गुरुवार, 22 जुलाई 2021

979

  

1-सफलता का पाठ

पूनम सैनी 

1

ऊँचे ख़्वाबों की

मंज़िले भी है दूर

मुश्किलों भरी राह,

चुनौती खरी

सफलता मगर

सरल दाव नहीं

2

पीड़ा बहुत

देती है चुनौतियाँ

रोकती है बाधाएँ,

संभावना है

चोट खा गिरने की

गिरता नहीं कौन?

3

पथ के साथी

छोड़ भी दें शायद

मुसीबत में साथ

अकेले तुम

कमज़ोर तो नहीं

स्वप्न भी तो तुम्हारे।

4

 उड़ान भरो

ख़्वाबों के आसमाँ की

हौसलों के सहारे,

बूत हों

इरादे जो मन के,

मिट जाती मुश्किलें।

5

गिरना और

गिर के टूट जाना

लाज़िमी है बहुत।

रुकना मत,

समेटना खुद को।

मंजिलें अभी दूर।

6

गिरी बहुत,

ठहरी ना मगर

बहादुर चीटियाँ,

छोटा परिंदा

भेदता लेता  नभ

चुनौतियों के पार।

7

तुम सबल

फिर क्यों कतराते

जीवन है चुनौती,

बनो सहारा

अपना तुम आप,

लकीर खुद बुनो।

8

रचना श्रेष्ठ

प्रकृति की मनुज,

गुणों से अलंकृत,

सीखना तुम

असफलताओं से

सफलता का पाठ।

-0-


2-भीकम सिंह 

 1

नदी उमड़ी

खेतों का रुख़ किया 

वृक्ष छोड़के 

समतल - सा किया  

श्रम भी व्यर्थ या 

2

 ऊर्जा से भरे 

नदियों में छोड़े हैं

सूर्य ने घोड़े 

जो, लहरों में सोते 

खेत, जोतते- बोते ।

3

पके - से खेत 

पवन डाले डोरे 

दे-दे  झकोरे 

खलिहान बेबस 

चुप पड़ें है बस

-0-

3-कृष्णा वर्मा 

 1

डूबी हैं आँखें 

यादों के भँवर में 

हिचकियों में 

दर-बदर साँसें 

सुलग रहा मन। 

2

नयन भरे 

बादल कजरारे 

फिर न जाने 

सूखे पाँव सावन 

क्यों लाँघ गया गाँव। 

3

हवा बातूनी 

शाख पुष्प पत्तों से 

बातें बनाए 

हँस-हँस चंचला 

ख़ुश्बू चुरा ले जाए।

4

मेल-मिलाप 

तरसे अपनापा 

वक़्त का घाव 

सावन के झूले न 

घेवर में मिठास। 

5

छूटे अपने 

लड़खड़ाए पाँव 

कौन दे अर्थ 

डगमगाए भाव 

खोए हमसफ़र। 

6

स्वार्थ की गाँठ 

करके जीर्ण- शीर्ण 

चलो माँज लें

पतली हो गई जो 

नेह डोर हमारी। 

7

तम में घिरे 

क्यों रोते फिरें हम 

ओज का रोना

दीपक जलाकर 

आओ करें सवेरा।


8

तान प्रत्यंचा 

बिखेर रहा रंग 

रच रहा है 

रौनक़ मधुमास 

इन्द्रधनु आकाश।

9

रहें प्रेम में

दिल की धड़कनें 

जिनकी तेज़ 

रहते वही आगे 

वक़्त की रफ़्तार से।

10

फड़फड़ाएँ 

भीतर ही भीतर 

जाने कितने 

अनुभूत सत्य न 

कहे जाएँ शब्दों में। 

11

कैसे ख़ामोश 

रच के षडयंत्र 

काल के बाण 

दाग रहे निशाना 

मानव की ज़ात को

12 

कोई भी रिश्ता 

नहीं होता ख़राब 

ख़राब हैं तो

नीयतें जो रिश्तों को

करतीं बदनाम। 

 

-0-

4--डॉ. सुरंगमा यादव

1


झरें पुष्प से

कितने ही सपने
स्वप्न देखना
छोड़ें नैन कभी न
यही जिंदगी है न।
2
पुष्प व्यथित
मत होना तू प्यारे
कभी दुलारे
कभी छुड़ा दे डाल
यही हवा की चाल!
3
हस्त रेखाएँ
बाँचते ही रहते
आलसी जन
पुरूषार्थी उठाते
नित कर्म का प्रन।
4
मृदु वचन
अनमोल है धन
वैर मिटा
पल भर में करे
क्रोधाग्नि का शमन।
5
मेघ बरसे
अंकुरित हो उठा
धरा का मन
प्रतीक्षाओं को मिला
धैर्य का आज सिला।

-0-

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

978

 1-सुदर्शन रत्नाकर

1

पर्वत पर

बादल मँडराते

दिल हों जैसे

दीपक आशाओं के

जलते हैं रहते।।

2

श्वेत बादल

बहती ज्यों नदियाँ

आसमान में

कितनी हैं अद्भुत

प्रकृति की  निधियाँ।

3

मेघों का मेला

लगा नभ- गाँव में

धरती जगी

ओढ़ चूनर धानी

बरसा जब पानी।

4

दूर नभ में

उड़ रहे बादल

होड़ लगी है

इक दूजे से आगे

बढ़ने को आतुर।

5

काली घटाएँ

घिर आई अम्बर में

छाया अँधेरा

उजास की आस में 

दमकी है दामिनी।

6

भटक रहे

बादलों के टुकड़े

एक होने को

धरती देख रही

मिल कब बरसेंगे।

7

विभिन्न रूप

विभिन्न आकृतियाँ

कैसे लाते हो

सावन में बादल

रंग अनेक तुम।

8

उड़ी आ रही

बादलों की पालकी

बैठी दुल्हन

वर्षा शृंगार किए

धरती से मिलने।

9

बादल जैसे

लहराया आँचल

हवा के  संग

मिलने को आतुर

प्यासी वसुधंरा से।

-0-

2- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

1.

मेघ बरसे

भरी धरा की गोद

महकी माटी

बँटे गंध के नेग

इठलाई नदियाँ।

2.

सरसों नाची

अमराई बौराई

धरा लजाई

नेह वारुणी लिए

आया है ऋतुराज।

-0-

रविवार, 18 जुलाई 2021

977-रंगों से भरे

 

रंगों से भरे

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

1.

सगुन हुआ

नीलकंठ आ हैं

काला कौआ भी

छत पे काँव करे

आज पिया आएँगे।

2.

दौड़ रहे हैं

नीले नभ के बीच

मृगछौनों- से

काले धूसर मेघ

धरा हो रही हरी।

-0-

 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

976

 रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

1

शब्द-मंजरी

बिखरी उर-घाटी


प्रफुल्ल-प्राण

दिव्य-सुवास-बसी

तुम मन्त्रमुग्धा-सी।

2

शब्द-निर्झर

आकण्ठ झूमा उर

श्वास-तार पे

गीत हो सुरभित

मंत्रमुग्धा मन  में

 

रविवार, 20 जून 2021

974-पितृ -दिवस

 1-मानस पिता !

 प्रियंका गुप्ता


 यूँ तो हर किसी को बहुत लोग मिलते हैं, कुछ याद रहते हैं और कुछ साथ रहते हैं । साथ रहना...शाब्दिक नहीं, भावात्मक और मानसिक रूप से साथ...। 

 


आज पितृ दिवस है । आज के दिन किसी रस्म-रिवाज़ के तौर पर नहीं, बस दिल से ये संदेश अपने उन मानस पिता के लिए जो कभी गुरु की तरह थोड़ा गम्भीर रहे, कभी मार्गदर्शक बन के रास्ता सुझाया, कभी पिता की ही तरह चिंता करते हुए कष्ट में सम्बल बने तो कभी एक दोस्त की तरह चिंतामुक्त करते हुए हँसाया ।

 जिनसे हम कभी थोड़ा डरे भी तो कभी एक मुँहलगे बच्चे की तरह शरारत और लापरवाही करने से भी बाज नहीं आए । जिनसे मन की बचकानी बातें शेयर करते समय हमने कभी नहीं सोचा कि वो क्या सोचेंगे...और कभी अपनी बातें बताते समय आपने माना, बच्चा बड़ा हो गया ।

 अंकल का सम्बोधन देने वाले अपने उन्हीं फ्रेंड , फिलॉसफर एंड गाइड को आज के दिन की दिली शुभकामनाएँ और सादर प्रणाम ।

आज आपसे एक वादा...हम नहीं सुधरेंगे ।

क्योंकि आप हैं न...जो कुछ भी हो जाए, हमको कभी बिगड़ने ही न देंगे ।

 

ढूँढती फिरूँ

जब लड़खड़ाऊँ

पिता का काँधा ।

-0-

2- देखने की उत्कंठा

[आज सुबह मैंने स्वप्न में पिता को देखा वह मुझे देखने आ थे। जो मुझसे कहा, वह हाइबन के रूप में]

 रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

 


दैनंदिन आपाधापी में तृणमात्र समय का स्मरण ही नहीं रहा कि आने वाला कल जीवनदाता को समर्पित है।

पिता के अनंत यात्रा पर जाने के उपरांत उनकी अनुपस्थिति में यह दिन वैसे भी मेरे लिये सूना हो गया था।

सुबह से शाम तक के सारे क्रिया-कलाप से निवृत्त हो देर रात्रि मैं आँखों को विश्राम देने का प्रयास करने लगी। हालांकि नींद मुझसे कोसों दूर ही रहा करती थी। 

तंद्रा के झोंके में अचानक एक छवि दृश्यमान हुई।

आह! अत्यंत अद्भुत और अविस्मरणीय क्षण। पिता मेरे आसन्न हैं और मेरा मन मन्तव्य में लीन कि उनके स्वागत-सत्कार हेतु कोई समुचित प्रबंध नहीं।

आत्मा सर्वदा सर्वज्ञाता है। मेरे भावों के प्रत्युत्तर में बोले-"तुझे आज भी मेरी सुधि है इससे श्रेष्ठ व समुचित प्रबंध और क्या होगा बेटी? इस संसार में कौन किसे कितनी अवधि तक याद रखता है? मैं अधिक देर नहीं ठहरूँगा। क्षण भर को तुझे देखने की उत्कंठा मुझे यहाँ खींच लाई"

 पिता का प्रेम

बाल-कुशल-क्षेम

अभिलाषी है।

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