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रविवार, 2 मार्च 2025

1210

हाइबन / कृष्णा वर्मा

स्नोफॉल (कनाडा) 

कनाडा की लम्बी सर्दी में दिसम्बर माह से और कभी-कभी तो नवम्बर माह से ही स्वभाविक रूप से बर्फ़ गिरने लगती है। कमरे की खिड़की से बर्फ़ के नर्म फाहों को गिरता देखकर मन खुशी से गुदगुदा जाता है। कई बार अपनी बालकनी में खड़े हो कर इन मखमली फुहारों का नन्द लिया है। प्रकृति भी क्या चीज़ है जो बिना कुछ कहे ईश्वर के कितना क़रीब कर देती है। सर्दी के मौसम में यह आए दिन का मामूल है थोड़ी देर बर्फ़ पड़ती है, बादलों की ओट से जैसे ही सूरज झाँकता है, पानी-पानी होकर बर्फ़ धरती में समा जाती है। जिस दिन जमकर पड़ती है, उस दिन धरती का चप्पा-चप्पा दूधिया सफ़ेद मोटी परत से जाता है। चाँदी- सी चमकती रातें, पेड़ों की नाज़ुक टहनियों पर, डालों की पीठ पर, पत्तों की हथेलियों पर जमी बर्फ़, छत्तों और छज्जों पर लटकती बर्फ़ की झालरें देखकर किसी और ही लोक की प्रतीति होती है। कितना अनूठा दृश्य होता है,  जब सूरज की किरणें पड़ते ही चारों ओर हीरे की कणियों सा दमक उठता है ! ऐसा लगता है- जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। बच्चों की खुशी का तो ठिकाना नहीं रहता। स्नोसूट, बूट, हैट, दस्ताने पहनकर कड़कती ठंड में बर्फ़ से खेलना उन्हें बहुत भाता है। हाथ- मुँह भले लाल सुर्ख़ हो जाएँ,  पर बर्फ़ के गोले बनाकर खेलना, घर, पुतले और टॉवर बनाने का नन्द उठाने से नहीं चूकते। पिछले सप्ताह तो हद ही हो गई। जाने बादलों ने किससे ज़िद  ठान ली थी। ऐसी तूफ़ानी बर्फ़बारी हुई कि हफ़्ता भर थमने का नाम ही नहीं लिया। बर्फ़ से अँटे रास्ते रुक गए, गाड़ियाँ पूरी तरह से ढक गईं और जाम हो गईं, स्कूल कॉलेज बंद हो गए। सड़कों पर यातायात अवरुद्ध हुआ। फिसलन से कितनी ही दुर्घटनाएँ हुईं। कुछ घरों के तो वेंट तक बंद हो गए। हीटिंग बेअसर हो गई। आँगनों से बर्फ़ हटाते- हटाते लोगों की कमरें दोहरी हो गईं। मेरे घर की बालनी में भी इतनी ऊँची बर्फ़ थी कि आधे- आधे दरवाज़े गए थे। क़ुदरत के खेल भी निराले हैं, क्या भरोसा कब क्या कर दे, कैसा खेल दिखा दे। इंसानों की तरह प्रकृति के भी कई रूप होते हैं। जितने ख़ूबसूरत, उतने ख़तरनाक भी।       

1

हिम के झारे 

रजत धरा पर 

स्वर्ग नज़ारे।  

2

प्रकृति खेल 

जाने कब रोक दे 

जीवन रेल। 

-0-


रविवार, 22 दिसंबर 2024

1204

 कृष्णा वर्मा


1

भोर की बेला 

ओस चादर ओढ़े 

भीगा प्रभात 

धूप देखके नाची 

किरणों की बारात। 

2

मेघ गरजे

धूप ने किया पर्दा 

डरी- सहमी

हवाओं का तर्जन

मिटीं परछाइयाँ।

3

बहें हवाएँ 

भले बन आँधियाँ 

करें जतन 

घिरे हुए बादल 

फिर ना छा सकेंगे। 

4

देखोगे तारे 

तो मिलेगा सुकून

किसी को तारे 

दिखाने की सोची तो 

घेरेंगी बेचैनियाँ। 

 5

लग जाए जो

रिश्तों की पंचायत 

रिस जाते हैं 

फिर नहीं निभते 

दरके हुए रिश्ते।

6

भले हो बड़ा 

पहुँचा फ़नकार 

यादों के नक़्श

नहीं मिटा सकता 

हाथ की सफ़ाई से।

7

अंतस्थल का

मर गया सौहार्द

बची हैं बातें 

नेह है नदारद 

हास न परिहास। 

8

सुर्ख़ आँखों से

गिरते आँसुओं की

ख़ामोशियों में

जी भरकर रोईं

दिल की उदासियाँ।

9

मौन हो गईं

मेरी सब शोख़ियाँ

तेरे जाने ने

जड़ दिया है ताला

मेरे गुमान पर।

10

तुझे पाने को

गुज़रे किस दौर

जाने कितनी

लड़ी हैं लड़ाइयाँ

सही कठिनाइयाँ।

11

बदला दौर 

बेमानी बातें ना

हँसी ख़ज़ाने 

रुँधे गले में फँसीं 

वो स्मृतियाँ पुरानी। 

12

बुझ न सकी 

जो दिल की लगी 

फाँस- सी चुभी

उत्ताप की आग में 

हो गए धुँआँ-धुँआँ 

13

रुकीं गर्दिशें 

न बदला ज़माना 

सूखते पेड़

पतझड़ में पंछी 

बदल लें ठिकाना। 

14

दिली फ़रेब 

मन की दीवारों को 

करते पक्की 

देके धोखा दूजों को 

करें लोग तरक्की।

15

क्षणभंगुर 

लिखे जीवन पन्ने  

फिर क्यों डरे  

कर इश्क बसंती 

और जी- जीभरके।

16

बदलें ग्रह 

लिखें नई लक़ीरें

नया सितारा 

कहीं उकेरे सुख 

कहीं गर्म अंगारा। 

17

बड़ी उद्दाम 

होती आँख की आग 

प्रेम जलाए 

करे घरों को राख 

तीली बे सुलगाए।

18

लुटे भरोसा 

फँस जाते है शेर 

कुत्तों के जाल 

अपने हों शामिल 

जो दुश्मन की चाल।

19

दरवाज़े की 

साँकल है उदास 

तुम क्या गए 

तरस मरा पट 

थपथपाहट को। 

20

छोड़ गया वो 

खारे समंदर को 

आँखों किनारे 

घुल गया काजल 

खा-खा दर्द पछाड़ें।

21

अंतिम सीढ़ी 

हम आख़िरी पीढ़ी 

जन्मेंगे कभी 

हम जैसे अब ना

हम सा निबाहेंगे। 

22

मजबूती भी 

एक हद तक ही 

होती है अच्छी 

जो दृढ़ हुए ज़्यादा 

हो जाओगे पत्थर। 

-0-

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

1185

 

कृष्णा वर्मा 

1

साँसों को सेंक दिला 

हौके भर-भरके 

अंतर्मन बरफ़ हुआ। 

2

सपनों ने विष घोला 

तारी जगराते 

दिल ने जब दुख खोला।

3

नज़रों से नज़र मिली 

तिरछी चितवन ने 

सारी सुध-बुध हर ली।

4

चौमुख तेरा फेरा

खाली काग़ज़ पर 

जब नाम लिखा तेरा।

5

मुख पर सुख की लाली

नैन कमंडल तो 

अब भी ख़ाली-ख़ाली। 

6

दिल में सुलगें यादें 

आँसू सूखें ना

जब याद करूँ वादे। 

7

किसने भड़काया है

परखे बिन तूने

हमको बिसराया है। 

8

आसान नहीं जीना 

झूठा मुसकाके 

पीड़ाओं को पीना। 

9

चैती जब गाती है 

दिल के चोरों को 

रुत जमके भाती है। 

10

आमों पे बौर पड़े 

याद डसे तेरी

दिल हो टुकड़े-टुकड़े।

11

आँखों में रात गई 

मन में तुम घुमड़े 

जब-जब बरसात हुई। 

-0-

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

1170

 

1-प्रेम/भीकम सिंह

1

चले निशा में

चुभती -सी हवा ज्यों

जिस्मों की ओर

नि: शब्द प्रेम जागे

दहके पोर - पोर ।

2

पॅंखुड़ी होंठ

मुरझा घास -सी

पड़ी है देह

हवा ! तू रुख़ जरा

बदलके तो देख ।

3

याद नहीं है

कब कहा उसने

आओ पास में

मैं ठहरा हूँ अभी

बस इसी आस में ।

4

प्रेम में हम

चले सैंकड़ों बार

हाथ मलते

मेरे लिए भला वो

रुख़ क्यों बदलते ।

5

दिन खुशी के

सिमट गए पीछे

रातें कैद हैं

हाँ किसी घर में

बड़ी छत के नीचे ।

-0-

2- वसंत/ कृष्णा वर्मा

1

अधर -धरी 

चुप्पियाँ करें बातें 

खिलखिलाई  

मन तेरी आहटें 

बाँटें प्रेम सौगातें।

2

खिलते टेसू 

हृदय पुलकित 

हो सुरभित 

फागुन के स्वागत

बिखेरते अबीर। 

3


प्रीत उल्लास
 

फैले स्वर्णिम आभा 

हो अग्निभास 

अचम्भित है वन 

अरुणाभा पलाश। 

4

अद्भुत कला 

तेरी गुलमोहर 

सूर्य तपाए 

तू हो दैदीप्यमान 

महकता ही जाए। 

5

स्वर्ण रश्मियाँ 

तिरीं जब ताल पे 

धूप ने रखे 

प्रीत- भीगे अधर 

लहरों के गाल पे।

6

अद्भुत रिश्ता 

सूर्य की लालिमा से 

रचता चाँद 

समुद्र की देह पे

चाँदनी का नर्तन। 

7

मुदित ऋतु 

भरती लताओं की 

फूलों से गोद

बजाएँ ताली झूमें

गाएँ पत्ते सोहर।

8

वक़्त से हारे 

रुलते तिनकों से 

बुने चिड़िया

अपना आशियाना 

खुशियों का ख़ज़ाना। 

9

बेरंग जल 

मटमैली मिट्टी का

दृड़ निश्चय 

खिलाए बगिया में 

रंगबिरंगे फूल। 

10

भोर की बेला 

ओस चादर ओढ़े 

भीगा प्रभात 

धूप देखके नाची 

किरणों की बारात। 

11

डोलें चिनार 

अनारों के चमन 

छलके जब 

बुलबुल का कंठ 

उतरे है बसंत। 

12

तुमसे बँधा 

मेरा मन प्रिय ज्यों 

बँधा है रवि

जन्म-जन्मांतर से 

किरणों के बंधन। 

13

पुष्प रैलियाँ

बागों में भरा जोश 

उन्मादी हवा 

देखकर तितलियाँ 

खो बैठीं निज होश।  

14

फुनगी पर 

सिहरा अँधियार 

टहनी पर 

पंछी की सुगबुग 

गुहारे भिनसार।