मंगलवार, 25 जुलाई 2023

1129

 2- गाँव

भीकम सिंह 


 

गाँव  - 81

 

घास के जैसी 

खेतों की पीठ पर 

उग रही है 

मुद्रादायिनी जड़ें

हदें लाँघ के 

नागफनी- सी बढ़ें

रुकने को है

खेत की धड़कने

किस को फिक्र 

किससे क्या उम्मीद 

कौन खेतों पे मरे  

 

गाँव  - 82

 

क्या क्या बचेगा 

खेत जाने के बाद 

डरे हैं लोग ,

खेतों के वो संस्कार 

कहाँ बचेंगे  ?

खेत चुराने वाले 

कहाँ छोड़ेंगे ?

खटिया के आराम

राख का लेप 

मायूसी  के सबब

और मिट्टी के रब ।

 

गाँव  83

 

खेत बेचके 

गाँव  कहाँ जाएँगे 

थके हारे- से

चमक-धमक की

धूल झाड़के 

खड़े रहे जाएँगे 

ना मानेगा जी

गीला होगा आटा भी

चूल्हे की ओर 

बार- बार जाएँगे 

ज़ार -ज़ार रोएँगे  

 

 

गाँव  - 84

 

एक रंग था 

गाँव के आकाश का

साठ के पास

प्यार को टटोलते 

स्वर थे पास 

सरल रूप में थी 

सभी की प्यास 

सारी गड़बड़ियाँ 

कब से हुई 

मेल रहा ना वैसा 

खनका ज्यों ही पैसा  

 

गाँव  - 85

 

खड़े हुए हैं

बिटोड़े हाथ बाँधे 

पीठ पे चिह्न 

रस्सियों के बने हैं 

थुल-थुल-से

मूर्ख मुद्राओं में ज्यों 

प्रतिनिधित्व 

करने पे अड़े हैं

गाँव बड़े हैं

व्यवस्था के नाम पे

पीठ फेरे खड़े हैं  

रविवार, 23 जुलाई 2023

1128

 1-सेदोका

डॉ. कविता भट्ट



1

तू वृक्ष बन

तो मैं लता बनूँगी

तू चिट्ठी बन जाना

पता बनूँगी

तू बन सजा कोई

मैं ही खता नूँगी

 

-0-


शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

1127- सहारा

 प्रियंका गुप्ता

 

ज़िन्दगी में कभी कभी कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं कि हम करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर कर नहीं पाते। सपने देखते हैं, प्लान बनाते हैं-ये करेंगे, वो करेंगे,यहाँ जाएँगे, उससे मिलेंगे, पर जब इन योजनाओं को अमल में लाने का वक़्त आता है, ज़िन्दगी रोलर-कोस्टर बन जाती है। जब तक कुछ समझ पाएँ, नीचे से ऊपर और फिर सँभलते- सँभलते फिर नीचे। अक्सर बाहरी दुनिया हमारी इस उठा-पटक से अंजान रहती है। हम ही नहीं कहते किसी से क्या फ़ायदा हर किसी को सब कुछ बताने का? कोई समझेगा क्या? और क्या पता, समझना चाहे भी तो सच की बजा उसे महज एक झूठ ही समझेकिसी काम को न करने का सबसे आसान बहाना। बहुत बार तो शायद इक्का-दुक्का लोग ही होते हैं, जिन्हें आपकी असल स्थिति का पता होता है, आप पर विश्वास होता है और वही आपके सबसे बड़े सम्बल भी होते हैं। बेहद हताशा से भरे उस दौर में वे ही चुपके से आपके कानों में फुसफुसा जाते हैं- हिम्मत न हारना, सब ठीक हो जाएगा। बस थोड़ा धैर्य और थोड़ा- सा इन्तज़ार और। ऐसे में जिनको हम अपना-सा मानते हैं, उनसे एक उम्मीद होती है। चुपके से दिल के किसी कोने से एक आवाज़ आती है- कोई बात नहीं, दुनिया समझे, न समझे, जो तुम्हारे अपने हैं वो ज़रूर समझ जाएँगे कि तुम नहीं बदले, बस वक़्त ज़रा बेईमान हो गया है। हमारा परिवार, हमारे पक्के दोस्त, हमारे रिश्तेदार सब अपने हैं, तो एक अपने को सही से पहचानते भी होंगे न। पर अक्सर होता इसका उल्टा ही है। इस बेदर्द-सी दुनिया में सबसे पहले आपके वही अपने आपको ग़लत समझ लेते हैं। कभी तो शिकायत करते हुए आपको सफ़ाई देने का एक मौका देते भी हैं, तो कभी बिन कुछ बोले, बिन कुछ कहे बस आपका हाथ छोड़ अपने रस्ते निकल जाते हैं.,क अकेले-से सफ़र में आपको और अकेला छोड़कर।

आइए, किसी जाते हुए पल में थमकर हम ज़रा पीछे मुड़कर देख लें। ऐसा तो नहीं कि हमारा कोई बहुत अपना भी इस अकलेपन के सफ़र में हताश-निराश सा अपनी मंज़िल की तलाश में भटक रहा होऔर उससे साथ छोड़ने की शिकायत अपने मन में लिए हुए हमने ही अनजाने-अनचाहे उसका हाथ झटक दिया हो।

 

अकेले हो तो

साथ देना किसी का

सहारा बन।

रविवार, 16 जुलाई 2023

1126-गाँव

 भीकम सिंह 



 गाँव  - 76

तुम शहर !

घात लगा-लगाके

जाँचते रहे 

दबोचने के लिए 

खेत के गेहूँ 

चूस लेने को सारा

गाँव का लहू 

झपटने को सारे 

सुख - औ- चैन

वो मस्ती वाली सैन 

वो लम्बी- लम्बी रैन ।

 

गाँव- 77

 

हर खेत से 

आवाजें आ रही हैं

पेड़ों की जड़ें

सब सुना रहीं हैं 

हवा को कुछ 

धरा को सब कुछ 

छुट्टी के दिन

शहरों से आते हैं 

स्वेद में भीगे 

पचासेक साल के 

व्यवस्थित चाल के 

 

गाँव  -  78

 

पीड़ा से भरा 

खेत अधजगा है 

औंधा पड़ा है 

आँसुओं को छिपाए 

खोज रहा है 

शस्यों की परछाई 

खुदी नींव के

गड्ढों में गिरा हुआ 

सह रहा है 

नगरों की क्रूरता 

थोड़ा-सा बचा हुआ 

 

गाँव  - 79

 

शाम झाड़के

खलिहान से उठा 

कंधे पे रखा

संतोष का अँगोछा 

आँखें मूँदके 

मुखाकृति को पोंछा 

स्याह हो गया 

धूसर- सा अँगोछा 

खेतों में लगे 

जुगनू ठुमकने 

याद आ अपने 

 

गाँव  - 80

 

खेतों के बाद 

शुरू होगा बाज़ार 

कहाँ जाएँगे 

विस्थापित सियार

बस्ती पार के 

झींगुरों की आवाजें 

बुलाती हुई 

करेंगी इंतज़ार 

कभी-कभार

पाने के लिए प्यार 

शहर के बाहर 

-0-

शनिवार, 15 जुलाई 2023

1125-ख़्वाबों की किरचियाँ

रश्मि विभा त्रिपाठी



1

खूब रोती हैं

खिलौना टूटते ज्यों

देर तक बच्चियाँ!

मैं भी यों ही थी

वो साथ था, और थीं

ख़्वाबों की किरचियाँ!!

2

गिड़गिड़ाए

उम्मीद के परिंदे

उजड़ने के वक्त!

बेरहमी से

काट दिया उसने

दिल का वो दरख़्त!!


3

कैसे दे पाती

विदाई, खड़ी रही

मैं आँखों को मींचके

तू लेता गया

जाते वक्त ज़िस्म से

मेरी रूह खींचके!

4

समेट पाना

घर का कामकाज

अब कहाँ आसान!

तेरी याद का

ढेर सारा यहाँ पे

बिखरा है सामान।

5

रेत- सी उड़ीं

जिंदगी की उम्मीदें

दिल के अरमान

वो सचमुच

मेरे लिए था एक

तपता रेगिस्तान।

6

उसने जब

मेरे नन्हे ख़्वाबों का

खामख़ाँ गला काटा

तो मिटा चुकी

दिल की फाइल से

मैं भी उसका डाटा।

7

रात का किया

जिसने अपमान

कहकरके काला

तभी उसने

आते- आते सबका

नकाब खींच डाला।

8

साथ देने की

तुम नहीं करना

अभी से कोई बात!

परख लेगी

तुम्हारा सच्चा वादा

आते ही आते रात!!

9

सब सोचते

रात के अँधेरे में

रास्ते नहीं दिखते!

सच ये है कि

अच्छे- अच्छों के तब

पैर नहीं टिकते!!

10

दिनभर तो

दुनियाभर की मैंने

खूब थकान झेली

सिर्फ बैठके

रात के आँगन में

मैं जी भरके खेली।

11

आँखें बरसें

कभी होंठ लरज़ें

दिल ने कभी रोका

लिखे, मिटाए

हिज़्र की घड़ी मैंने

तुमपे ही सेदोका!

-0-