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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

तुम हाथ बढ़ा देना



आज की पोस्ट में अनुपमा त्रिपाठी के स्वर में माहिया  पढ़ने के लिए  12 माहिया   
को क्लिक कीजिए ।

1-डॉo सुधा गुप्ता
1
तुम हाथ बढ़ा देना
करुणाकर !सुन लो
तुम पार लगा देना 
2
मन को अब चैन नहीं
आँखें रीती हैं
होठों पर बैन नही।
3
अमरस अँगनाई में
कोयल कूक रही
अब तो अमराई में ।
-0-
2-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
रुत ये वासंती है
चरणों में हमको
ले लो ये विनती है
2
दो बूँद दया बरसे
हम भी  हैं तेरे
फिर कौन भला तरसे ।
3
देरी से आना हो
आकर जाने का
कोई  न बहाना हो 
-0-
3-डॉ भावना कुँअर
1
तुम बरसों बाद मिले
मन के तार छिड़े
सारे  ही ज़ख़्म सिले।
2
 जीवन की रीत रही
सच्ची प्रीत सदा
इस मन की मीत रही
3
बोलो कब आओगे ?
उखड़ रही साँसें
सूरत दिखलाओगे ?
-0-
4-रामेश्वर काम्बोज
1
बादल ये बरसेंगे ।
मन में धीर धरो
जीवन-पल हरसेंगे ।
2
पग-पग पर शूल बिछे ।
रुकना कब सीखा !
मंज़िल पर  फूल बिछे
3
तुम मेरी पूजा हो
तुमसे भी प्यारा
कोई ना दूजा हो

शनिवार, 28 सितंबर 2013

बूँदें भरमाई हैं

अनुपमा त्रिपाठी ।
1
फिर बारिश आई है 
प्रेम लिये झरती 
टिप-टिप हरषाई  है 
2
मन मेरा भीज रहा 
यादों में डूबा 
सुधियों में  रीझ  रहा 
3
साँझ सुनहरी घिरती
स्वर्णिम  पंखों से 
बूँदों को  ले तिरती ।
4
बूँदें भरमाई हैं 
टिपिर टिपिर करती 
संदेसा लाई हैं  ।
5
आशाएँ भी सरसें 
बादल पंख लिये
जब मन पर यूँ बरसें ।
6
आँख -मिचौनी सी !
हम-तुम ,तुम-हम में 
फिर भी दूरी कैसी  

-0-

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

जग छल से जीत गया

अनुपमा त्रिपाठी
1
जग छल से जीत गया ,
छलनी मन करके,
इक सपना रीत गया ।
2
जग छल कर हँसता है
सच के नयन भरे
मन -मेघ बरसता है ।
3
ये रीत पुरानी है
मन की पीर बनी
हर साँस  कहानी है ।
4
अनबूझ पहेली है
आँसू में लिपटी
हर  हूक  सहेली है ।
5
सुख करवट बदल रहा
दुःख के मेघ घिरे
मन झिर- झिर  मचल रहा ।
6
यह कौन नगरिया है
आँगन धूप खिली
चन्दन मन दरिया  है ।
7
मन्द पवन डोल रही
आँचल लहराकर
कोमल मन खोल रही ।

-0-

शुक्रवार, 21 जून 2013

सावन भरमाया है ।

अनुपमा त्रिपाठी
1
हरियाली छाई है
वर्षा की बूँदें
कुछ यादें लाई हैं  ।
2
कोई न  कहानी है
मेरे  मन में भी
इक  प्रीत  सुहानी है ....
3
ये चंचल -सी किरणें
मन भी जाग उठा
जब  प्रीत लगी खिलने ।
4
प्रियतम घर आया है
आँसू खुशियों के ,
सावन भरमाया है ।
5
तुम अब घर आ जाओ
साँझ घिरी कैसी !

सब  पीर मिटा जाओ ।

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

धारा हूँ नदिया की


अनुपमा त्रिपाठी


छवि सुहाए
सूरतिया  पिया की
मनवा भाए
मूरतिया पिया की
नदिया हूँ मैं
सागर पियु मेरो
बहती जाऊँ
कथा सागर तक
कहती जाऊँ
पियु में समा जाऊँ
पीड़ा राह की
सकल सह जाऊँ ।

बन में ढूँढूँ
धारा- हूँ  जीवन की
घन  बिचरूँ
ज्यूँ धार नदिया की
कठिन पंथ
अलबेली -सी रुत
मोहे सताए
जिया नाहीं बस में
पीर घनेरी .
मनवा अकुलाए ।

बिपिन घने
मैं कित  मुड़  जाऊँ
पिया बुलाए
मन चैन न पाए  
बढ़ती जाऊँ
डगर चले मन
रुक ना पाए
अब कौन गाँव है
कौन देस है
नगरिया पिया की
रुक ना पाऊँ
कल- कल करती
बहती जाऊँ
छल -छल बहूँ मैं
सागर को  पा जाऊँ
-0-

शनिवार, 28 जुलाई 2012

आँसू जब बहते हैं


    रामेश्वर काम्बोज हिमांशु‘ और डॉ हरदीप कौर सन्धु  के  माहिया अनुपमा त्रिपाठी जी के स्वर में सुनने के लिए  क्लिक कीजिए आँसू जब बहते हैं को

डॉ हरदीप कौर सन्धु का माहिया-
शब्दों का  गीत बना
अँखिया राह तकें
तू दिल का मीत बना ।
प्रस्तुति-डॉ हरदीप कौर सन्धु