शनिवार, 2 मार्च 2024

1161

 

जीवन-धारा

डॉ. सुरंगमा यादव



बद्रीनाथ धाम के लिए हम सब बदायूँ से सुबह सात बजे निजी वाहन से निकले। हल्द्वानी तक तो पहाड़ी और मैदानी रास्तों में अधिक अंतर पता न चला परन्तु उसके बाद हम जैसे -जैसे ऊपर चढ़ते गए पहाड़ काटकर बनाए गये गोल घुमावदार रास्ते रोमांच मिश्रित भय की अनुभूति कराने लगे। जब गाड़ी ओवरटेक होती,  तो नीचे गहरी खायी देखकर जान ही सूख जाती। पहाड़ों से बहते हुए झरने दुग्ध की धवल धार से प्रतीत हो रहे थे। मन में सहसा प्रश्न  उठा,  अपने  अंतस्तल से निर्मल, शीतल, शुद्ध जलधार प्रवाहित करने वाले पहाड़ों को कठोर क्यों कहते हैं? दूर तक फैले ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बहते हुए झरनों की पतली धार, आँसुओं की सूखी रेखा-सी  प्रतीत हो रही थी। शायद अपनी ऊँचाई  के कारण एकाकी पहाड़ स्वयं को ही अपना सुख-दुःख सुनाकर हँसते-रोते रहते हैं।  जागेश्वर जी पहुँचते-पहँचते अंधेरा हो गया। ड्राइवर ने रात्रि में आगे चलने से मना किया तो हम लोग रात्रि विश्राम के लिए वहीं रुक गए।  प्रातः हमने अपनी यात्रा पुनः शुरू की। दोपहर होते-होते हम उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बद्रीनाथ धाम पहुँच गए। अलकनंदा का जल हल्का हरा रंग लिए हुए इतनी तीव्र गर्जना और वेग के साथ बह रहा था मानो पहाड़ रूपी पिता के घर से विदा लेते समय नदी के मन में भावनाओं का रेला उमड़ पड़ा हो। जल इतना निर्मल कि उसमें पड़े हुए पत्थर भी साफ नजर आ रहे थे। यही पहाड़ी नदियां खिंचती चली जाती हैं सागर की ओर, अंततः लंबी यात्रा के बाद सागर में मिलकर ही विश्राम लेती हैं। जीवन भी एक लंबी यात्रा  है एक दिन उसे विश्राम लेना ही है। फर्क सिर्फ इतना है नदी को यात्रा की दूरी ज्ञात है, जीवन की यात्रा कब कहाँ समाप्त होगी यह अज्ञात है।  

जीवन गति
पथिक को अज्ञात
कहाँ है इति।

1160

 

 रश्मि विभा त्रिपाठी


1
जब तुम बेचैन रहे
मीत सुनो मेरे
भीगे ये नैन रहे।
2
हर रो मनाया है
तुमको छू न सके
दुख की जो छाया है।
3
मेरा मन तरसा है
तेरी आँखों से
बादल जब बरसा है।
4
इक पल न उदास रहो
तुम हर मौसम में
बनके मधुमास रहो।
5
उस पल में मैं जी लूँ
तेरी आँखों के
सारे आँसू पी लूँ।
6
तेरा मन मुरझाता
मैं जब देखूँ तो
मेरा जी भर आता।
7
जितनी खुशियाँ जग में
बस में हो तो मैं
रख दूँ तेरे पग में।
8
तुम दूर अजाबों से
खिलकरके महको
हर रोज गुलाबों से।
9
तुम जो हो मुश्किल में
रह- रहके उठती
फिर एक कसक दिल में।
10
ना तुम बेहाल रहो
मेरी एक दुआ
हर पल खुशहाल रहो।
11
मुसकाओ हर पल में
अपने दुख भर दो
तुम मेरे आँचल में।
12
दिन बीते आहों के
तुमने शूल चुने
सब मेरी राहों के।
13
मुझसे कब दूर रहे
तुम तो हर पल ही
मुझमें भरपूर रहे।
14
ये प्यार बड़ा गहरा
मेरी साँसों पे
तेरा ही है पहरा।
15
तुम मेरा हो साया
र्रे- र्रे में
मैंने तुमको पाया।
16
कैसी अब बेताबी?
सारी खुशियों की
तुम ही तो हो चाबी।
17
पुचकारा, जब रोई
प्यार निभाना तो
तुमसे सीखे कोई।
18
भूली गम सारे मैं
सोचूँ जब- जब भी
मैं तेरे बारे में।
19
राहों में जब रोड़ा
आया तो तुमने
ये हाथ नहीं छोड़ा।
20
बस इतना रब दे दो
उसके सारे गम
तुम मुझको अब दे दो।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2024

1159-माहिया

 

 रश्मि विभा त्रिपाठी
1


कोई तारा टूटे
माँगी एक दुआ
ये साथ नहीं छूटे।
2
जख्मों को सिलता है
तुम- सा साथी तो
किस्मत से मिलता है।
3
जब तू मुसकाता है
खुशबू का दरिया
बहता ही जाता है।
4
जिस पल तुम पास रहे
जीने का मुझको
उस पल हसास रहे।
5
माना बरसों बीते
तुमसे बिछुड़े पर
तुम मुझमें ही जीते।
6
तुमसे अपना नाता
कितने जनमों का
मन समझ नहीं पाता।
7
तुमको ऐसे पाया
तन के संग- संग ज्यों
रहती उसकी छाया।
8
हर रोज उजाले हैं
ख्वाब तुम्हारे ही
आँखों में पाले हैं।
9
खिड़की ये यादों की
जब भी खुलती है
ज्यों रातें भादों की।
10
देते हो रोज दुआ
हर इक मंजर में
मुझको महसूस हुआ।
11
तुमने अपनाया है
एक नया जीवन
मैंने तो पाया है।
12
सोना, चाँदी, हीरा
कुछ भी ना चाहूँ
तुम मोहन, मैं मीरा।

13

जब- जब भी मैं आऊँ
तो इस दुनिया में
हर बार तुम्हें पाऊँ।
14

जाना है तो जाओ
फिर कब आओगे
बस इतना बतलाओ।

-0-

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024

1158

 दहशत

डॉ . सुरंगमा यादव


वसंत ऋतु अपनी छटा बिखेरे कोकिल के स्वर में गा रही थी
पशु-पक्षी निर्भय विचरण कर रहे थे ; लेकिन सहमे हुए थेकोयल का स्वर भी उमंग जगाने में असमर्थ लग रहा थागगन में उड़ते हुए पंछी विमानों को न देखकर हैरान थे हवाई जहाज पिंजरे मे कैद पंछी की तरह एयरपोर्ट पर खड़े जैसे उड़ना ही भूल ग हों रेल की पटरियों को अवकाश दे दिया गया,चक्के जाम थेसड़कों पर सन्नाटा ही  सन्नाटा लंबी कतारों को न देखकर ट्रैफिक लाइटें भी हैरान थीं गाड़ियों और बाइकों की आवाज सुनने को सड़कों के कान तरस गये थे, हाँ पुलिस की गाड़ी का हार्न और एंबुलेंस का सायरन नीरवता  को तोड़कर दहशत पैदा कर देता था

 कोरोना की पहली लहर और देश में संपूर्ण लाकॅडाउनघर में बंद -बंद जी घबरा उठाशाम के समय घर से  थोड़ी ही दूर पर बने पार्क में जा बैठने  को मन उतावला हो उठादहशत भरे माहौल में लगभग तीन सौ मीटर दूर पार्क तक जाना लंबी यात्रा की तरह कष्टदायी लग रहा थासड़क पर कुत्ते निर्भय  सो रहे थे ,उन्हें इस समय न बाइक आने की चिंता थी, न गाड़ी- मोटर की थके कदमों से चलते-चलते मैं वहाँ तक पहँची तो देखकर हैरान रह ग कि बहुत सुंदर और सुव्यवस्थित रहने वाला पार्क बिना माली के उजड़े चमन -सा हो गया था पार्क की बेंच पर बैठकर एक नजर चारों ओर दौड़ाई, तो लगा जैसे पार्क कह रहा हो, हम भी क्वारंटीन हो ग हैहम से मिलने अब कोई नहीं आता।  बच्चे खेलने नहीं आते है बड़े-बूढ़ों के सुख-दुःख सुने अरसा हो गयामहसूस हुआ, जैसे प्रकृति भी अपनी संतानों के कष्ट देखकर दुःखी हो रही है हवा भी संकोच से चल रही थी,क्योंकि वायरस उसमें समाकर उसे भी बदनाम कर रहा थावसंत में पतझर का अहसास पहली बार हुआ
यह क्या हुआ
डराने लगी हवा
सहमे पात

-0-

 

 

 

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

1157

 

भीकम सिंह

1

 

नि: शब्द हुआ

दिल का अनुराग

याद मुझे था

जब फैली मुस्कान

भीतर में दु:ख था ।

2

प्रेम निशानी

छिप - छिप पहनें

ठुड्डी को छूले

धूल भरे पैरों से

गॅंवई -सी मोह - ले 

 

 

3

बाट जोहती

खेत की मेड़ पर

प्यार में खड़ी

पूस की पूर्णिमा में

काटे,अमा की घड़ी ।

4

प्रेयस तक

हुंची नहीं बात

एक मन था

डूबता - उतरता

प्यार में उस रात ।

5

प्रेम में पड़ी

कितना कह गई

एक झलक

करवटें फेरे, ज्यों

सवेरे - सी पुलक ।

सोमवार, 1 जनवरी 2024

1155

 

भीकम सिंह

1

लो, विदा हुई

एक और साल की

सोचें -विचारें

कैलेण्डर वॉल की

कुछ नये ढाल की ।

2

अस्त हुआ है

एक वर्ष का सूर्य

दु:ख सहते

नई तारीखें लेके

आओ, फिर बहते ।

3

पुराना वर्ष

प्रश्नों को छोड़ गया

कल के लिए

उदय हुआ नया

ज्यों बदल के लिए ।

4

ठेल -ठालके

जैसे तैसे बीता है

पुराना वर्ष

आओ नये के देखें

विषाद और हर्ष ।