बैसाखी
ऋता शेखर ‘मधु’
1
पावन है बैसाखी
स्वर्णिम फसलों पर
गाते मधुरिम पाखी।
2
होती आज कटाई
खेतों बीच रबी
कृषकों को है भायी।
3
बाली जब लहराई
चहका घर आँगन
चुनरी भी घर आई।
4
पायल जब- जब बाजे
गिद्धा बन डोले
बल्ले-बल्ले साजे।
5
खेतों में हरियाली
जगती बैसाखी
फसलें हैं मतवाली।
6
दूर परिंदा गाए
हर्षित दुल्हन ने
कंगन भी झनकाए।
7
पीपल की छाँव तले
नर्तन की धुन पर
ढोलक की थाप चले।
8
आमों में बौर लगे
कोयलिया कूकी
महुआ के दौर सजे।