत प्यारी।

4

गिरना तो है
उठने का अभ्यास
न हो उदास
गिर के उठते जो
शिखरों को छूते वो।

5

श्रम के बल
कामयाबी के ध्वज
जो फहराते
नई इबारत वो
जग में लिख जाते।


....सुभाष नीरव