डॉ. जेन्नी शबनम
1
वक्त की हाँड़ी
तजुर्बों को औटके
पकवान बनाया
जो हैं अपने
उनको बुलाकर
भरपेट खिलाया।
2
सोच दानव
मुझमें भर क्रोध
मुझे बनाया हंता
वापसी नहीं
अपराध जो हुआ
रब का है फैसला।
3
काल मानव
मुझमें ढूँढ कमी
मुझे बताया व्यर्थ
लाख कोशिश
असफल ही रही
सदैव रही व्यर्थ।
4
वक़्त किसान
मुझमें खेती कर
बनाया उपजाऊ
लहलहाए
मुझमें संवेदना
सोचने की क्षमता।
5
मेरी निशानी
पुस्तक में पिरोई,
उम्र की साँझ ढली
वक़्त जो बीता
चाहूँ तो कहाँ खोजूँ
कबाड़ में पुस्तक।
6
करे गुहार
अब कौन किससे
सब ख़ुद बेहाल
इंसानियत
घुट-घुटके जीती
कैसी यह नियति।
-0-
डॉ. जेन्नी शबनम
हमारी आत्मा
करती जल्दबाज़ी
ज्यों हो अतिथि
वापसी को बेकल
रोके न रुके
चाहे सिर नवाएँ,
किया स्वागत
किया ख़ूब सत्कार
जीभर प्यार
ताकि वापसी भूले
रुकी ही रहे
सदा मुझमें बसे,
ज़िद्दी ये आत्मा
मुझसे है कहती-
''मैं हूँ अतिथि
रोको नहीं मुझको
मैं हूँ प्रवासी
दूजे जग की वासी
अल्प विराम
शरीर में विश्राम
मन जो भरा
फिर काया से मुक्ति
है मेरा काम'',
आत्मा कहाँ से आई
कहाँ था वास?
वक़्त पूरा करके
छोड़ती जिस्म
सब हो जाता ख़त्म,
आत्मा अतिथि
जिसे लौटना ही है
तय वक़्त पे
परमात्मा के पास
आत्मा अमर
मरता है बदन,
बुलबुला-सा
क्षणभंगुर प्राण
मोह अपार
जीवन का दस्तूर
जन्म व मृत्यु
होना है बारम्बार,
कभी न रुके
जीवन-मृत्यु-चक्र
हँसो या रोओ
कितना भी हो प्रीत
प्रकृति की ये रीत।
जीवन जाल ( सेदोका)
डॉ. जेन्नी
शबनम
1.
जीवन जाल
जो सुलझे न कभी
ऐसा यह जंजाल
मिलता नहीं
कोई ओर या छोर
न रास्ता किसी ओर।
2.
तमाम उम्र
अभिनय में बीता
सच कोई न जाना,
मुख पे हँसी
मन में व्याप्त पीड़ा
कौन समझ पाया?
3.
जीवन स्वाँग
पल-पल गँवाया
जीवन हुआ व्यर्थ
जी नहीं सकी
अंत समय आया
मन है पछताया।
4.
वक़्त देखता
टकटकी लगाए
अपना हर खेल,
उसे है पता
किसी का न चलता
उसपे कोई ज़ोर।
5.
चौसठ कला
लगे चौसठ दिन
गुरु संदीपनी ने
सिखाई कला
कृष्ण और सुदामा
बलराम भी साथ।
6.
मेरी सहेली
नहीं है तू अकेली
साथ है छाया तेरी
साहस रख
मत छोड़ना आस
रखना तू विश्वास।
7.
सुन्दर जग
बेजोड़ शिल्पकारी
किसने कब की थी?
धरा-गगन
नदिया व पहाड़
अजब कलाकारी।
8.
वक़्त प्रहरी
चौकीदारी करता
रात हो या दिन हो,
पर झेलता
सबका रंजो-ग़म
मगर न थकता।
9.
भेष बदले
वक़्त बहुरूपिया
सबको भय दिखा
ठठाके हँसे
ये नहीं नादानी
उसकी मनमानी।
10.
सब्र के फल
दुःख के पकवान
मैंने जीभर खाए
अंततः हारी
जीवन बना ख़ार
मन है तार-तार।
-0-
परदेसी कान्हा/ शशि पाधा
कैसा उत्सव, कैसी होली
कान्हा तो परदेस गए
राधा से पूछें हमजोली
लौट आने को क्या कह गए