शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2022

1080

 

 1-जिंदगी की किताब! 

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

पढ़ रही हूँ

बेफ़िक्र होकर मैं

जिंदगी की किताब! 

तुमने लिखे

इसके पन्नों पर

उम्मीदें और ख़्वाब!!

2

फीके पड़ते 

चेहरे पर आई

चमक- दमक हो!

तुम्हारा प्यार

रंग लाया है, तुम-

दिल की धनक हो!!

3

पा लिए मैंने 

प्यार के फूलों के जो

चटख सुर्ख़ रंग!

उड़ने लगा

मन तितलियों- सा

खुशबुओं के संग!!

4

जाँचकर कि

मुझपर क्या बीती

तूने अकसीर दी!

दुआ का काढ़ा 

मैं घूँट- घूँट पीती

तभी चैन से जीती!!

5

रोज लगाई

अपनों ने ही आग

मेरी खुशी जलाई!

सिर्फ तुम्हीं से 

बचा- खुचा जो भी है

ये जीवन का राग!!

6

साथ हमारा

आखिरी दम तक

कोई कुछ भी करे!

एक तुम ही

जिसने टूटी हुई 

साँसों में सुर भरे!!

7

मुझे हमेशा

दी है शक्ति अपार

जग जीत लेने की! 

तुम्हारा प्यार

प्यार नहीं, ये मेरे 

प्राणों का है आधार!!

8

पिघला देता

उदासी की आँच को

तुम्हारा सच्चा नेह!

जिस तरह

तपती धरा पर

बरस जाता मेह!!

9

तुमसे बने

जो सपने सशक्त

हो गई अनुरक्त! 

बिठाकरके

पलकों पर तुम्हें

करूँ आभार व्यक्त!!

10

झनझनाए 

आज बर्षों के बाद

हृदतंत्री के तार!

नीरवता में

गाता तुम्हारा प्यार 

प्यारा राग- मल्हार।

11

तुमसे ही है

यह सुख- साम्राज्य 

कैसे चुकाऊँ मोल?

कि मेरे लिए 

अपना आराम भी 

तुमने किया त्याज्य!!

12

दुआ से चुने 

मेरी राह के काँटे

जब- तब गड़ते!

तुम्हें पाकर 

जमीन पर मेरे

पाँव नहीं पड़ते!!

13

खूँद- खूँदके

मेरे ख़्वाबों के पेड़

उसने किए ठूँठ

साथी नहीं था

सचमुच ही था वो

रेगिस्तान का ऊँट।

-0-

2- यादों के साये
रश्मि विभा त्रिपाठी

1
मेरे मन में
तुम्हारी सच्ची प्रीति
ठीक वैसे ही बसी!
ज्यों खींच लेती
अनायास किसी को
छोटे बच्चे की हँसी।
2
मेरे नीड़ को
जब उजाड़ा गया
तुझी ने खाई दया!
तेरे बल पे
फुदकती फिरती
मैं बनकर बया!!!
3
संग चलते
तेरी यादों के साये
मुझे बड़े भाते हैं!
चूमके माथा
फिक्र की लकीरों को
चुराके ले जाते हैं!!
4
सूनी आँखों के
हालात पर तुम
फफककर रोए!
तुम्हीं ने इन्हें
आबाद करने को
ख़्वाबों के पाँव धोए!!
5
मेरे पाँव जो
अँधेरे रास्तों पर
ठिठक- से जाते हैं!
प्यार का दीप
हथेली पे धरके
आप आ ही जाते हैं!!
6
बेशक दूर
एक- दूजे का हाथ
मगर थामकर!
चलते हम
तय करने साथ
ये ख़्वाबों का सफर।
7
तुम्हारी बातें
फूलों की है बहा
सुनके झूम जाती!
सच मान लो
तुम्हीं से आबाद है
ख़ुशबू का शहर!!
8
सफर में ये
सर पे धूप लिए
चल पा रही हूँ जो!
हर राह पे
रहा है संग- संग
साये की मानिंद वो!!
9
तुम्हारा हाथ
हकीम- सा हो गया
सर पर जो धरा!
अकसीर ये
पाते ही दुख- दर्द
छूमंतर हो गया।
10
जकड़ लेती 
जब उदासी मुझे
बेबात, बेवजह!

तो खोल देते
न जाने कैसे तुम
वो दिल की गिरह?
11
भरे दुख में
किसके दम पर
गा पाती हूँ मैं राग?
इसी बात पे
सारे श्रोता तुम्हारा
ढूँढ रहे सुराग!!

-0-

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

1079- और तुम आ गए!

रश्मि विभा त्रिपाठी


1

मरु में भी जो

मेरा यह जीवन

है खूब हरा- भरा!

पोषण देती

मनमीत तुम्हारे 

प्रेम की ये उर्वरा!!

2

तुम्हारा यह

आशीष कवच- सा

'तू सदा सुखी रह'

देखो तो अब!

मुझको छू लेने को 

कलपता कलह!!

3

अगर कोई 

कभी भी परखेगा 

मेरा मधुर हास!

वह पढ़ेगा 

मेरे इन होठों पे

तुम्हारा इतिहास!!

4

सिर्फ तुम्हीं से

दिनों- दिन चौगुनी

सुख की बढ़त है!

सबके आगे

तुमको श्रेय देना

बोलो क्या गलत है?

5

भूल गई हूँ

मेरे खिलाफ होती

अकाल की साज़िश 

तुम्हारा प्यार

जीवन के मरु में

भीनी- भीनी बारिश।

6

मेरे लिए ये

दुनिया तो प्रतीप

अँधेरों में धकेले!

राह दिखाता 

मुझको पल- पल

तेरे प्यार का दीप।

7

निराशा में भी

देके आशा के फूल

जीवन महकाए

तुम केवल 

प्रेम में देते रहे 

इसी बात पे तूल!

8

बिखरे पड़े

दुखों के तिनकों की 

कैसे लगाती तह?

तुम न होते

इस जीवन की जो

इकलौती वजह!

9

भूल बैठी थी

सारे गीत- ग़ज़ल 

और तुम आ गए! 

चुपचाप से

पाँवों में पहना दी 

खुशियों की पायल।

10

जैसे धरा के

तपते अधरों को

चूमती है बारिश!

उमर भर

यों प्यार मुझे देना

यही है गुज़ारिश!!

11

जब- जब भी

मेरे प्राणों पे बनी

उस पल तुम ही

दौड़करके 

आ गए मनमीत

देने को संजीवनी।

-0-

सोमवार, 26 सितंबर 2022

1078-तुम कौन हो?

रश्मि विभा त्रिपाठी


1

मेरे लिए तो

कठिन था झेलना

ये समय का शाप,

जो एक दिन

अचानक मुझसे

मिले न होते आप!

2

जो कहने को-

जन्म से थे अपने

मरता छोड़ गए

तुम कौन हो?

जिसकी बदौलत

जिए मेरे सपने!!

3

वे जो गए हैं

देके पीठ पे घाव!

पड़ने नहीं देते

तुम जरा- सा

मेरे जी पे दबाव

तो किसे दूँगी भाव?

4

दिखाई दिया

मुझे तेरे मन का

साफ- स्वच्छ दर्पण

इसी कारण

तेरे सामने हुआ

ये आत्मसमर्पण!!

5

आशा के बीज

मेरी आँखों में बोए

तूने सौंप दी मुझे

भरकरके

मुस्कान की गागर

जो छलके, भिगोए!!

6

आँखों में गड़ा

जब- जब भी काँच

चटके सपनों का

तुमने भरी

आशा तब मुझमें

आने नहीं दी आँच!

7

तुझे पाकर

मुझे बरसों बाद

जो मिला है आह्लाद!

सच में पाया

तेरे रूप में मीत

ईश्वर का प्रसाद!!

8

दुआ के बीज

प्रणय बो रहा है

तो बेबस बनके

दुर्भाग्य आज

मारकर दहाड़ें

खुद ही रो रहा है!

9

दुख की आज

उल्टी पड़ गई है

सारी की सारी चाल

उसे क्या पता!

मेरे पास मीत के

आशीषों की है ढाल!!

10

तम के आगे

मान ही लेती हार

अगर मीत तुम

चुपचाप- से

ये धूप का टुकड़ा

धर न जाते द्वार।

11

कोरा जीवन

कोई नहीं था रंग

और तुम आ गए

प्रेम का प्रिज्म

इंद्रधनुष- सी है

आज मेरी उमंग।

-0-

2-माँ तेरा ध्यान

रश्मि विभा त्रिपाठी

1
भाग का लेख
तूने जो भी लिखा है
जगदम्बिके!
कब टलेगी व्याधि
जरा पढ़के देख!!
2
तोड़ते विघ्न
जीवन लच- लच
फिर भी जीती!
माँ तेरा ध्यान ही है
मेरा रक्षा कवच!!
3
होगा कल्याण
तुझे जप करके
आस्थावान मैं!
अम्बिके तेरा नाम
मेरे तो चारों धाम!!
4
डूबते को है
तू तृण का सहारा
भवतारिणी!
तूने ही सदा मुझे
आकरके उबारा!!
5
मेरे सुख का
कर देना संधान
भयहारिणी!
जब- जब भी करूँ
मैं तुम्हारा आह्वान!!
6
तुम स्वीकारो!
माँ ये श्रद्धा के फूल
मैं बदले में
तुम्हारे चरणों की
चाहती बस धूल!!
7
मैं जानती हूँ
माता तुम्हारा क्रोध
इसीलिए तो
बाध्य हूँ स्वजनों का
झेलने को विरोध!!
8
आसुरी- से हो
अति ही कर डाली
मैं चुप, क्योंकि
माँ करुणामयी से
बन जाती है काली!
9
तुमसे कभी
कुछ न बच पाता
मैं क्या बताऊँ?
मन को पढ़ लेती
तुम हो मेरी माता!
10
बड़ा कठिन
जीवन का अध्याय
क्या करूँ अब?
माँ तुम ही बताओ
आज अच्छा उपाय!
11
चीरने वाली
रक्तबीज की छाती
इन्हें भी रोक!
माँ जाने क्यों बने हैं
अपने ही उत्पाती!!

-0-