रविवार, 10 जनवरी 2021

952

 मंजूषा मन

1

अम्मा ने रोपा

तुलसी का बिरवा

पावन हुआ,

घर, आँगन, मन

सुवासित पवन।

2

साँझ का दीया

तुलसी चौरे पर

अम्मा ने धरा,

नेह से सुवासित

पावन हुई धरा।

3

पूजा की थाली

सजे दीप अक्षत

प्रार्थना वाली

नित भोर जो माँगी,

कभी जाएँ न खाली।

शनिवार, 9 जनवरी 2021

951

 1-डॉoजेन्नी शबनम

1

जीवन जब आकुल है

राह नहीं दिखती

मन होता व्याकुल है।

2

हर बाट छलावा है

चलना ही होगा

पग-पग पर लावा है

3

रूठे मेरे सपने

अब कैसे जीना

भूले मेरे अपने

4

जो दूर गए मुझसे

सुध ना ली मेरी

क्या पीर कहूँ उनसे

5

जीवन एक झमेला

सब कुछ उलझा है

यह साँसों का खेला

-0-

2 -ज्योत्स्ना  प्रदीप 
1
सुरभित भारत- माटी 
हिन्दी  कण - कण में 
चाहे    पर्वत घाटी ।
2

ये आन सँभाले  है 
वीर  शहीदों   की 
ये शान सँभाले है।
3
हिन्दी के नारे थे 
मंगल पाण्डे से 
वो गोरे  हारे  थे ।
4
तीनों   दीवाने  थे
फाँसी के पल में 
माँ के गाने थे।
5

भारत  के  सेनानी
हिन्दी मान करें
बन जाएँ बलिदानी !
6
नवरस भर जाते हैं 
सात सुरों को  ले 
सुर -साधक गाते हैं ।
7

सावन रुत वासंती
होरी,कजरी की
हिन्दी से ही छनती ।
9
परिणय की  रुत आई
मधु-रस छलकाती
हिन्दी ज्यों  शहनाई ।

-0-

शनिवार, 2 जनवरी 2021

950-वो प्यारा गाँव

 रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'

 कुहासे की ठंडी चादर में लिपटी धरा.... बैठी है ठिठुरी हुई सी...भोर के जगने की आस में.... प्रार्थना में लीन कि कब बादल छटें... सूर्य उगे... धूप हर आँगन में बरसे...छत और चौबारा...घर और द्वारा... गर्म गुनगुने अहसास से भर उठे


सूरज दादा बादलों का लिहाफ़ ओढ़े आँखें मींचे देर तक सोये रहे... मगर ज्यूँ ही अपलक देखा.... श्वेत चादर सर से खिसक पड़ी... धरा मुँह उघाड़े पहले तो हँस पड़ी...फिर सोचने लगी

धीरे-धीरे गर्मी का ताप चरम पर पहुँचेगा...हिम-शैल भी पिघलने लगेंगे.... जेठ की तपती धूप जब तपा देगी...

झुलसती दोपहर फिर कहाँ विश्राम पाएगी ?

 

इस शहर में तो कोई ऐसी जगह नहीं ?बाट जोहती कि दिन ढले सन्ध्या रानी के आँचल में छिप जाएँ..फिर लू के गर्म थपेड़े संभवत: न सता पाएँ....

वो गाँव का बरगद आज भी बहुत याद आता है...न जाने किस हाल में होगा ?अब होगा भी या नहीं ?

रुआँसा हो गया मन...नहीं ! नहीं ! वो चिरंजीवी रहे...उसने लाखों को जीवन दिया...अपने आँचल में पाला है...

उसके समान कहीं कोई भी नहीं...एक वो ही है... जो सब पर ही अपना निस्वार्थ नेह लुटाने वाला है ...

बहुत बूढ़ा हो चुका होगा शायद पानी भी न देता होगा कोई उसे..वो अकेला होगा।किसी को याद आती होगी उसकी ....?

क्या स्मृतियों में हरा-भरा होगा वह अभी तक ?किसी ने कभी सुध ली होगी उसकी ?

जिसकी शाखाओं ने अपनी बाहों में भर जी भर हर एक बचपन झुलाया....

अपनी घनी शीतल छाँव देकर गर्मी के भीषण कहर से बचाया ।

वो प्यारा गाँव

जहाँ थे दानी वृक्ष

बाँटते छाँव ।