शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

1229- निशानी

डॉ. जेन्नी शबनम

1
वक्त की हाँड़ी
तजुर्बों को औटके
पकवान बनाया
जो हैं अपने
उनको बुलाकर
भरपेट खिलाया।
2
सोच दानव
मुझमें भर क्रोध
मुझे बनाया हंता
वापसी नहीं
अपराध जो हुआ
रब का है फैसला।
3
काल  मानव
मुझमें ढूँढ कमी
मुझे बताया व्यर्थ
लाख कोशिश
असफल ही रही
सदैव रही व्यर्थ।
4
वक़्त किसान
मुझमें खेती कर
बनाया उपजाऊ
लहलहाए
मुझमें संवेदना
सोचने की क्षमता।
5
मेरी निशानी
पुस्तक में पिरोई,
उम्र की साँझ ढली
वक़्त जो बीता
चाहूँ तो कहाँ खोजूँ
कबाड़ में पुस्तक।
6
करे गुहार
अब कौन किससे
सब ख़ुद बेहाल
इंसानियत
घुट-घुटके जीती
कैसी यह नियति।
-0-

4 टिप्‍पणियां:

anjun20 ने कहा…

शब्द संयोजन बहुत उम्दा

बेनामी ने कहा…

इंसानियत
घुट-घुटके जीती
कैसी यह नियति।बहुत सुंदर । सभी सेदोका एक से बढ़कर एक हैं । हार्दिक बधाई जेन्नी जी। सुदर्शन रत्नाकर

शिवजी श्रीवास्तव ने कहा…

वाह, सभी सेदोका प्रभावी, तजुर्बे को ओटकर पकवान बनाने की कल्पना अभिनव एवं मौलिक है। बहुत सुन्दर। बधाई डॉ. जेन्नी शबनम जी

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

मेरे सेदोका की सराहना के लिए आप सभी का हार्दिक आभार