रविवार, 20 सितंबर 2020

934

1-मंजूषा मन

1

ये आँखें भर आईं

तुमने प्यार -भरी


बातें जो दुहराईं।

2

छलकीं आँखें मेरी

तड़पाएँ  मन को

प्रियवर यादें तेरी।

3

छाए हैं मेघ घने

स्वप्निल पावस की

आशा का स्रोत बने।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

1

यूँ तुम बिन जीते हैं 


ज़हर जुदाई का

हर पल हम पीते हैं। 

2

क्यों ये मजबूरी है

अब तो आ जाओ 

तड़पाती दूरी है।

3

कब तक ग़म खाएगा

रात ढली दिल की

वो अब ना आएगा।

4

अँधियारा है जीवन

सूरज सम आओ

तुम लेकर रूप- किरन।

5

ये बदरी जो छाई

रिमझिम बनकरके

यादें  लेकर आई 

6

कुछ घाव निराले हैं

दूर नहीं होते

ये गम के छाले हैं।

7

प्रति पल ही रुदन करे

प्रिय बिन विरहन का

मन कैसे धीर धरे !

8

साँसें ये बिखरी हैं 

निस दिन नाम जपे

पीड़ाएँ निखरी हैं ।

-0-

सोमवार, 31 अगस्त 2020

933-यादें


यादें
मीनू खरे

काले गहरे 
साँसों पे भी पहरे 
है मुलाक़ात 
अब नामुमकिन 
तू ऐसा कर !
ख़्वाब में  के मिल...
याद करके 
सो गई हूँ मैं तुझे
रोज़ की तरह ही!!!

शनिवार, 22 अगस्त 2020

932

 1-तुम’ 

डॉ. पूर्वा शर्मा

‘मैंने तुम्हें दबाकर रखा है’- इस बात का मुझे भली-भाँति ज्ञान है । मैंने तुम्हें
बाहर निकलने का कोई अवसर नहीं दिया, पर क्या करूँ ! मेरी भी मजबूरी है । यदि तुम्हें किसी ने देख लिया , तो सब जान जाएँगे कि माज़रा क्या है ! दरअसल तुम तो हरपल मेरे साथ ही हो, दिखो या न दिखो तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । वैसे
तुमको छुपाकर रखना कोई आसान कार्य नहीं । पल-पल सहना पड़ता है, तिल-तिल
बहुत जलना पड़ता है । हृदय में उठी असहनीय पीड़ा एवं तेज़ कंपन के बावजूद भी तुम्हें छुपा लेने का कारण मेरे इतने वर्षों का अभ्यास ही है कि तुम्हें कोई देख नहीं पाता । हाँ, कई बार कोई संवेदनशील व्यक्ति सामने आ जाए तो वह तुम्हारे होने का एहसास भाँप लेता है, लेकिन इनसे बचने के अनेक उपाय भी मैंने खोज रखे हैं - नज़रें झुका लेना, मुँह फेर लेना या थोड़ी दूरी बना लेना इत्यादि । कई बार बहुत कठिन होता है यह सब करना, किन्तु तुम्हें इस ज़ालिम दुनिया से छुपाने में मैंने महारत हासिल की है । सच कहूँ तो तुम्हीं मेरी ताकत हो । वैसे तुम भी बड़े होशियार हो ! सबके जाने के बाद, धीरे से एकांत में....... तुम बिन बुलाए ही चले आते हो, पता नहीं कैसे, पर तुम इस बात का अंदाज़ा लगा लेते हो कि अब कोई नहीं है तुम्हें देखने वाला । तुम नैनों के कपाट खोल बहुत ही तेज़ रफ़्तार से बाहर चले आते हो, तुम्हारे बाहर आते ही तुम्हारा ‘यह घर’ गुलाबी और फिर धीरे-धीरे सुर्ख लाल हो जाता है । हर बार सबसे छुपने वाले, सामने न आने वाले ‘तुम’ ; अबकी बार
रुकते नहीं, नैनों से कपोल और फिर न जाने कहाँ-कहाँ तक का सफर तय करते हो । कई बार हथेली, तो कभी तकिया, तो कभी कहीं ओर..... मेरा रोम-रोम भीगोकर, सब कुछ नम-सा कर जाते हो । बहुत मुश्किल से तुम्हें बाहर आने की आज़ादी मिलती है, तो तुम इस बाहर की दुनिया में जी भरकर घूमते हो, अनवरत बहते ही रहते हो । ऐसे समय पर तुम्हें रोकना मेरे बस की बात भी नहीं, मेरे मन में भी यही सोच उठती है कि कोई नहीं देख रहा तो छककर, पेट भरकर तुम इस बाहरी दुनिया का मज़ा ले लो । एक कमाल की बात है कि अपना निश्चित समय बिताने पर तुम फिर से वहीं छुप जाते हो, इस बाहरी दुनिया से गुम हो जाते हो और फिर से इन नैनों की कैद में चुपचाप जाने के लिए तैयार .... । दूसरी कमाल की बात यह है कि बाहर तो तुम घूमते हो , लेकिन उसका सुकूँ मुझे मिलता है ,जैसे इस हृदय के घावों पर तुमने कोई जादुई  लेप लगा दिया   हो । वैसे अच्छा ही है तुम सबके सामने बाहर नहीं आते, तुम्हीं तो मेरी जादुई  शक्ति हो ; जो मुझे अंदरूनी ताकत देती है और मजबूत बनाती है । बस सफलता इसी में हैं कि तुम्हें सहेजकर, छुपाकर अपने नैनों में रखा है । जहाँ कोई भी तुम्हें देख नहीं पाता ।
 नहीं दिखते,
एकांत में रिसते
जादुई मोती ।
-0-
2-सन्ताप भार
रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

"इक अम्बर का ही सहारा था....वो दूर क्या गया....सब कुछ बिखर गया...."
"भूमि ये भार क्यों सहती है बेटी! कहीं कुछ भी नहीं बिखरा....हाँ टूटा ज़रूर है....
एक सहारे की उम्मीद ही है, जो तोड़ रही है तुझे.....खुद को मजबूत बना
वरना इस तरह से बिखरेगी कि फिर कभी खुद को समेट नहीं पाएगीजिसे आना ही नहीं इस गली....उसके लौट आने की आस में दरवाजे की चौखट पर खड़ी हो ,उसका रास्ता ताकने की बजाय खुद के अन्दर भी देख कभी....! तुझमें ही वो इक जज्बा है....,जो देगा मुश्किल हालात से लड़ने की शक्ति अपार...जो ले कर जागा तुझे हर बाधा के पार....
ये अकेलेपन का दु:क्यों ???
इस बोझ के तले मन क्यों दबा हुआ है तेरा ???
तू अकेली कहाँ है....,तेरी हिम्मत हर पल तेरे साथ है बेटी...
जरूरत है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ खुद को पहचानने की....!

संताप-भार
दबा जाता हृदय
निकल पार ।
-0-

सोमवार, 10 अगस्त 2020

931

 ज्योत्स्ना प्रदीप 

1

सोई   आँखें   मूँदें

छोड़  गई  मन  माँ 

ग़म की अनगिन बूँदें ।

2

जो  हमको समझाती 

जिसने जनम दिया 

इक दिन वो भी जाती !

3

बिन नींदों  की  रैना 

तेरे जाने से 

भरते  रे  घन-नैना 

4

कैसी लाचारी थी 

आँखों  की पीड़ा 

होठों न उतारी थी !

5

माँ जैसा कब  कोई 

तेरी  छाँव   तले 

मीठी  नींदें   सोई ।

6

मुरझाई तुलसी है 

तेरी छाँव  नहीं 

श्यामा भी झुलसी है ।

7

कुछ अपनों को लूटें 

फ़ूलों  की क्यारी 

कुछ  ज़हरीले  बूटे ।

8

वो घर  था  माई  का 

जब वो  छोड़  चली 

घर  है अब  भाई  का ।

9

हर  बेटी  रोती   है 

मात -पिता के  बिन 

मैके  ग़म  ढोती  है ।

10

मैका अब छूट  गया 

पावन नातों  को 

लालच  ही लूट गया !

11

अपने ही छलते हैं 

दीपक के भीतर 

अँधियारे पलते हैं ।

12

कुछ  ख़ास मुखौटे थे 

आँखों की चिलमन 

सोने   के   गोटे थे 

13

धन का आलाप करें 

इसकी ही ख़ातिर 

'अपने 'ही पाप करें ।

14

जिसने दौलत लूटी 

करतल खाली थी 

काया जब भी छूटी !

15

वो  प्यारा नग दे दो 

छू लूँ पाँवों  को 

पावन वो पग दे दो !

-0-

शनिवार, 8 अगस्त 2020

930

 सुदर्शन रत्नाकर

1

बहती तेज़ हवाएँ

बूँदों  से मिलके

मन में आस जगाएँ।

2

लोगों से मत डरना

तेरे बिन साजन

अब जीकर क्या करना।

3

चुप-चुप क्यों रहते हो

मन की बात करो

कितने दुख सहते हो

4

झूम रहा बादल है

मिलने को आतुर

यह दिल तो पागल है।

5

ऊँची दीवारें हैं

तुम बिन सूना घर

बेकार बहारें हैं।

6

फूलों की क्यारी है

बेटी बोझ नहीं

वो सब की प्यारी है।

7

काजल तो काला है

केवल ईश्वर ही

सबका रखवाला है।

8

छाया अँधियारा है

मत घबरा साथी

आगे उजियारा है।

9

आँसू या मोती हैं

चाँद चमकता है

रजनी क्यों रोती है।

1

समय बुरा आया है

अपने ही घर में

अब क़ैद कराया है

-0-

सुदर्शन रत्नाकर

मोबाइल-9811251135

 

 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

929-दो शुभाशीष!

रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'


हर साल मेरा जन्मदिन आने से पहले ही कितनी दफा पूछा करते थे आप
"बेटी तुझे क्या चाहिए अबकी बार ?
दुनिया की हर चीज तेरे पापा तेरी खुशी के लिए तुझे दिला सकते हैं....
और मैं....
मैं हर बार आपके गले लगकर यही कहती
"मुझे मेरे पापा चाहिए....
मेरे प्यारे पापा....
जो मेरे लिए मेरी पूरी दुनिया हैं...."
"मैं हूँ ना हमेशा तेरे साथ बेटी....
देख....
वैसे तो तू रश्मि है....
मगर किसी भी राह पर चलते हुए तू कभी अँधेरों में भटक गई तो उस वक्त तेरे पीछे मैं जुगनू, दिया, सूरज या तारा बनकर हमेशा तेरे पीछे-पीछे चलूँगा....
तुझे रास्ता दिखाने को....
तुझे तेरी मंजिल तलक ले जाने को....’’
तो फिर आज मेरी खुशी के लिए मुझे वही तोहफा दीजिये ना ?”
कीजे रौशन
जगा आशीष-ज्योति
मेरा जीवन!
आपके जाने के बाद आज यह मेरा पहला जन्मदिन है मैं आपके बिना किस तरह मनाऊँ ?
बताओ ना पापा....
कौन लाएगा इस बार मेरे लिए केक ?
कौन मुझे मेरी पसंद का तोहफा दिलाएगा ?
पापा....
मेरी आँखें आपको देख नहीं सकतीं....
मगर मुझे अहसास है....
कि आप यहीं हो मेरे आस-पास....
मुझे रोता छोड़ कर आप कहीं जा ही नहीं सकते
आपका दिल भी आज रो रहा होगा मेरी आँखों में आँसू देखकर....
मुझे यकीन है कि आप मेरी खुशी के लिए आज भी मेरे जन्मदिन पर वही तोहफा दोगे जो मुझे चाहिए....
मैं जब तक जियूँ....
अपना हाथ मेरे सर पर सदा बनाए रखिगा....
मेरे प्यारे पापा....
अपने शुभाशीष की रौशनी आप स्वर्ग से निरंतर मुझे दिखाते रहिगा,ताकि मैं ज़िंदगी की इन अँधियारी राहों में भटकने न पाऊँ कभी....
पिता की तस्वीर के आगे नतमस्तक हो रश्मि मन ही मन उनका आशीर्वाद माँगती है-
झुका ये शीश
आपके चरणों में
दो शुभाशीष!
"आपके चरणों में आपकी बेटी का कोटि कोटि नमन!"
-0-

सोमवार, 27 जुलाई 2020

928-एक पत्र, ईश्वर के पते पर


माँ के जन्मदिन पर उनके नाम एक पत्र, ईश्वर के पते पर
-अनिता ललित

मेरी प्यारी माँ,
                ढेर सारा प्यार,
आज २७ जुलाई, आपका जन्मदिन है! ईश्वर का कितना भी शुक्रिया अदा करूँ कम है –कि उसने आपको इस धरती पर भेजा! मैंने आपकी कोख़ में अपनी पहली साँस ली, फिर आपके स्नेह की छत्रछाया में पली-बढ़ी और मुझे आपको ‘माँ’ कहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ!          
आपको अपने शब्दों में उतारना मेरे लिए सदा से ही बहुत कठिन रहा है! आप इतनी ख़ूबसूरत, स्नेहमयी, सरल, सहज, सीधी-सादी, दृढ़ इच्छाशक्ति वाली तथा साफ़ एवं पवित्र मन की स्त्री थीं कि आपके जैसा दुनिया में कोई दूसरा होना ही मुश्किल है! मेरे लिए तो सच में ही, ईश्वर यदि कहीं था, तो वह आपके ही रूप में था! मेरे हिस्से का कोई भी कष्ट शायद आपके रहते मैंने कभी अकेले नहीं सहा –मुझसे पहले आप उसे अपने ऊपर ले लेती थीं! मैं तो चिड़िया के बच्चे की तरह हमेशा ही आपके डैनों में सुरक्षित थी! मगर कब तक ... जाना तो हर आने वाले को होता है, यह बात स्वीकारने में मुझे थोड़ा वक़्त लगा था!
शरीर से आज आप हमारे बीच नहीं हैं, मगर सच तो यह है कि आपको मैंने कभी अपने से दूर महसूस ही नहीं किया! आप कल भी मेरे दिल में थीं, आज भी हैं और सदैव रहेंगीं!
         पता है माँ! आज जब बच्चे मुझे किसी-किसी बात पर कहते हैं कि ‘वाह! माँ! एकदम नानी वाली भिन्डी बनाई है! म्मम्म...क्या स्वाद है!’ या  ‘माँ! तुम बिल्कुल नानी की तरह खाने में लाड़ दिखाने लगी हो!’ या ‘माँ! तुम बिल्कुल नानी की तरह ही सीधी-सादी हो, थोड़ा तो चालाक बनो!’ ... तो कभी-कभी तो मुझे भी ऐसा लगने लगता है कि मैं आपके जैसे होती जा रही हूँ! तब मुझे बहुत गर्व महसूस होता है कि चलो, मैं कहीं तो आप -सी हूँ! जैसे अच्छे संस्कार और विचार आपने मुझे दिए, वैसे ही मैं अपने बच्चों को भी देती रहती हूँ! आपने हमेशा मुझे यही सिखाया कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं! तुम्हारे कर्म ही तुम्हारी पहचान हैं! –बस यही बात मैंने गाँठ बाँध ली है, और बच्चों को भी यही समझाने की कोशिश करती हूँ!
        वैसे तो मैं सदैव आपको अपने क़रीब पाती हूँ! मगर पता है माँ! आपकी कमी सबसे ज़्यादा कब खलती है? –तब, जबकि किसी से अपने दिल की बहुत अंतरंग बात करनी हो -जैसे मैं और आप हमेशा करते थे न! –वैसे ही! मगर ईश्वर ने उसका भी उपाय कर दिया है –आपकी नातिन, यानी मेरी बिटिया! उसने भी तो आपसे उसी तरह प्यार किया है, जिस तरह मैंने किया है! बल्कि कभी-कभी तो उसे मुझसे भी अधिक आपकी चिंता रहती थी! अब शादी के बाद वह अपने घर में है, मगर दूर से ही सही, वह भी बिल्कुल आपकी ही तरह मेरा ख़याल रखती है, मुझे मेरी बेवक़ूफ़ियों पर टोकती है, मुझे समझाती है, आपकी ही तरह मेरे आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती है! मेरे एक शब्द से या अक्सर बिना कहे ही मेरे दिल की परेशानी को भाँप लेती है! कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मेरी एक नहीं दो-दो माँ हैं! 
आज और हर दिन, मेरी यही प्रार्थना है कि आप सदैव ईश्वर के सानिध्य में, उनकी गोद में रहें –हर दुःख, हर तक़लीफ़ से दूर! वहीं से अपना स्नेहाशिर्वाद हम सबपर हमेशा-हमेशा बनाये रखिये!

दूर हो तो भी
सदा साथ रहती
माँ नहीं खोती!

मन की बातें
जो माँ से थी करती -
बिटिया बाँटे!
-0- अनिता ललित ,1/16 विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ 226010



शनिवार, 25 जुलाई 2020

927


रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'
1
"धरा! एक अवसर उसे देना चाहिए,
माना कि उसने गलत किया; मगर उसे अहसास भी तो है अपनी गलती का, माँग रहा है माफी, फिर  क्यों नहीं उसे एक बार माफ़ कर देती
"हाँ शायद माफ़ कर देती , अगर मैं कर पाती; पर जो उसने किया, कितना दुखा था मन, जब उसने मुझे निकाल फेंका था अपने मन सेउसे माफ़ करने की गवाही अब मेरा मन देता ही नहीं,



धोखे का शूल
चुभा, मुरझा गया
प्रेम का फूल

-0-
2
"मन की
 मिट्टी में मैंने भरोसे का बीज बोया,
एक रिश्ता अंकुरित हुआ, प्रेम के खाद-पानी से दिनों-दिन उसका स्वरूप बढ़ा,
मैं बेहद खुश थी वो हरियाली देख कर,
पता ही नहीं चला कि.....
जिसे इतनी मेहनत से सींचती रही....
सम्बन्धों के उस शजर में....
कब अविश्वास की दीमक लग गई,
खोखला होकर धराशायी हो गया वह पेड़,
दुबारा क्या यह हरा भरा हो सकेगा ? तुम ही बताओ?


क्यों कटी डाल
रोते रिश्तों के पेड़
लिये सवाल
.
मेघा की आँखों में पानी भर आया, वह खामोश थी उसके लिए ये प्रश्न अनुत्तरित था!
-0-

बुधवार, 22 जुलाई 2020

926-सावनी झूले


1-कृष्णा वर्मा
1
सावनी झूले
आँसू की डोरी थाम
झूलतीं साँसें
याद आएँ सखियाँ
बचपन की प्यारी।
2
गरजे मेघ
पलटी गगन ने
अमृत देग
बूँदें करें धमाल
हुए बावरे ताल।
3
घिरीं घटाएँ
बौराई ठंडी हवाएँ
धरा मुस्काई
नूपुर बाँध बूँदें
छनक-छन आईं।
4
भीगी-सी रुत
मेघ शोर मचाएँ
गरजे घटा
बदरा बिजुरी से
तस्वीरें खिंचवाएँ।
5
कारे बदरा
बरसाएँ फुहारें
पंख फुलाए
चुल्लू भर पानी में
पंछी डुबकी मारें।
6
बरसी घटा
हरियाएँ घाटियाँ
नाचें हवाएं
हरियल बनड़े
बरखा संग गाएँ।
7
घोलें घटाएँ
जो अम्बर पे स्याही
कालिमा छाए
सूरज की हेकड़ी
तड़ाक टूट जाए।
8
सोमरस-सी
छलकें जब बूँदें
भीगते दिन
लुक-छिप के सूर्य
सोए नयन मूँदे।
-0-

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

925-दूसरा कबूतर



सुदर्शन रत्नाकर


मेरे  रसोईघर के सामने की दीवार पर सूर्योदय से पहले ही कबूतरों का एक जोड़ा  बैठता था। वे दोनों थोड़ी देर किलोल करते और फिर उड़ जाते। मैंने उन्हें दाना डालना शुरू कर दिया। वे इधर-उधर देखते, नीचे उतरते, दाना चुगते, कटोरे में रखा पानी पीते और दीवार पर जा बैठते हैं। यह क्रम कई दिन से चलता रहा है। मुझे भी सुबह- सुबह उन्हें देखने की आदत हो गई है। किसी दिन भूल जाऊँ या देर से किचन में आऊँ, तो वे गुटरगूँ करके, पंख फड़फड़ाकर मुझे याद दिला देते हैं। अब मेरी दिनचर्या कबूतरों को दाना डालने से शुरू होने लगी है।
        कभी -कभी ऐसा होता है कि जब मैं दाना डालती हूँ, एक ही कबूतर दीवार पर बैठा होता है; लेकिन वह तब तक नीचे नहीं उतरता, जब तक दूसरा जाए। दूसरे के आते ही वे दाना चुगने में व्यस्त हो जाते हैं। प्यार और सहयोग की भावना तो पक्षियों में भी होती है।
     कल एक ही कबूतर दीवार पर बैठा था। मैंने दाना फैला दिया सोचा-
दूसरा कबूतर आएगा, तो चुग लेंगे; पर दूसरा कबूतर बड़ी देर तक नहीं आया। मेरा ध्यान बार- बार उसकी ओर जा रहा था।मैंने देखा उसकी आँखें पनीली थीं । पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगा कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है, कुछ बताना चाहता है  पर निरीह पक्षी बोल तो सकता नहीं। अपना दर्द ,अपनी भावनाएँ कैसे बताए। मैं अपने कामों में व्यस्त  हो गई। थोड़ी देर बाद यूँ ही मैंने खिड़की के  नीचे झाँककर देखा, तो वहाँ कबूतर के पंख फैले हुए थे । लगता है  बिल्ली जो कुछ दिन से घर के बाहर घूम रही थी, कबूतर उसका शिकार हो गया है।  दूसरा कबूतर दीवार पर बैठा अभी तक मेरी ओर देख रहा था और फिर बिना दाना खाए वहाँ से उड़ गया। मेरा मन पीड़ा से भर गया।
निरीह पक्षी
किससे कहे पीड़ा
दिल तो रोता।

सुदर्शन रत्नाकर
-29,नेहरू ग्राँऊड
फ़रीदाबाद-121001
मोबाइल 9811251135