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शनिवार, 27 जून 2026

1223 -बनूँ गुलमोहर (सेदोका)

-डॉ. जेन्नी शबनम 


1.

ज़िन्दगी हँसी
लिपटके रंगों से
खिले फूल हसीन,
मन चाहता
ओढ़कर रंगीनी
बनूँ गुलमोहर।


2.
पसरा हुआ
उदासी का मंज़र 
रेगिस्तानी है फ़िज़ा 
मन सहमा
हर शय ग़ुलाम
कैसा वक़्त है आया।


3. 

लगती भारी

मन में जो है बंद    

सपनों की गठरी
मन चाहता
खोलकर गठरी
सपनों को उड़ाती।

( छायाः रश्मि शर्मा)

4.
सुनता नहीं 
बेपरवाह मन
करता मनमानी
जग से टूटा
पर नाता न छूटा

ये जगत् मोह-माया। 

5.

हे सूर्य देव!

ज़रा रहम करो 

धरती को बचाओ 

मेघ को भेजो  

तपते जीव-जन्तु

करुणा दिखलाओ। 

6.

बाण व बात
हैं तीव्र हथियार

छूटे तो लौटे नहीं

माने न हार 

रें क्रूर प्रहार
तन-मन छलनी। 
7.

भले अबेर

मिलती है मंज़िल 

देर हो या सबेर

जीवन-पथ 

सूर्य-सा या चाँद-सा 

चलना निरन्तर।

8.

जीवन-तप 

राह में लाखों काँटे

कठिन है चलना 

यही कर्त्तव्य   

न कभी घबराना    

न कभी ठहरना।   

-0- 

 

 

गुरुवार, 4 जून 2026

1222-नौतपा दैत्य

डॉ. जेन्नी शबनम


1.
नौतपा दैत्य
किसी को न छोड़ेगा
बचके रहो
घर में छुप जाओ
पानी पी के भगाओ।
2.
होगा बचना
सूरज बना आग
सब हैं डरे
कैसे करें उपाय
ग़रीब असहाय।
3.
जीव बेचैन
गर्मी से हैं बेहाल
बिजली गुल
घमण्डी बना सूर्य
रौद्र रूप दिखाए।
4.
हवा है शांत
बैठी है समाधिस्थ
धूप से जली
समाधि नहीं टूटी
हवा बनी है संत।
5.
हरता प्राण
सूर्य है मृत्यु-देव
नहीं बख़्शता
जीव-जंतु या नदी
पोखर या बावड़ी।
6.
जेठ महीना
बड़ा है तड़पाता
वह निगोड़ा
खुलेआम घूमता
जीव-जंतु छुपते
7.
सूर्य बेशर्म
ज़रा नहीं है शर्म
लू का गोला
फेंकके ख़ुश होता
चोटिल है दुनिया।
8.
नौतपा शत्रु
लू लेकर दौड़ता
चुनौती देता,
छाता-पानी हारते
जीव-जंतु हाँफते
9.
ओह गरमी
ज़रा करो नरमी
जीव बेहाल
जिसका नहीं घर
उसकी पीड़ा हर।
10.
आषाढ़ आओ
जेठ है तड़पाए
नीर बहाओ
सूर्य को समझाओ
ठण्डक को लौटाओ।
-0-

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

1194

 डॉ. जेन्नी शबनम



ज़िन्दगी

1. 

ज़िन्दगी चली
बिना सोचे-समझे
किधर मुड़े?
कौन बताए दिशा 

मंज़िल मिले जहाँ। 

2. 

मालूम नहीं 
मिलती क्यों ज़िन्दगी
बेइख़्तियार,
डोर जिसने थामे
उड़ने से वो रोके। 

3. 

अब तो चल 
ऐ ठहरी ज़िन्दगी!
किसका रस्ता
तू देखे है निगोड़ी
तू है तन्हा अकेली। 

4. 

चहकती है  
खिली महकती है
ज़िन्दगी प्यारी
जीना तो है जीभर
यह सारी उमर। 

5. 

बनी जो कड़ी
ज़िन्दगी की ये लड़ी
ख़ुशबू फैली,
मन होता बावरा
ख़ुशी जब मिलती। 

6.

फिर है खिली
ज़िन्दगी की सुबह
शाम सुहानी,
मन नाचे बारहा
सौग़ात जब मिली। 

7.

नहीं है जानी  
नहीं है पहचानी
राह जो चली,
ज़िन्दगी अनजानी
पर नहीं कहानी।

-0- 

शुक्रवार, 27 सितंबर 2024

1193


डॉ. जेन्नी शबनम  

 

बच्चे

1.
बच्चों के बिना 
फीका है पकवान
सूना घर-संसार,
लौटते ही बच्चों के 
होता पर्व-त्योहार। 

2.
तोतली बोली
माँ-बाबा को पुकारे
वो नौनिहाल,
बोली सुन-सुनके 
माँ-बाबा हैं निहाल।   

3.
नींद से जाग  

मचाते हर भोर
बहुत शोर
तूफ़ान साथ जाए
जाते जब वे स्कूल!

4.
गुंजित घर  
बच्चे की किलकारी
माँ जाती वारी
नित सुबह-शाम
बिना लिए विराम। 

5.
सुबह-शाम
होता बड़ा उधम,
ढेरों हैं बच्चे
संयुक्त परिवार
रौशन घर-बार। 

6.
बच्चों की अम्मा
व्यस्त रहती सदा
काम का टीला 

धीरे-धीरे ढाहती 

ज़रा भी न थकती।  

7.
जीव या जन्तु 

सबकी माँ करती 
बच्चों की चिन्ता,  
प्रकृति की रचना  

स्त्री अद्भुत स्वरूपा।  
-0-

बेटियाँ

1.
नन्ही-सी परी
खेले आँख-मिचौली,
माँ-बाबा हँसे
देखे थे जो सपने
हुए वे सब पूरे। 

2.
छोटी-सी कली
अम्मा छोड़ जो चली
हो गई बड़ी,
अब बिटिया नन्हीं 
सबकी अम्मा बनी। 

3.
नाज़ुक प्यारी
माँ-बाबा की दुलारी
होती है बेटी,
जाए पिया के घर
कर सूना आँगन। 

4.
आँखों का तारा
होती सब बिटिया,
माँ-बाबा रोए 

विदा हुई बिटिया  
जाए पी के अँगना। 

5.
घर का दर्ज़ा
देती सब बेटियाँ
दरो-दीवार,
जाएँ कहीं, सृजन 
करती हैं बेटियाँ। 

6.
बेटी की अम्मा
रहती घबराई
बेटी जो जन्मी,
किस घर वो जाए
हर सुख वो पाए। 

7.
रौशन घर
करती हैं बेटियाँ
जहाँ भी जाए,
मायका होता सूना

चहके वर-अँगना। 
-0-

ईश्वर

1.
हूँ पुजारिन
नाथ सिर्फ़ तुम्हारी
तू बिसराया
सुध न ली हमारी
क्यों समझा पराया?

2.
ओ रे विधाता!
तू क्यों न समझता
जग की पीर,
आस जब से टूटा
सब हुए अधीर। 

3.
ग़र तू थामे
मेरी जो पतवार
देखे संसार,
भव सागर पार
पहुँचूँ तेरे पास। 

4.
हे मेरे नाथ!
कुछ करो निदान
हो जाऊँ पार
जीवन है सागर
कोई न खेवनहार।  

5.
तू साथ नहीं
डगर अँधियारा
अब मैं हारी,
तू है पालनहारा
फैला दे उजियारा। 

6.
मैं हूँ अकेली
साथ देना ईश्वर
दुर्गम पथ
चल-चलके हारी

अन्तहीन सफ़र। 

7.
भाग्य-विधाता
तू जग का निर्माता 
पालनहारा,
सुन ले, हे ईश्वर! 
तेरे भक्तों की व्यथा। 
-0-

कृष्ण

1.
रोई है आत्मा
तू ही है परमात्मा
कर विचार,
तेरी जोगन हारी
मेरे कृष्ण मुरारी। 

2.
चीर-हरण
हर स्त्री की कहानी
बनी द्रौपदी,
कृष्ण! लो अवतार
करो स्त्री का उद्धार। 

3.
माखन चोरी
करते सीनाजोरी
कृष्ण कन्हाई,
डाँटे यशोदा मैया
फिर करे बड़ाई। 

4.
कर्म-ही-कर्म
बस यही है धर्म
तेरा सन्देश,

फैल रहा अधर्म 

आके दो उपदेश। 

 

5. तू हरजाई

मुझसे की ढिठाई,
ओ मोरे कान्हा!
गोपियों संग रास
मुझे माना पराई। 

6.
रास रचाया
सबको भरमाया
नन्हा मोहन,
देके गीता का ज्ञान
किया जग-कल्याण। 

7.
तेरी जोगन
तुझमें ही समाई,
बड़ी बावरी
सहके सब पीर
बनी मीरा दीवानी।

-0- 

गुरुवार, 20 जून 2024

1182-ज़िन्दगी बौनी

- डॉ. जेन्नी शबनम 



1.
दहलीज़ पे
बैठा राह रोकके 
औघड़ चाँद 

न आ सका वापस 

मेरा दर्द या प्रेम।

 2.

ज़िन्दगी बौनी
आकाश पे मंज़िल
पहुँचे कैसे?
चारों खाने चित है
मन मेरा मृत है।
3.

गहन रात्रि
सुनसान डगर
किधर चला?
मेरा मन ठहर
थम जा तू इधर।
4.

तुम्हारा स्पर्श
मानो जादू की छड़ी
छूकर आई
बादलों को प्यार से 
ऐसी ठण्डक पाई।
5.

ग़ायब हुए
सिरहाने से ख़्वाब
छुपाया तो था
काल की नज़रों से,
चोरी हो गए ख़्वाब। 

6.

कोई न सगा 
सब देते हैं दग़ा
नहीं भरोसा,
अपना या पराया

दिल मत लगाना। 
7.

मैंने कुतरे
अपने बुने ख़्वाब

होके लाचार,   

पल-पल मरके

मैंने रचे थे ख़्वाब।  

 8.

मैं गुम हुई
मन की कंदराएँ
बेवफ़ा हुईं,

कोई तो होगी युक्ति   

जो मुझे मिले मुक्ति।  

9. 
मेरे सपने 

आसमाँ में जा छुपे 

मैं कैसे ढूँढूँ

पाखी से पंख लिये 

सूर्य ने है जला  

10. 
मेरी तिजोरी
जिसे छुपाया वर्षों
हो गई चोरी
जहाँ ख़ुशियाँ मेरी
छुपी रही बरसों।

-0-

सोमवार, 8 अप्रैल 2024

1172-नैनों से नीर बहा

 

-डॉ. जेन्नी शबनम



1

नैनों से नीर बहा

किसने कब जाना

कितना है दर्द सहा।

2

मन है रूखा-रूखा

यों लगता मानो

सागर हो ज्यों सूखा।

3

दुनिया खेल दिखाती

माया रचकरके

सुख-दुख से बहलाती।

4

चल-चलके घबराए

धार समय की ये

किधर बहा ले जाए।

5

मैं दुख की हूँ बदली

बूँद बनी बरसी

सुख पाने  को मचली

6

जीवन समझाता है

सुख-दुख है खेला

पर मन घबराता है।

7

कोई अपना होता

हर लेता पीड़ा

पूरा सपना होता।

8

फूलों का वर माँगा

माला बन जाऊँ

बस इतना भर माँगा।

9

तुम कुछ ना मान सके

मैं कितनी बिखरी

तुम कुछ ना जान सके।

10

कब-कब कितना खोई

क्या करना कहके

कब-कब कितना रोई।

11

जीवन में उलझन है

साँसें थम जाएँ

केवल इतना मन है।

12

जब वो पल आएगा

पूरे हों सपने

जीवन ढल जाएगा ।

13

चन्दा उतरा अँगना

मानो तुम आए

बाजे मोरा कँगना।

14

चाँद उतर आया है

मन यूँ मचल रहा

ज्यों पी घर आया है।

15

चमक रहा है दिनकर

दमको मुझ-सा तुम

मुस्काता है कहकर।

16

हरदम हँसते रहना

क्या पाया- खोया

जीवन जीकर कहना।

17

बदली जब-जब बरसे

आँखों का पानी

पी पाने को रसे।

18

अपने छल करते हैं

शिकवा क्या करना

हम हर पल मरते हैं।

19

करते वे मनमानी

कितना सहते हम

ढ़ी है बदनामी।

-0-

 2-रमेश कुमार सोनी



1

पेड़ काँपते

चश्मा बदले माली

बढ़ई हुआ मन

दिखे सर्वत्र

आरी,कुल्हाड़ी संग 

बाजार को सपने। 

2

गुलाब हँसे

कँटीली चौहद्दी में

सौंदर्य की सुरक्षा

महँगा बिके

कोठियों,मंदिरों में 

महक बिखेरते। 

3

भोर को चखा

तोते की चोंच लाल

भूख ज़िंदा ही रही

फड़फड़ाती 

घोंसलों की उड़ानें

दानों के गाँव तक। 

4

मेघ गरजे 

स्वप्न अँखुआएँगे

खेत नहाते थके

दूब झूमती

धरा हरिया गई

मन -मोर नाचते। 


5

साधु- से बैठे 

भोर-साँझ का रंग

अँगोछे में समेटे 

पहाड़ जैसे

सुख निखरा नहीं

दुःख उजाड़ा नहीं। 

 

6

भीगी हैं लटें

उड़ रहा दुपट्टा

वर्षा में भुट्टा खाना

स्मृति ताज़ा

सौंदर्य दमका है

मिट्टी की सुगंध-सा। 

7

पिंयरी ओढ़े

रेत ढूँढती पानी

मीलों यात्रा करती

नीला आकाश

देख-देख हँसता

मेघ नकचढ़ा है। 

8

गर्मी छुट्टियाँ

साँप-सीढ़ी का खेल

रोज मन ना भरे

पासा उछला

वक्त जीतता सदा

तेरे-मेरे बहाने। 

9

कर्फ़्यू की आग

चूल्हे डरने लगे

अनशन में घर

शहर बंद

भूख छिपी बैठी है

कोई हँस रहा है।

10

यात्री जागते

नींद की ट्रेन चली 

किस्से चढ़ते रहे

गाँव उतरे

गप्पें लड़ाते बीता

तेरा-मेरा सफ़र।

11

पाठक गुम

उदास हैं किताबें

'न्यूज़' शोक में गए

वाचनालय

आलमारियाँबन्द

अज्ञान फैल रहा। 

12

जेबों ने देखी

बाज़ारों की रंगीनी

झोली खाली हो गई

किसान- मन

पसीना जब बोते

सधवा- सी चहकी। 

13

मैके से लौटीं 

साड़ियाँ चहकी हैं

घर महक रहा

रिश्ते खनके

लाज बाहों में छिपी

प्यार बरस गया। 

-0-