परदेसी कान्हा/ शशि पाधा
कैसा उत्सव, कैसी होली
कान्हा तो परदेस गए
राधा से पूछें हमजोली
ताँका-चोका- सेदोका -माहिया-हाइबन
परदेसी कान्हा/ शशि पाधा
कैसा उत्सव, कैसी होली
कान्हा तो परदेस गए
राधा से पूछें हमजोली
तो मिले उपहार
-डॉ. जेन्नी शबनम
1.
राखी- त्योहार
भाई है शर्मसार
जेब है ख़ाली
कैसे ले उपहार
मँहगाई की मार।
2.
राखी है आई
भाई है परदेस
बहना दुःखी
वीडियो-कॉल आया
बहन मुस्कुराई।
3.
स्नेह का धागा
जोड़े रखता नाता
भाई-बहन
भले हों दूर-दूर
पर प्रेम अटूट।
4.
नन्ही बहना
पहनके गहना
चहक रही
राखी पर भइया
लाया प्यारा तोहफ़ा।
5.
राखी त्योहार
क्यों आता एक बार?
बहना सोचे-
हो हर इतवार
तो मिले उपहार।
-0-
मेरी पसन्द [पुस्तक झरे हरसिंगार से एक ताँका]/ सुरभि डागर
चुप्पी
से झरे
ढेरों
हरसिंगार
अबकी
बार
देखो
तो मुड़कर-
ये थे
बोल तुम्हारे।
यह
काव्यांश विरह, स्मृति और मौन की गहन अनुभूति को अत्यंत
संक्षिप्त शब्दों में व्यक्त करता है। कवि ने यहाँ चुप्पी और हरसिंगार जैसे
प्रतीकों के माध्यम से अनकहे प्रेम और बिछोह की मार्मिक अभिव्यक्ति की है।
चुप्पी
से झरे/
ढेरों हरसिंगार पंक्ति में हरसिंगार केवल फूल नहीं, बल्कि मौन में झरते भाव, अधूरे संवाद और स्मृतियों का प्रतीक बन जाता
है। हरसिंगार का स्वभाव ही रात भर खिलकर प्रातः चुपचाप धरती पर बिखर जाना है। यही
गुण मानवीय संबंधों के उस दर्द से जुड़ता है, जहाँ प्रेम बोलता कम है और बिखरता अधिक है।
अबकी
बार देखा
तो मुड़कर में एक विनम्र आग्रह है। यह
आग्रह शिकायत नहीं, बल्कि अंतिम आशा का स्वर है। इसमें प्रतीक्षा
भी है और इस संभावना का संकेत भी कि शायद एक बार पीछे मुड़कर देखने से बिछुड़े हुए
संबंधों में फिर से ऊष्मा लौट सके।
ये थे
बोल तुम्हारे" अंतिम पंक्ति पूरे काव्यांश को स्मृति के धरातल पर स्थापित कर
देती है। पाठक को ज्ञात होता है कि यह वर्तमान का संवाद नहीं, बल्कि प्रिय के कभी कहे गए शब्दों का स्मरण है। यही स्मृति वर्तमान की नीरवता
को और अधिक मार्मिक बना देती है।
शिल्प
की दृष्टि से यह रचना अत्यंत सघन और सांकेतिक है। कम शब्दों में अर्थात् 5+7+5+7+7= 31 वर्णों
में व्यापक भावभूमि रच देना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। हरसिंगार का
बिंब कविता को सौंदर्य और करुणा दोनों प्रदान करता है, जबकि चुप्पी उसे गहन मनोवैज्ञानिक आयाम देती है।
-0-
-डॉ. जेन्नी शबनम
ज़िन्दगी
हँसी
लिपटके रंगों से
खिले फूल हसीन,
मन चाहता
ओढ़कर रंगीनी
बनूँ गुलमोहर।
2.
पसरा हुआ
उदासी का मंज़र
रेगिस्तानी है फ़िज़ा
मन सहमा
हर शय ग़ुलाम
कैसा वक़्त है आया।
लगती
भारी
मन
में जो है बंद
सपनों
की गठरी
मन चाहता
खोलकर गठरी
सपनों को उड़ाती।
( छायाः रश्मि शर्मा)
4.
सुनता नहीं
बेपरवाह मन
करता मनमानी
जग से टूटा
पर नाता न छूटा
ये
जगत् मोह-माया।
5.
हे सूर्य देव!
ज़रा
रहम करो
धरती को बचाओ
मेघ
को भेजो
तपते जीव-जन्तु
करुणा दिखलाओ।
6.
बाण व
बात
हैं तीव्र हथियार
छूटे
तो लौटे नहीं
माने
न हार
करें
क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी।
7.
भले
अबेर
मिलती
है मंज़िल
देर
हो या सबेर
जीवन-पथ
सूर्य-सा
या चाँद-सा
चलना
निरन्तर।
8.
जीवन-तप
राह
में लाखों काँटे
कठिन
है चलना
यही
कर्त्तव्य
न कभी
घबराना
न कभी
ठहरना।
-0-
डॉ. जेन्नी शबनम
बैसाखी