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शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

रेशमी कच्चा धागा



 ताँका
1-ऋता शेखर मधु
1
खींचता चोटी
दिन भर चिढ़ाता
फिर भी प्यारा
आओ मैं बाँध तो दूँ
रेशमी कच्चा धागा
2
रक्षाबंधन
मायके से जोड़ता
प्यारा बंधन
भाई संग भावज
बहन को दुलारी
-0-
2-कमला घटाऔरा
1
रक्षा बंधन
नहीं भूलना वीर
माँ के आँगन
तुम से छत्र छाया
तुम्ही यादें जागीर ।
-0-
3-पुष्पा मेहरा
1
आई श्रावणी
ले चाँदनी सा मन
प्यारे भैया का्स
झरा प्यार-अमृत
बँधा अटूट बंध ।
-0-
4-मंजु गुप्ता
1
आवाज सुनो !
कोख में ना मार माँ !
बेटी ना बची
कौन बाँधेगा राखी
भाई की कलाई पे ?
-0-
5-सविता अग्रवाल सवि
1
भैया के माथे
सुहाना लगे टीका
मुँह हो मीठा
बलाएँ ले बहना
मिलन क्या कहना!
-0-
2-सेदोका:
1-डाँ सरस्वती माथुर
1
नेह के तार
भैया के अँगना में
एक सूत्र बाँध के
स्नेह पिरोया
बहना को देख के
भाई ,जाने क्यों रोया?
-0-
3-चोका
1-पुष्पा मेहरा
1
भर  उल्लास
घर आया है आज
पावन पर्व
राखी के बंधन का
सजी कलाई
आशा के मोती -भरी
प्यारे भैया की
संगीत हर्ष भरा
गूँजने लगा
उड़े मधुर स्वर
लिपटा मन
विश्वास की तानों में,
बैठी ले आस
आज भी ये बहना
देखती बाट
भैया के आहट की ,
डटे सीमा पे
भुलाके घर-बार
बँधे प्रण से
चमक रहे हैं वे
शुभ्र कांति ले,
दीप यादों के जला
बैठी मैं यहाँ
सजा रही हूँ थाल
थाल में राखी
रोली , अक्षत - मिश्री
और   शुभेच्छा ,
तुम नहीं आ सके,
भेजूँ मैं  राखी
नेह से भीगी-तुम्हें
आज मैं मान भरी ।
-0-


2-सुदर्शन रत्नाकर

बहना मेरी
जब वह छोटी थी
नन्हे हाथों से
बाँधा करती वह
रंग बिरंगी
तितलीवाली राखी
सज जाती थी
मेरी सूनी कलाई
तुतला कर
हाथ पकड़ कर
कहती थी वो
भैया अब पैशे दो
वक्त बदला
बदल गई सोच
मेरे अपने
अनकहे प्यार को
स्नेह तार को
समझने लगी वो
भाई विदेश
बहना ससुराल
विवशताएँँ
बढ गई दूरियाँ
बीत गए वे
दिन बचपन के
झगड़ते थे
रूठते मनाते थे
आपाधापी में
पीछे है छूट गई
बचपन की
तितलीवाली राखी
नहीं भूलती
हर वर्ष है आती
राखी उसकी
शब्द कैसे गीले हैं
आसूँ खारे थे
संदेश तो मीठा है
धागा नहीं है
प्यार है यह मेरा
अगले वर्ष
ज़रूर आना भाई
तितलीवाली
राखी तुम्हें बाँधूँगी
पैसे नहीं माँगूँगी। 
-0-
 

-0-
3-कमल कपूर
1
भैया जा बसे
सात सागर पार
राह न सूझे
जो आऊँ तेरे द्वार
याद आ रहा
बचपन सुहाना
बीता जमाना
तुम्हारा रूठ जाना
राखी के दिन
मेरा वह मनाना
बांधके राखी
सुंदर औ बड़ी सी
जिसे कहते
तुम गंदी सड़ी -सी
मैं रो पड़ती
तुम चुप कराते
हाथों में मेरे
दो रुपए थमाते
अब न चाहूँ
धन गहना साड़ी
खैर ही चाहूँ
बस भाई तुम्हारी
रक्षा वचन
भी न माँगूँ तुमसे
माँगूँ औ चाहूँ
थोड़ा प्यार तुमसे
डाक से भेजी
मेरी राखी स्वीकार
मानूँ आभार
ये करो उपकार
तुम हो भाई
पापा की परछाई
मैं हूँ माँ जाई
इकलौती बहना
दूर रहना
मजबूरी ठहरी
पीर गहरी
दें यादें सुनहरी
तेरे भाल पे
टीका रोली चंदन
धागा न यह
है स्नेह का बंधन
बांधो यह राखी
शत शरद जियो
आशीष मेरी
सुख अमृत पियो
रक्षा कवच
जानो राखी को भैया
लूँ मैं प्रेम बलैंयाँ।
-0-

बुधवार, 1 अगस्त 2012

रक्षाबन्धन


1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
रक्षाबंधन
स्नेह अभिनंदन
प्रेषित की हैं
पाती नाम तुम्हारे 
ओ भैया प्यारे
बाँचो भाव हमारे
नैनों से दूरी
समझो मजबूरी
आने का मन
है घर का बंधन
तेरी कलाई
ना रह जाये सूनी
रेशम डोर
संग दुआएँ दीनी
अक्षत आशा
है कुंकुम विश्वास
नयन जल
भीगा तिलक सजा
मुस्कान नहीं
पर मन से गाया
मंगल गान
सब सुख -खुशियाँ
हर्ष अपार
हो, मन उजियार
स्वस्थ जीवन
स्नेही हों परिजन
सजे कलाई
रेशम धागा बाँध
प्यारी सी मेरी
मृदु बातों, यादों की
लो स्वीकार मिठाई ।
-0-
2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
रस निचोड़
जग-पावनता का
बहन बनी
सुमनों का सौरभ
हीरे की कनी
आरती -सी मधुर
दीप की ज्योति
भाव हैं छलकते
नेह -सम्बाल
टीका जब लगाए
सूर्य शर्माए
फुहार की तरह
बरस पड़ीं
थी शुभकामनाएँ
एक बार नहीं
सौ- बार ये जीवन
बहन-हित
खुशी-खुशी लुटाएँ
फूल बिछाएँ
यह पावन दिन
हर पल मनाएँ
-0-
3-डॉ सरस्वती माथुर
राखी पर्व पे
भाई करें मनुहार
आ री बहना
खींचें हैं बहिन को
भाई का प्यार
मखमली से धागे
बहिन बाँधे
भाई की कलाई पे
तो बँधें मन
आशीर्वाद दे भाई
भीगी आँखों से
खुश रह बहना
बहिन कहे -
आ तिलक लगा दूँ
लेके बलैया भैया !
-0-
4 - सुशीला शिवराण


सुनो कहानी
चित्तौड़ की रानी की
कर्णवती थी
नाम के अनुरूप
दिव्य-सुंदरी

खूब थी वो सयानी
मान बड़ा था
राजपूती आन पे
देती थी जान
अपने चित्तौपड़ पे
एक सुल्तान
था, बहादुरशाह
खोटी नीयत
चित्तौड़ को हड़प
रानी को पाऊँ
यही सोच दुष्‍ट ने
सेना सजाई
रानी कर्णवती थी
खूब सयानी
बचाना था चित्तौड़
खोज ली युक्ति
विश्वासपात्र -हाथ
भेज दी राखी
मुसलमाँ भाई को
दिल्ली के ताज़
साहसी हुमायूँ को
पाकर राखी
वे भूले जाँत-पाँत
करने रक्षा
किया सेना ने कूच
पहुँचे जब
हारा हुआ चित्तौड़
जल रहा था 
फैली थीं लपटें
कर्णवती भी
क्षत्राणियों के संग

कूदी अग्नि में
राजपुताना -आन
बचाने हेतु
कर लिया जौहर
देख दुश्मन
रह गया  विस्मित
मुगल सेना
आ पहुँची चित्तौड़
सुन खबर
हो रिपु भयातुर
लौटा स्वदेश
पछताए हुमायूँ
क्यों हुई देर
बहन की रक्षा मैं
कर न पाया
अपना वायदा भी
निभा ना पाया
बहन का बेटा था
विक्रमजीत
सिंहासन बिठाया
राजतिलक
करके हुमायूँ ने
संतोष पाया
रक्षाबंधन की ये
सच्ची है कथा
स्नेह की डोर बाँधे
अनजानों को
हिंदू-मुसलमाँ को
ऐसी महिमा
है स्नेह की डोर की
रक्षा के बंधन की।
 -0-