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गुरुवार, 18 जुलाई 2019

874


शशि पाधा
1
चुप थी मैं भी
और मौन तुम भी
तुम्हारा स्पर्श
कुछ पिघला गया
मौन मुखर हुआ।
2
मेघा गरजे
गाने लगी बदली
राग  मल्हार
शाख- शाख पी रही
रिमझिम  फुहार।
3
आज भोर ने
घबराते-लजाते
ओढ़ ली धूप
मौसम गुनगुनाया
स्वर्ण सौगात लाया ।
4
शांत झील में
तैरना चाँदनी का
या कोई गीत
पहाड़ में गूँजना
सौन्दर्य-इन्द्रजाल।
 5
रहूँ ,न रहूँ
फर्क नहीं पड़ता
क्या किया मैंने
वही है मेरा नाम
वही पहचान भी।
-0-

शनिवार, 18 मई 2019

863


1-ममतामयी 
शशि पाधा
1
 यह कैसा नाता है
सुख दुःख दोनों में
दिल माँ भर आता है ।
2
चुनरी में बाँधी है
माँ की ममता तो
हम सब की साँझी है ।
3
चुप -चुप -सी रहती है
टूटे रिश्तों की
माँ पीड़ा सहती है ।
4
क्यों लगता न्यारा है
जिस घर माँ रहती
वो ठाकुर द्वारा है ।
5
बिन पूछे जान लिया
दुखड़ा बेटी का
माँ ने पहचान लिया ।
6
लोरी की तानों में
खुशियाँ झरती हैं
माँ की मुस्कानों में ।
7
नयनों से नेह झड़ी
माँ तो  नित भरती
झोली आशीष भरी ।
  -0-
2-डॉ.पूर्वा शर्मा
1
शाख- अंक में 
कली व किसलय 
किलकिलाएँ,
हवा गुनगुनाएँ
जब वसंत आएँ।
-0-
3- सुदर्शन रत्नाकर
 
कौन है आया
लौटके आँगन में
फूल  वहाँ खिले हैं।
हवा गा रही
पक्षी चहचहाए
ऋतुराज हैं आए।
-0-

बुधवार, 30 मई 2018

810



1-सेदोका
1-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
जिंदगी मेरी
ये रंग कैसे-कैसे
इसमें दिए डाल
ओ चित्रकार  !
अब इस चित्र से
बाहर तो निकाल ।

-0-
2-शशि पाधा
1
लो छू ही गई
बंद खिड़कियों से
सलाखों में लिपटी
गुलाबी गंध
रोम- रोम महका
सुवासित- सा तन
2
डगमगाई
सिहराई सिसकी
अँखियों से पिघली
मन की पीर
बह गई नदियाँ
टूटे बाँध -किनारे
3
परतें खुलीं
अतीत की चादर
सलवटों से झाँके
कोई निशानी
कब से बिसराई
वो ही प्रीत पुरानी
--०-
 2-ताँका
1-पुष्पा मेहरा
1
जल से बर्फ़
बर्फ़ से बना जल
सत्य अटल
जन्मे नारी औ नर
बढ़े सृष्टि –चरण ।
2
बाँधना नहीं
जड़ बन्ध से कभी
पाँव ये मेरे
काटना नहीं डैने
चूमूँगी आकाश मैं।
3
कली–कली में
भरो,सृजन-रस
हरो उदासी
छेड़ो मृदु  भैरवी
फिर जागें तन्द्रा से !!
4
घट पराग
छिपाए थीं कलियाँ
मधु से भरा
नटखट था भौंरा
उड़ा ले गया सारा !!
5
पाला था भ्रम
यहीं-कहीं फूलों का
चाही ख़ुशबू
घूमी जो घाट-घाट
मिले काँटों के बाँध !!
6
खुली जो आँखें
पढ़े चार अध्याय
नियतिबद्ध
अंतिम चौखट पे
धुँधले मिले सारे !!
7
रात ढलेगी
सूर्य फिर उगेगा
छाया हुआ जो
आतंक अँधेरे का
एक दिन छँटेगा ।
8
भरे उड़ानें
मन, यह बावरा
कभी न थके
ढंग पाले निराले
तौलता रहे डैने ।
9
छेनी से नहीं
हथौड़े से भी नहीं
खाता है चोटें
जब अविश्वास की
मन टूटता तभी ।
10
बादल बनूँ
आकाश से उतरूँ
धरा से मिलूँ
वेणी माँ की सजा दूँ
सीप का मोती बनूँ ।
11
मुझे ना मार
सुहाग मैं धरा का
घर पाखी का
कहता थका पेड़
पर,कत्ल हो गया 
12
नई है पीढ़ी
छिपाए है दावाग्नि
छेड़ो न इसे
जलेगी-जलाएगी
रोको,आँधी उत्पाती ।
13
सभ्य गढ़ में
बसी ,सृष्टि की देवी
चाहे सुरक्षा
अग्नि की ज्वालाओं से
खूंखार पशुओं  से ।
14
चिरैया प्यारी
ढूँढे ना मिली कहीं
सभ्य नगर
यात्राएँ विकास की
विनाश –रेल चढीं
15
मथा जो जग
मिले सुधा औ विष
किया चिन्तन
फेंकी विष –गागर
पी के छकी अमृत ।
16
पल दो पल
आओ ! हँस बोल लें
न जाने कब
समय का मछेरा
फाँसे हमे जाल में !!
-0-
Pushpa.mehra @gmail.com

-0-





गुरुवार, 27 जुलाई 2017

772

चोका
-डॉ सुधा गुप्ता
 सावन आये
बहना को भेंटने
बादल-साड़ी
बुँदियों का शृंगार
तीज-त्योहार
बहनें करती हैं
भरे मन से
सिंधारा-इंतज़ार
शाखों के झूले
चिड़ियाँ गातीं गीत-
'पिया-रंगीले'
बहना ने भेजा है
मैके सन्देश-
भइया, ज़रूर आना
राखी बँधाना
बनाऊँ पकवान
रोली-अक्षत
आरती का सामान
करूँ तैयार
आस-भरे नयनों
देखा करूँ दुआर!!
-0-
सेदोका
1-डॉ सुधा गुप्ता
1
यत्न से रखीं
तहाकर जो यादें
अतीत के सन्दूक
खोल बैठी जो,
देखा वक़्त-सितम,
सब चकनाचूर!
2.
पावस-साँझ-
उफनती नदिया
गहराता अँधेरा
जाना है पार
नौका कोई घाट
अछोर फैला पाट
3.
जिस आँख में
समाती नहीं बूँद
ढुलकती बाहर
अचरज है
कैसे तो समा गया
तेरा रूप-सागर
4
बरखा रानी
पूरी ठसक साथ
सजी शाही पोशाक
रथ सवार
खस-भीगी पंखी है
हाथ, शोभा अपार
5.
कल  शृंगार
बने गले का हार
भक्त जन निसार
आज निर्माल्य:
उतार फेंके गए
कचरा पड़ा द्वार!
6.
पड़ी बधाई
बंद मुट्ठी थे
जाने क्या-क्या ले
जाने की बेला:
सब कुछ बाँट के
पड़े हाथ पसारे  
-0-
-सुधा गुप्ता
120 बी /2, साकेत, मेरठ.
शिवरात्रि, 21. 07. 17.
-0-
2- 
शशि पाधा
  1
हिरना मन
वन -वन भटका
नित ढूँढे, न पाए  
कस्तूरी -गंध
मन में ही बसती
 फिर क्यों भरमाए
    2
 तारों की टोली
 चली अम्बर -गली
 करती खिलवाड़
आकाश गंगा
मुसकाए-निहारे
बाँटे खीर कटोरे
-0-