बुधवार, 18 मई 2022

1835-यह दिन बार -बार आए

 

 [आज आदरणीय सुधा जी का 89 वां जन्म दिन है। कई वर्ष पहले ( 2016)मैंने आप पर एक हाइबन लिखा था, जिसके कुछ भाग आज आप के साथ साँझा कर रही हूँ। ]

उसकी कहकशाँ की हमसफ़र बनी मैं उसके साथ चलने लगी। वह मुझे अपने भीतर फैले अंतरिक्ष  में ले जाती हुई अपने उस सांसारिक आँगन में ले गई ,जहाँ देश प्रेम की वीर गाथाएँ तथा गीत सुनती हुई वह बड़ी हुई थी। बँटवारे के समय वह


महज़ 13 वर्ष की रही होगी। उसको खुद  पता नहीं चला कि संवाद रचाने की आत्मीय संवेदना उस के भीतर कब पैदा हो गई। मस्तक में रौशनी का काफ़िला काव्य- धारा बनकर बहने लगा। आँखों की अनिंद्रा रातों के सावे सपने उसके भीतर खलबली मचाते रहे। वह अपनी जादूई छुअन से मौलिक अंदाज़ में रोज़ नया सिरजती रही और आज तक सिरज रही है। नई ऊँचाई को नतमस्तक होना उसकी पाक इबादत है।

मेरा मन बारिश की रिम -झिम में सरशार सराबोर हुआ उसकी कभी न खत्म होने वाली बातों से लबरेज़ हुआ चला जा रहा था। कभी -कभी मुझे लगता कि मैं अपनी पड़नानी से बातें किए जा रही हूँ। वह मेरे लिए आशीष का झरना है  और मेरे सपनों की नींव। अब वह अपनी किरमची (एक किस्म का लाल रंग) क्यारी से फूल बिखेर रही थी, "बंद कमरों में मेरा दम घुटता है। रंग -बिरंगी कायनात की मैं दीवानी हूँ। कुदरत रहकर बहुत कुछ मिला। मगर कोई ख़ुशी एकाएक नहीं मिली ,बरसों की मेहनत और प्रतीक्षा के बाद मिली है। मगर अभी तो छोप में से पूनी भी नहीं काती। जब तक अँगुलियों में जान है ,लेखन जारी रहेगा।"

 

ये हाइबन पढ़कर आप ने मुझे पत्र लिखा था उसे भी यहाँ पेश कर रही हूँ। जब जब भी मैं ये पत्र पढ़ती हूँ सुधा जी को अपने पास पाती हूँ।

 रूप तेरा विस्माद समुद्र 

आ बसिया है मेरे अन्दर।

 इन पँक्तियों में आप की किताबों का ज़िक्र किया गया है।

कभी वह किणमिण उजाले  में बैठकर धूप से गपशप करती है और कभी उसके हिस्से में आई चुलबुली रात ने कोरी मिट्टी  के दिए जलाकर ओक भर किरणें  से खुशबू का सफ़र तय किया है। अपने कलात्मक करिश्मों से वह मुहांदरा चमकाती गई जब कभी अकेला था समय। उसकी नई मंजिलों के दस्तावेज़ महज लफ्ज़ नहीं बल्कि उसके सफ़र छाले हैं

भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आपका आशीर्वाद यूँ ही बना रहे। 

डॉ. हरदीप कौर सन्धु

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रविवार, 15 मई 2022

1034

 

1-छलना

प्रियंका गुप्ता 

 

कभी कभी ऐसा क्यों होता है कि हम बहुत अच्छे से जानते-बूझते हुए भी कि कोई रिश्ता हमें छले जा रहा है, उसे निभाते जाते हैं

 

इसके पीछे क्या भावना काम करती है? उस रिश्ते के प्रति हमारा प्यार, समर्पण, मोह, वफादारी होती है? या दुनिया और समाज का भय, रिश्तों की मर्यादा आदि होते हैं या फिर यूँ  ठगे जाने को ही हम अपनी नियति मान कर चुप रह जाते हैं ?

 

कई बार हमें छलने वाला हमारी चुप्पी से ये समझ लेता है कि हम उसकी छलना से नावाकिफ़ हैं और वो पूरी दिलेरी से छल कि चला जाता है और गाहे-बगाहे विरोध दर्ज़ होने पर  हमारे आगे अपनी नकली सच्चाई का चूरन फेंक देता है।

 

वैसे तो चूरन से हाजमा दुरुस्त होता है, पर धोखेबाजी के ऐसे चूरन से किसी की बेवफ़ाई को चुपचाप हज़म कर जाना कहाँ की बुद्धिमानी है?

 

छल करना

कभी जाना ही नहीं

आदत तेरी |

 

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2-अहम

-सुदर्शन रत्नाकर

 

        उन दोनों के बीच थी, तो केवल खामोशी जो पहले कभी हुई  ही नहीं। जैसे किसी ने उफनते दूध में पानी के छींटे मार दिए हों। क्या ये छींटे पहले नहीं पड़ सकते थे या उफान आने से पहले ही अहम की आँच धीमी हो जाती। नहीं,  ऐसा तो कुछ नहीं हुआ और रिश्ते ऐसे चटके कि दरारें पड़ते -पड़ते खाई बन गई। वो तो बननी ही थी। जब दो अहम टकराते हैं, तो ख़ालीपन अपने आप बन जाता है। ऐसा होता ही है। और उन दोनों के बीच भी तो कुछ ऐसा  ही हुआ था । नई बात तो थी नहीं। पर कोई बात तो अलग थी। सब कुछ तो ठीक था, ठीक चल रहा था। दोनों ने एक दूसरे से अथाह प्रेम किया था ,डूबकर  किया था। एक दूसरे की भावनाओं को समझा भी था। फिर नासमझी बीच में कहाँ से आ गई। नासमझी ही तो थी जो सम्बन्धों में अहम को आने दिया और नाव में  छेद से पानी की तरह वह अंदर आता गया और उसने दोनों की गृहस्थी की नाव को ही डुबो दिया।

        पेड़ -पौधों की परवाह न करो तो खर- पतवार उग आते हैं और पौधों का अस्तित्व ही नहीं रहता । उनके जीवन में भी अहम ऐसा घुसा कि दोनों के बीच पनपे प्रेम सम्बन्धों का अस्तित्व ही विलीन हो गया।  

ऐसा तो नहीं है कि खर- पतवार निकाले ही नहीं जा सकते । पौधों को पनपने देने के लिए उन्हें  कोशिश करके निकाला ही तो जाता है। दोनों एक दूसरे के  आपने -सामने बैठे यही सोच रहे थे। सोचना ,सही भी था । सम्बंधों को  भी पनपने और उनके  अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अपने -अपने अहम को दिल  से निकालना होता है । टूटना  या तोड़ना नहीं, जुड़ना ही जीवन है।

 

टकराते हैं

तोड़ते हैं बंधन

झूठे अहम।

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-सुदर्शन रत्नाकर

ई-29,नेहरू ग्राउंड ,फ़रीदाबाद 121001

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सोमवार, 9 मई 2022

1033

 1-भीकम सिंह 

1

वर्षा की घड़ी 

प्रेम के छाते खुले 

तंग-सी गली 

सोते-जागते मेघ 

मचा हड़बड़ी ।

2

प्रेम की नाव

बाँह फैली नदी में 

खोई -सी चली 

हवा दे हिचकोले

डग-मग-सी डोले 

3

दिल में जब

किसी की चाहना की

उमड़ी बात

तो आँखों में गुजरी 

बैचैन सारी-रात 

4

स्नेह से आँखें

भावों का सम्बल ले

जब मुस्काती

बेजान-सी पलकें 

आँसू, रोक ना पातीं

5

 सजनी द्वार 

पगध्वनि से खोले 

बिना दुराव 

रोम -रोम गा उठे

मुस्काएँ  मूक भाव 

6

रखा था प्रेम 

झोले में सहेजके 

थोड़ा शब्दों में 

कभी ना खोल पाए 

कभी ना बोल पाए 

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 2-कृष्णा वर्मा

1

गुदगुदाएँ 

तुम्हारे अहसास

नदी में नहा 

छुए गीले हाथों से  

जैसे चंचल हवा। 

2

ख़्वाब तुम्हारे 

पसरे पलकों पे

आँखों को गिला 

बातूनी तन्हाई ने 

हमें सोने ना दिया। 

3

मुँदे नयन 

आन छुएँ तुम्हारे 

सलोने स्वप्न  

धड़के पलकों का

नर्म नाज़ुक दिल। 

4

मंद हवा- सा 

छुआ तन तुमने 

हर्षित रोम 

उद्वेलित हो मन 

बीजे प्रेम के बीज।

5

प्रेम के धागे 

होते बड़े नाज़ुक 

प्रत्येक मोती 

अपनी ख़्वाहिशों का 

गूँथना सलीके से।  

6

दूज के चाँद 

हुए तुम प्रीतम 

तरसें नैन 

आ मिलूँ उड़के

पाऊँ कहाँ से पंख। 

7

कई दिनों से 

हुआ नहीं मिलना 

रूठे हो पिया 

या बदला ठिकाना 

बेकल फिरे जिया।

8

प्रेम में डूबा 

मिली न कोई राह 

चुप्पी का शोर 

आँसू का समुंदर 

बची सम्पदा।

 9

उर निकट 

रखी सहेजकर

प्रेम की पाती 

बुनें सुषुप्त नैना 

सपने सौ हज़ार। 

10

काट लूँगा मैं 

अकेले जीवन का 

तन्हा सफ़र 

साथ मिले जो तेरा 

खिले मरु बहार। 

11

बाँध लो ऐसे 

बंधन मुझे प्रिय 

जन्मों न दूजा 

फिर कोई बंधन 

मुझको बाँध पाए। 

12

उलझें शब्द 

नि:शब्द हों नयन 

पढ़ लें मौन 

रहे साथ हमारा 

ऐसी उमर तक। 

13

मन में जोग 

प्रेम कर तुमसे

लगाया रोग

पलकों को अश्कों से 

हुआ गहरा प्रेम।  

14

थके हैं नैन

तेरी बाट निहार 

तड़पे जिया

बिछुड़ी निमाणी ज्यों 

कोई कूंज- कतार। 

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शनिवार, 7 मई 2022

1032-मन्नत के जो धागे

 मन्नत के जो धागे 

 रश्मि विभा त्रिपाठी


मेरी खातिर


नित नेम से बाँधे

हर पहर

मन्नत के जो धागे

दुख सारे ही

दुम दबा के भागे

उन धागों में

मेरा सुख अकूत

पिरोके तूने

आँँसू से मन्त्रपूत

कर दिया है

चली टटोलने को

चिंता की नब्ज

छूकर मेरा माथा

एक पल में

धगड़कर गाँठ

धीरे से कसी

आँचल के छोर में

खुद-ब-खुद

खुल गईं बेड़ियाँ

उन्मुक्त उड़ी

साँझ या कि भोर में

आस का नभ

चूमूँ हो विभोर मैं

न कभी बही

हार की हिलोर में

कब सहमी

सन्नाटे के शोर में

मेरे सर से

'सेरा' उसारकर

आधि- व्याधि को

फेंका उतारकर

मेरी अक्सीर

तेरे पोर- पोर में

जगाते भाग

माँ तेरे ये दो हाथ

दुआ से दिन- रात।

 

('सेरा' अर्थात अनाज का वह थोड़ा भाग, जो माँ अपनी संतान की सलामती के लिए उसके सर के ऊपर सात बार घुमाकर अलग रख देती है दान के हित।

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मंगलवार, 3 मई 2022

1031- रश्मि विभा त्रिपाठी की रचनाएँ

 रश्मि विभा त्रिपाठी की रचनाएँ

1- सुख के बीज (चोका)

 

मेरे दुख को


देख दुखी हो जाते

जग- जंगल

जरा चैन ना पाते

दिन औ रात

दोनों हाथ उठाते

दुआ में बस

पिघलाते, गलाते

पीड़ा के हिम

गालों पर तैराते

हास के कण

जो तुमको लुभाते

तुम कहीं से

ढ़ूँढके ले ही लाते

सुख के बीज

घर में छिटकाते

फुलवारी- सा

आँगन महकाते

प्रिये! धन्य हो

जोड़ नेह के नाते

जीवन को जिलाते।

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2- अग्नि- परीक्षा(सेदोका)

1

तुम सँभालो

साँसों का ये सितार

खण्डित तार- तार

कान्हा मैं चाहूँ

वंशी की रसधार

डूबूँ, उतरूँ पार!!!

2

घट- घट के

अधिवासी केशव

सुमिरूँ, तरूँ भव

तुम्हीं से पाया

जीवन का उद्भव

मैं थी केवल शव!!

3

औरों से मिला

नाम मुझे पगली


निश्चलता की गली

श्रीकृष्ण की ही

निष्ठा पर मैं चली

नाग- नथैया, बली।

4

भाव-भक्ति का

घिस रहा चन्दन

मन मेरा मगन

श्रद्धा का ध्येय

श्री धाम वृंदावन

साँवरे का दर्शन।

5

मेरा जीवन

तुम्हारे ही हवाले

तुम ही रखवाले

उन्मुक्त करो

तोड़ो पिंजर-ताले

आओ मुरली वाले।

6

घुमड़ रहे

दुख- बादल काले

मन को तू बचा ले

बहा दे सुर

अधरों से निराले

ओ मुरलिया वाले।

7

अधर्म का ही

बढ़ता अत्याचार

मचा है हाहाकार

हे कृष्ण! करो

निरीह का उद्धार

लो पुन: अवतार।

8

भरी मटकी

नन्ही- नर्म हथेली

छींके से जा धकेली

बाल गोपाल

तुम्हारी अटखेली

अनबूझी पहेली।

9

चले आते हैं

वे जिसके भी पास

बँधा देते हैं आस

सदा स्वच्छंद

मन रचाए रास

श्रीकृष्ण का जो दास।

10

ईश सँभालो

तुम सारा प्रबन्ध

रखो मुझे निर्बंध

लिखती रहूँ

जीवन का निबंध

होके पूर्ण स्वच्छंद।

11

कभी हो इति

विप्लव के गान की

दुख, अपमान की

अग्नि- परीक्षा

अरण्य में प्राण की

राम!!! रोए जानकी।

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3- मन मेरा अघाया(ताँका)

1

तुम्हीं से दृढ़

जीवन का विश्वास

और मन में

खिले प्रेम- पलाश

प्रफुल्ल श्वास- श्वास।

2

पावन प्रेम

अँजुरी मेरी भरा

न्यारा सौरभ

जीवन में बिखरा

खिला मन- मोगरा।

3

बियाबान में

प्रेम की घटा घिरी

तो खिल उठी

मन की मौलसिरी

श्वासों में खुश्बू तिरी।

4

स्नेह का सोम

तुमसे जो पाया

तृप्ति- उत्सव

जीवन ने मनाया

मन मेरा अघाया।

5

दुख भंजन

तुम्हारी प्रार्थनाएँ 

सदा बचाएँ

कभी बाधा-बलाएँ

मुझे छू भी न पाएँ।

6

तुम जो आए 

तो सूखे-मुरझाए

प्राण औ मन

फूले नहीं समाए

हँसे, खिलखिलाए।

7

संसार साधे

मेरी पीठ पे बाण

हथेली पर

तुमने धर प्राण

मुझे दिया है त्राण।

8

नेह- निधि ले

प्रिय घर जो आए

प्रसन्नता का

मन पर्व मनाए

मंगलचार गाए।

9

मेरे लिए कीं

तुमने प्रार्थनाएँ

मुमूर्षा में भी

मेरे प्राण जी जाएँ

मोद में हैं आशाएँ।

10

जुड़ा तुमसे

जबसे मेरा नाता

आनंदगान

मन झूमता-गाता

मुझे दुख छू न पाता।

11

दुआ के मंत्र

नित्य रहा उच्चार

पग-पग पे

मेरा तरनतार

बना तुम्हारा प्यार।

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