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मंगलवार, 4 मार्च 2025

1212

 

हाइबन

1. हवा में घुली धुन/ अनिता मंडा

 


खुली खिड़कियों से वह बाँसुरी की धुन अबाध घर में चली आती। अक्सर कोई पुराना फ़िल्मी गीत वह बाँसुरी पर बजा रहा होता। 'ओ फ़िरकी वाली, तू कल फिर आना....',  आ जा तुझको पुकारे मेरा प्यार...',  'सौ साल पहले हमें तुमसे...' उसके जाने के बाद भी धुन हवा में घुली रहती। 

 

हर बृहस्पतिवार की सुबह वह इस ब्लॉक से निकलता। शायद हर वार के लिए अलग-अलग मुहल्ले तय कर रखे थे। एक लंबा- सा बाँ का डंडा और उस पर बँधी हुई अलग-अलग आकार की बाँसुरिया। पर हमारे मुहल्ले में कोई बच्चा घर से बाहर ही नहीं निकलता , जो बाँसुरी खरीदने की जिद्द करे। 

 

वह अक्सर जैसे सड़क पर घुसता वैसे ही निकल जाता। कोई भी बाँसुरी खरीदने बाहर न निकलता। 

मेरे आस-पास कोई भी नहीं जिसे बाँसुरी बजानी आती हो। संगीत में कितना सुकून है , फिर भी हमारे जीवन में कितना कम संगीत बचा है। आसपास कई संस्थान हैं , जो बच्चों को गिटार, ड्रम, की-बोर्ड आदि सिखाते हैं ; लेकिन उस बाँसुरी-वादक जैसी बाँसुरी मैंने वहाँ भी नहीं सुनी। 

 

क्या पता उसे भी कोई अच्छा प्लेटफॉर्म मिले , तो वह भी अपने हुनर को संसार के सामने ला सके। उसे देख निदा फ़ाजली साहब की पंक्ति याद आ जाती है- 'कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता'  

दुनिया का कारोबार अपने हिसाब से चलता रहता है। अनजाने ही कुछ धुनें मौसम बदल जाती हैं। 

हवा में घुली

बाँसुरिया की धुनें

मन को धुनें।

-0-

2-सेमल

 


      सेमल को देकर 'सैन भगत' की एक पंक्ति हठा्त् होठों पर चली आती है- 'यो संसार फूल सेमर को, बूर-बूर उड़ जावे।'

मार्च महीने में दिल्ली के पार्क और सड़कों पर सेमल ख़ूब जलवे बिखेरता है।

साल भर हरा-भरा रहने वाला सेमल मार्च का महीना आते आते पर्ण-विहीन होने लगता है। सीधा तना और गर्व से आसमान को छूने की कोशिश में सेमल जिस ठाठ बढ़ता है, अद्भुत है।

   सर्दियों में साथ रही, बुढ़ाई पत्तियाँ एक-एक कर अनवरत झरती जाती हैं, मानों शीत के बीतने पर पुराने वस्त्र बदले जा रहे हों। ज़र्द पत्तियों की जगह लेने को आतुर लाल-लाल हठीले फूल तुनक कर रिक्त शाखों को भर देते हैं। पर्ण-विहीन सेमल मानों होली के स्वागत में लाल गुलाल अपनी काया पर लपेट लेता है। 

   फिर कुछ समय बाद चटकीला लाल भी बूँद-बूँद कर बिखरने लगता है। अप्रैल जाते- जाते फल भी रेशा-रेशा हो कर हवाओं का दामन थाम यहाँ-वहाँ उड़ जाता है। फिर से शाखों पर पत्तियाँ आ जाती हैं। 

योगी सेमल

दुःख-सुख में थिर

प्रार्थनारत।

-0-

 3.बेचैनी का सुकून/ अनिता मंडा

 फरवरी में खिलते फूल जहाँ मन को लुभाते हैं, हवाओं में सौरभ घुली होती है, भँवरे तितलियाँ पराग पीकर अघा नशे में झूमते से उड़ते हैं; वातावरण मन को लुभाता है; लेकिन मार्च की शुरुआत होते होते हवाएँ थोड़ी रूखी होने लगती है। फागुन में एक नशा होता है। बीतता फागुन अपने पीछे अजीब सी उदासियाँ बिखेर देता है। 

 हवाएँ बेबात पेड़ों से उलझती हैं। पीत- पर्ण सहजता से उनके साथ चल पड़ते हैं। जैसे मोह के सारे बन्धन तोड़ दिए हों। आश्चर्यजनक रूप से पत्तियाँ एक के पीछे एक बेआवाज़ गिरती जाती हैं। न पीछे मुड़क देखना, न कुछ साथ लेना। एक अजीब फकीराना चाल कि अब न मुड़के देखने वाले हम। 

 ठीक ठीक नहीं पता कि सुकून है या बेचैनी।  यह पतझड़ लुभाता है या एक खालीपन मन पर तारी होता जाता है। झरती पत्तियों से खाली होती शाखाएँ। ऐसा भी क्या निर्मोह। मन की दशा बार-बार बदलती है। स्थिर तो कुछ भी नहीं। हवा का जाने क्या खो गया है कि पत्तियों को उलट-पलटकर ढूँढती है। जैसे कुछ रखकर भूल गई हो। वो जो भूल गई है नए रंग; वो कुछ दिनों में शाखाओं पर फूटेंगे।

बौराई हवा

क्या तो जाने ढूँढती

पात हिलाती।

-0-

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2025

1205

 

हाइबन

अनिता मण्डा

रेगिस्तान में बसंत

 वसन्त ऋतु में रंग-बिरंगे फूलों से दिलजोई करते तितली, भँवरे, मधुमक्खियाँ किसका मन नहीं मोहते। शीत का कम होना और ग्रीष्म से दूरी ख़ुशनुमा माहौल बना देती है। पूरी प्रकृति अँगड़ाई लेकर  जाग उठती है। वसन्त प्रकृति की मुस्कान है। वासन्ती हवा में घुली महक का अलग ही रोमांच होता है। क्या इससे भी मोहक कोई महक हो सकती है


लेकिन सच कहूँ तो वासन्ती महक से भी गहरी तासीर वाली एक महक है जो स्मृतियों में बसी हुई है। वो महक बचपन में घुली हुई है। बल्कि बचपन का पर्याय ही है। वसन्त के महीने की नहीं
, कार्तिक महीने की।

मैं रेगिस्तान में पैदा हुई, पली-बढ़ी। जहाँ बरसात से साल में सिर्फ एक ही फसल ली जाती थी। चालीस साल पहले वहाँ फूलों की पहुँच नहीं थी। फूल के नाम पर सिर्फ़ रोहिड़ा के फूल थे। पलाश जैसे केसरिया रंग में थोड़ी ललाई लिए हुए। 

 

आँखें मूँद कोई महक याद करूँ, तो सबसे  गहरी महक कार्तिक महीने में फसलों के पकने की महक स्मृति पर दस्तक देती है। वो बचपन की महक थी या कार्तिक की। वो फसलों की महक थी या मेहनत की ; कुछ भी विलग नहीं किया जा सकता।

घर से 6-7 किलोमीटर दूर खेतों में काम करके ढलती साँझ और उगती रात के मिलने  की बेला में घर लौटने की  महक। ऊँटगाड़ी की सवारी करने की महक। ठंडे रेतीले धोरों में समाती ओस की महक। पके हुए बाजरे के सीटों की  महक। मोठ- मूँग, तिल की फलियों की महक। सँवरती रात के दामन पर उजले चाँद-तारों की महक। थकान से चूर देह पर उमंग भरे मन की महक। घर पहुँच भोजन पा लेने की महक। खाली पेट में पड़ते मरोड़ की महक। परिवार के एक साथ होने की महक।

सच, अब न वैसी मेहनत होती है, न वैसी भूख होती है। न वैसी रात होती है, न वैसे चमचमाते चाँद-तारे होते हैं। बहुत-बहुत याद आती है वो बचपन में खो गए चाँद-तारों की महक। 

महक यानी बचपन। बचपन घुली-मिली सारी खुशबुएँ। कौन सी महक किस पर हावी, नहीं पता।  ओस भीगे सुनहरे धोरों की रेतीली मखमली मिट्टी जब पाँव सहलाती थी; जन्नत सी लगती थी।

काली रात में ढिबरी सा जलता चाँद, ठहरी हुई हवा, आँखों में डेरा डालने को आतुर नींद; इन सबका मिला-जुला इत्र; सबसे अनमोल महक है। 

1

स्मृति-चमन

खिल उठा फिर से

महका-मन।

2

मन-वीथियाँ

फिर हुई वासन्ती

खिली स्मृतियाँ।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

1199

 

1-सेदोका/ अनिता मंडा

1.

काम निबटा

ली गहरी जम्हाई

सर्दी की दोपहर।

धूप के फाहे

सलाई पर नाचें

अधबुना स्वेटर।

2.

उड़ती रही

पल भी न ठहरी

धूप की तितलियाँ।

बूढ़ी हो गई

जाड़े की दोपहर

छिली मूँगफलियाँ।

-0-

2-ताँका/ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

1
हवा क्या चली
बिखर गए सारे
गुलाबी पात
मुड़कर देखा जो
मीत कोई ना साथ।
2
किरनें थकीं
घुटने भी अकड़े
पीठ जकड़ी
काँपते हाथ-पाँव
काले कोसों है गाँव।
3
रुको तो सही
कोई बोला प्यार से-
'मैं भी हूँ साथ'
थामकरके हाथ
सफ़र करें पूरा 

-0-

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

968-आम के पेड़ पर अंगूर

 

अनिता मण्डा

इन दिनों शाम का काफी समय बालकनी में ही गुजरता है।


महामारी के समय घर से बाहर निकलना सही नहीं। बच्चों के लिए भी घर पर रहना ही सुरक्षित है
; इसलिए दिन कमरों में बंद रहकर बिताने के बाद शाम को बाहर की झलक लेने बच्चे और मैं बालकनी पर आधिपत्य जमा लेते हैं। आसमान में कभी-कभी पक्षियों के झुंड उड़ते हुए दिख जाते हैं, कभी इक्के दुक्के अकेले पक्षी उड़ते रहते हैं। कौवे, कबूतर, तोते, चिड़िया, चील इधर-उधर उड़ते दिख जाते हैं।

   घर के एकदम साथ में एक पुराना आम का पेड़ है। उसकी शाखाएँ कई बार आँधियों में टूट चुकी हैं, जिससे वह थोड़ा खंडित- सा लगता है। बहुत सारे पक्षियों का इस पर बसेरा है। इस बरस  इस पर बहुत कम बौर आया है। अप्रैल की शुरुआत से इसमें छोटे-छोटे फल नज़र आने लगे हैं। कई बार कोयल भी आती है। बाक़ी समय गिलहरियाँ धमा-चौकड़ी मचा रखती हैं। इस पेड़ के दोस्त पंछी, गिलहरियाँ आदि बच्चों को बहुत प्यारे हैं। उनके लिए यह नया संसार है जो कि मोबाइल और यू ट्यूब से अलग वास्तविक है। 

  नीर-निक अभी वय में सवा दो साल के हुए हैं। मुझे बड़ी मम्मा कहते हैं। कल मैंने आम के छोटे-छोटे फल दिखाकर नीर को बताया कि देखो पेड़ पर आम लग गए हैं। उसने ध्यान से निरीक्षण- परीक्षण, अवलोकन किया और निष्कर्ष निकाला - "नहीं बड़ी मम्मा, आम नहीं अंगूर हैं।" 

"नीर को अंगूर खाने हैं।"

दरअसल अभी अम्बियों का आकार बड़े आकार के अंगूर जितना ही है। मैंने उसे दुबारा बताया "अंगूर नहीं अम्बियाँ हैं।" 

उसने मुझे फिर सही करवाया "अम्बियाँ नहीं, बड़ी मम्मा अंगूर ही हैं।

उसका सही करवाना मुझे इतना अच्छा लग रहा था कि मैं बार-बार बता रही थी- "अम्बियाँ हैं, आम के पेड़ पर अंगूर कैसे होंगे"

वह हर बार दुगुने जोश से सही करवाए "अंगूर ही होंगे

 यह हमारे लिए अच्छा खेल बन गया। "आम के पेड़ पर अंगूर कैसे होंगे? आम ही हैं।

उस पर भला तर्क का क्या असर होता? वो तो मेरे बोलने का भी अवलोकन कर रहा था।

"अंगूर ही होंगे, आम कैसे होंगे।

इस सुंदर वार्तालाप में मुझे हार कबूल करनी पड़ी।

 

हार का सुख

जीत से भी अनोखा

गूँगे का गुड़।

-0-

बुधवार, 18 जुलाई 2018

818



माहिया-रेनू सिंह जादौन
1
अम्बर बदली छाई
धरती तड़प उठी
ऋतु सावन की आई।
2
कैसी ये रीत पिया
सजना परदेसी
तड़पाती प्रीत पिया
3
शृंगार नहीं सजना
दर्पण सूना है
पायल भूली बजना।
4
तुमको लिखती पाती
सागर यादों का
लहरें उमड़ी जाती।
5
शुभ हो बरसात तुम्हें
प्रियतम घर आना
देना सौगात हमें।
-0--0-
अनिता मण्डा के 3 हाइबन
1-आषाढ़- अनिता मण्डा
आषाढ़ प्रतीक्षा की पूर्णता का महीना है। झमाझम संगीत और माटी की सोंधी सुरभि का महीना है। धरती की दरारों में छिपा अँधेरा बादलों की गड़गड़ाहट से भय खाता है। बूँदों के पोर आहिस्ता आहिस्ता धरती को गुदगुदाते हैं, हरियाली धरती की खिलखिलाहट है। तपस्वी पेड़ों की साधना का वरदान आषाढ़ बादलों के लिफाफों में बूँदों के ख़त लाता है। अपना दुःख, ताप धोकर पेड़ सरसाते हैं। सारे लोकगीत आषाढ़ पर पाँव धर सीधे सावन का झूला झूलने की हड़बड़ी में हैं। इन सबसे अनभिज्ञ आषाढ़ मदमस्त हाथी- सा गुज़रता है, गरजता है, बरसता है। एक आवेग हर कहीं भर देता है। नदियों की मंथरता टूटती है। पंछियों के गान फूटते हैं। जंगल कच्चे हरे से उफनता है। खेतों में हल के मांडने आस से हरे होते हैं। पर्वत, नदियाँ, जंगल, खेत, वनस्पति, जीव सब आषाढ़ ढ़ की छुवन से स्पंदित हो गाते हैं। बारिश सुख का संगीत रचती है, इंद्रधनुष का सतरंगी सितार प्रकट होता है, मानो अम्बर के आँगन रंगोली पूर दी हो किसी ने। कण-कण में अनुराग की उपस्थिति है बारिश।
1
आषाढ़  माह
अनुराग उपजे
मेघ बरसे।
2
बंजारे मेघ
गाएँ मल्हार राग
जागे हैं भाग।

-0-

2-बैसाख-- अनिता मण्डा

बैसाख में सूरज की प्यास अनियंत्रित हो जाती है। नदी तालाब बावड़ी जहाँ भी पानी दीखे अपनी किरणों की स्ट्रो से चोसता रहता है। बैसाख के ज़ुल्म से नदियों की देह सिकुड़ जाती है। लहरें घायल से पाँवों से रेंगती हुई अपनी पायल के घुँघरू उतार रख देती हैं। किनारे अपनी पहले दिन वाली जगह नहीं मिलते। नित्य जगह बदलते हैं। फिर भी वो नदी से अलग नहीं रह पाते। उसके साथ जो बंधन की आदत जो ठहरी।     
प्यासे चौपाये, पखेरू पल-पल अपने होने को बचा रहे तालाब-बावड़ियों के पास जाते हैं। प्यासे जीवों को तृप्त न कर पाने के दुःख में तालाब बावड़ियों का हृदय दरक जाता है। उनके पाँवों के निशान वो स्मृति-स्वरूप अपने पर संजो लेते हैं।
ऐसी ही बैसाखी दुपहरी में धूप को दूर-दूर तक बादल का कहीं आलम्बन नहीं मिलता। तब वो हरियाते रूखों का आश्रय ढूँढती है। पेड़ों के नीचे विश्राम करती छाँव काँप कर सिकुड़ जाती है। पेड़ अनवरत धूप का अनुवाद छाँव में करते हैं। ऐसा सटीक संवेदनशील अनुवाद करना और किसके बस की बात है भला।  दम साधे बैठे पंछियों का गला अवरुद्ध हो सुर गले में ही चिपक जाते हैं। तब हर कहीं सन्नाटा अपना साम्राज्य जमा लेता है। सन्नाटे से दम साधे जूझती प्यासी दुपहर रेंगती -सी चलती है। हर कहीं बस प्यास और प्यास। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं का वैभव तब एकदम फीका लगता है ,जब उनमें प्यासे पंछियों के लिए एक मिट्टी का सिकोरा तक नहीं मिलता। पत्ता पत्ता प्यासा होकर बादलों को पुकारता है।
1
दरक गया
बावड़ियों का हिया
प्यासे पखेरू।
2
सताए प्यास
खोये हैं मीठे सुर
पंछी उदास।
-0-

3-गुलमोहर- अनिता मण्डा

चिलचिलाती धूप में जब आँखें खुलते हुए स्वतः सिकुड़ जाती हैं, सिर को छाँव का आसरा याद आने लगता है, हवा में बढ़ते तापमान की धमक त्वचा पर हमला कर चुभने लगती है तभी जेठ माह की धूप को मुँह चिढ़ाता गुलमोहर रंग पहनने लगता है। धीरे- धीरे हरा झड़ कर विरल हो जाता है और केसरिया, नारंगी, लाल हावी होता जाता है। धूप जब छाँव के अस्तित्व को मिटाने उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने लगती है गुलमोहर के फूल किसी योद्धा की भाँति  मुकाबले में डट जाते हैं। फूलों को कोमल समझा जाता है। उनकी सुंदरता बरबस मन मोह लेती है, दृष्टि बाँध लेती है। मधुमक्खियाँ उन पर उत्सव मनाती हैं। चूम-चूम कर रस का संचय करती हैं। शहद चुम्बनों का संचय है। तभी तो इतना मीठा  इतना विशुद्ध, गुणकारी है।
फूल कड़ी धूप में भी मुस्कुराना नहीं भूलते। अपनी एक मुस्कान से देखने वालों को ख़ुशी मिलती है तो ये काम इतना कठिन भी नहीं न। फिर हँसकर जिया जाये या मुँह लटकाकर जीना तो है ही। ख़ुश्बू कभी अपने फूल में लौटकर नहीं आती। पर पहचानी तो उसी के नाम से जाती है। हमारी मुस्कान भी वही ख़ुशबू है जो हमारी छवि के साथ ही किसी हृदय में बसी रह जाती है। एक मुस्कान जितना सा जीवन और कितने सुनहरे रंग। प्रकृति की कितनी बड़ी पाठशाला हमारे इर्द-गिर्द मौजूद है। कितना बड़ा कैनवस नित्य सजता  है। कितने रंग रोज़ अपना स्वरूप बदलते हैं। आँखें होते हुए भी कितना कुछ अनदेखा छूट जाता है हमसे। कितना निकल पाते हैं हम मन में लगे जालों को हटाकर। देखने की एक दृष्टि परिमार्जित करते ही दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं। समझा जाते हैं। तो क्यों न गुलमोहर को देख कुछ पल को एक गुलमोहर अपने भीतर भी उगा लें जो जीवन के घाम को सहकर खिल उठे। जिसका मकरन्द किसी का सानिध्य चूमकर शहद सा मीठा बन जाए।
गुलमोहर
धूप में मुस्कराए
जीना सिखाए।

-0-

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

804


हाइबन-
अनिता मण्डा
1-नादाँ हवाएँ


कभी सहसा बादल घिरते हैं, काली घटाएँ उमड़कर आती हैं। मोटी-मोटी बूँदें टप-टप का संगीत बनाती हैं। भीगी मिट्टी की सौंधी महक़ भीतर तक भरने को साँस इतनी गहरी हो जाती है कि आँखें स्वतः मूँद जाती हैं। बावरा मन पहले टप-टप के संगीत में भीगता है फिर सौंधी महक़ में। तन में एक तरंग उठती है झूमकर भीगने की, उसी तरंग में लबों पर कोई बरसाती गीत आ विराजता है। बरसों के बिछड़े पल क़रीब आने को मचलते हैं। कोई भीगी सी स्मृति सरसराती हवा में बिखर जाती है। तभी निगोड़ी हवा को जाने क्या सूझती है कि बादलों को हाँक ले जाती है। उमगी इच्छाओं का हिलोर फिर तलछटी पर जा बैठता है।
नादाँ हवाएँ
साथ उड़ा ले गई
काली घटाएँ।
2-सुधियाँ

अपने शहर में अरसे बाद आना अपनी स्मृतियों की हर शय पर जमी मिट्टी की पर्तें झाड़ना है। चाय की गुमटी, खोमचे वाला, पार्क की बेंच पर बैठे बुजुर्ग, फेरी वालों की आवाज़ें सब कुछ कितने समय बाद भी मन में वैसा का वैसा ही बना रहता है। एक चित्र सा जिसमें सभी चीज़ें चलती रहती हैं पर बदलती नहीं। चलती हुई चीज़ों की स्थायी  स्थिरता।  बरसों बाद भी वो चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते। पुरानी परिचित गलियाँ, आइसक्रीम के ठेले, बसों के हॉर्न ,जाने किन किन चीज़ों से बातें निकल निकल आती हैं। एक पल पहले जो बात ख़ुशी बन याद आई थी अगले ही पल ने उसका अनुवाद उदासी में कर दिया।
वही गलियाँ
थाम हथेली चलीं
साथ सुधियाँ।

-०-
3- गौरव


रात की कालिख़  पोंछ प्राची दिशा से स्वर्ण रश्मियों की सवारी नित्य आ पहुँचती है जैसे कोई प्रशिक्षण पाया हुआ सैनिक कभी अनुशासन नहीं भूलता। कोने-कोने से तम के अवशेष बुहार कर उजाले की विविधरंगी सीनरी सज जाती है। उजाले के कई रंग होते हैं। अँधेरे का रंग सिर्फ़ अँधेरा ही होता है। जागते ही भोर निर्मल ओस से अपना मुँह धोती है। ओस कभी बासी नहीं हो सकती। उसे रोज़ बनना होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि कल की ओस से आज की भोर मुँह धोए। भोर हमेशा नई होती है। दोपहर कल की दोपहर की तरह अलसाई हो सकती है, शाम कल की शाम की तरह उदास, रात कल की रात की तरह अँधेरी, पर भोर हमेशा नई होगी। जैसे खिलखिलाहट हमेशा नई होती है। तो भोर और ओस दोनों एक जैसी होती हैं भले ही भोर के आने पर ओस मिट जाए। वही उसकी सार्थकता है। सार्थक होकर मिटने में मिटने का रंज शामिल नहीं होता। यहाँ मिट जाना ही उसका गौरव है।
ओस से धोए
भोर अपना मुख
सरसे सुख।

-०-

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

795


1-भावना सक्सैना
1
गीत सुरीले
गाती है ये ज़िन्दगी
सुर पकड़
नए सृजन करो
मन आनंद भरो।
2
छाँव सुख की
नटखट बालक
चंचल दौड़े
नयन मटकाती
टिके नहीं दो घड़ी।
-0-
2-अनिता मण्डा
1
इच्छा के दीप
मन का गंगाजल
ले जाएँ लहरें
तैरते व डूबते
दिन-रात बीतते।
2
घूरती आँखें
गली चौराहों पर
भूली संस्कार
पोतें सभ्यता पर
कालिख़ दिन-रात।
3
छानते युवा
सड़कों की धूल
कर्तव्य भूल
अधर में भविष्य
वर्तमान हविष्य।
4
मन हो जाता
पत्थर से भी भारी
रहे डूबा सा
सुधियों की नदियाँ
कितनी उफनाता
-0-
3-पूनम सैनी (हरियाणा साहित्य अकादमी-परिष्कार  कार्यशाला की छात्रा)
1
अंगार- भरी,
चंदन- सी घाटी ये
तेरी ज़िन्दगी।
रोते या मुस्कुराते,
सफर तो तय है।
2
कुछ अपनी,
कुछ अजनबी-सी,
अनकही- सी,
दास्ताँ है वतन की।
वीरों के जतन की।
3
मेरी साँसों में
उसके जीवन का
एहसास है।
अब न मैं न ही वो,
बस प्रेम जीता है।
4
सीमाएँ भी है,
धर्म और जाति भी
ढूँढे न मिला  
आदमी की बस्ती में
इंसान है लापता।
5
पतझड़ में
बसंत न खिलता
बिन तुम्हारे।
आशाओं की बेल थी
हिम्मत के सहारे।
6
घुमड़ते-से
बादल बनकर
तुम आओ तो।
थार से मन पर
प्रेम बरसाओ तो।
-0-