सुभाष नीरव
1
रास्ते थे मेरे
कठिन तो बहुत
पर चला मैं
अपनी ही धुन में
मंज़िलों की तरफ़।
2
बेशक मिलीं
ठोकरें अनगिन
हार न मानी
बढ़ता रहा आगे
तभी पाईं मंज़िलें।
3
हँसें ज्यों फूल
काँटों में रहकर
दु:ख-सुख में
हम भी हँसे वैसे
महका लें जीवन।
4
पत्ता -पत्ता भी
झूम उठा पेड़ का
डालियों पर
फुदक कर जब
पंछी चहचहाए।
5
कौन टिकेगा ?
ले झूठ का सहारा
उसके आगे
जो उठाए खड़ा है
सत्य का परचम।
6
बच्चे–सा हठी
छोड़ता न अँगुली
ये दु:ख कभी
संग-संग चलता
जीवन-सफ़र में।
-0-
