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शुक्रवार, 12 जून 2020

916

1-कमल कपूर
1
 ब्रह्मा कि है ये
 सर्वश्रेष्ठ रचना
 धवल रूप
 ज्यों सुबह की धूप
 संजीवनी-सी बेटी।
2
 हो बेखबर
 अपने भविष्य से
 इतरा रही
 उड़ती फिर रही
 तितली-सी लड़की।
3
 फूल चुनती
 नर्म ख़्लाब बुनती
 नन्हे नैनों में
 कपास-कुसुम सी
 मुलायम लड़की।
4
 मंज़िल दूर
 हो दुश्वार डगर
 नहीं मुश्किल
 साथ चले अगर
 प्यारा हमसफ़र।
5
 नभ- पटल
 और नदी-नीर को
 रंग नील में
 देती नित प्रकृति
 ये नीलाभ नज़ारे।
6
 पथ एकाकी
 मौसम अनुकूल
 या प्रतिकूल
 बढ़ लक्ष्य की ओर
थाम आशा कि डोर।
7
 उड़े हो धुआँ
 गुज़रे काले कल
 नदी किनारे
 बैठे जो चार पल
 गगन की छाँव में।
8
 माँ - जैसी धरा
 पिता-सा आसमान
 जुटाते सतत
 जीवन का सामान
 है ज़िन्दगी आसान।
9
 चिरैया बन
 उड़ने को तत्पर
 अनवरत
 खोजे मुक्त गगन
 ये अलबेला मन।
10

 फैला साँझ का
 सुनहरा आँचल
 रँगेगी रात
 इसे स्याह रंग में
टाँकेगी चाँद-तारे।

11
 
स्वर्णिम पथ
 सप्त अश्वों का रथ
 ले आए रवि
 रश्मिरथी की स्तुति
 गा रहे हैं सुकवि।
-0-कमल कपूर, 2144 / 9, फ़रीदाबाद-121006 हरियाणा
 मोबाइल – 09873967455


शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

यादों वाला पिटारा



1- डॉ भावना कुँअर

हौले से आया
दबे पाँव लेकर
ख्वाबों में मेरे
मेरी अम्मा का गाँव
बिना दस्तक
सपनों के दर पे
रख के गया
सुनहरी यादों के
चमचमाते
जुगनू से दीपक।
पहले लाया
पिटारे से अपने
मीठे से आम
नीम की निबौंलियाँ
जामुन,बेर
मक्खन और छाछ
गरम गुड़
अनोखा बड़ा स्वाद।
बैलों की जोड़ी
घुँघरुओं की बोली।
कुएँ का पानी
परियों की कहानी।
जली-बुझी सी
डिबिया की वो बाती
न बन पाती
जो पतंगों की साथी?
दूजा पिटारा
कचरे और फूँट
मेडों से कहे
वो किस्से भरपूर।
मकई रानी
ओढ़कर दोशाला
शान से खड़ी
है सेक रही धूप।
पोई की बेल
छत पे चढकर
नीचे न आती।
तीजा पिटारा जब
वो खुल जाए
भीनी माटी गंध को
खूब फैलाए।
तीज,होली, दीवाली
तो मेले कभी
जाने कितने रंग।
चौथा पिटारा
चुप न रह पाए।
मीठी गुँझिया,
खोया ओढ़े घेवर
है इतराए।
फूले न समाते थे
नीम के पेड़
चलती थी उनपे
झूलों की रेल।
कितने अनोखे थे
सारे ही खेल।
अब फ्रोजन खाते,
डिबिया नहीं
बल्ब टिमटिमाते।
पेड़ भी नहीं,
बोनसाई सजाते।
न मीठा पानी
बिजलेरी ही लाते।
अगले साल
उस गाँव जाऊँगी
बिना बताए
यादों वाला पिटारा-
अम्मा की बुनी
रंगबिरंगी लोई,
दरी,गलीचा
रंगीन टोकरियाँ
सब लाऊँगी
सूने मन के कोने
फिर हरषाऊँगी।
-0-
2-कमल कपूर

भावना! !!

संग तुम्हारे
बह रही हूँ मैं भी
आँसू नदी में
आसान नहीं होता
यादें भूलाना
और मुश्किल भी है
उन्हें बुलाना
क्यों जी नहीं सकते
उन्हें फिर से
कसक जगती है
सुहाने दिन
जो गुजर गये हैं
अब तो सिर्फ
साँस ही ले रहे हैं ।
-0-
3-सेदोका-कमल कपूर
1
पथ पे मेरे
बिछाते थे वो शूल
मैंने बिछाए फूल
तो हुआ यूँ कि
पलक पाँखुरियाँ
बिछाने लगे हैं वो।
-0-

सोमवार, 17 अगस्त 2015

गाएँ तीज के गीत।



1-भावना सक्सैना
1

चित्र : गूगल से साभार

चूनर- चूड़ी
मेहँदी महावर
ढूँढें सखियाँ
काजल, बिंदी, लाली
सब शृंगार
सौभाग्य के सूचक।
झूला पटरी
अम्बुआ की डार पे
हँसी -ठिठोली
मोहती सावन में,
रिझाएँ मन
बरबस पिय का,
गाएँ तीज के गीत।
  -0-
2-कमल कपूर
1
खुला गगन
परिंदों का डेरा
गीले नयन
सीले मेघों का घेरा
खिला चमन
कुसुमों का बसेरा
वन में हिरन
सपना सुनहरा
रूह -दर्पन
झाँके एक चेहरा
ये अंतर्मन
अमावसी अँधेरा
आ सूर्य खोजें
और लाएँ सवेरा
शेष जीवन
कलियों  का सेहरा
जो सिर्फ तेरा मेरा ।
-0-
2
देखिए ज़रा
समृद्ध वसुंधरा
हर ऋतु में
ओढ़े दुशाला हरा
उड़े हवा में
मेहंदी की सुगंध
महके निर्बंध
सूर की जन्म -स्थली
पावन और भली
साहित्य-गढ़
सुसंस्कृत सुगढ़
छुपाए सोग
हँसते गाते लोग
सबके वास्ते
सरल- सीधे रास्ते
सुर अपना
है मानव रचना
दुख में आह !
उपलब्धि में वाह !
रेशमी रातें
मलयजी प्रभात
मन तरंग
रँगी इसके रंग
बाबा फरीद !
तेरा फरीदाबाद
रहे सदा आबाद ।
-0-
कमल कपूर 2144/9सेक्टर
फरीदाबाद -121006,हरियाणा

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

ऋतु के रंग



कमल कपूर
1
सुरभि सारी
हवा पंखों से थाम
रचे जो इत्र
सतत अभिराम
गीत उसका नाम ।
2
नभ का नीर
धो रहा सावन को
हरता पीर
ये हरित आलोक
करे हिया अशोक ।
3
जन्मे जल में
पले दलदल में
पुष्प कमल
रक्तिम रंग रंगे
जल भीत  पे टँगे ।
4
कली खोलेगी
घूँघट धीरे -धीरे
फिर डोलेगी
हवा के संग-संग
रँग ऋतु के रंग ।
5
थाम के हाथ
चली आपके साथ
आज शान से
कल है बारी मेरी
रखें दोनों विश्वास ।
6
है भोर मीठी
हर देश शहर
और गाँव की
रोशनी में नहाई
फूलों की छाँव -सी।
7
मेघो में कवि
खोजे प्रेम की छवि
सूक्ष्म दृष्टि से
इसे सौंदर्यबोध
हैं कहते सुबोध।
8
सूर्य सी दुआ
हवा के काँधे चढ़
पहुँचे वहाँ
होता अँधेरा जहाँ
भरने को रोशनी ।
9
रवि की छाया
जल के दर्पण में
रचती माया
घुलते स्वर्ण कण
पानी में प्रति क्षण ।

 -0-