सोमवार, 12 अप्रैल 2021

967- मेरी आराध्या

रश्मि विभा त्रिपाठी 

 फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि फुलौरा दूज का दिन। माँ रोज की दिनचर्या की तरह ही पूजा घर में अपने आराध्य की सेवा में लीन।

"पुष्पं समर्पयामि!


आज के दिन का खास महत्त्व है बेटी! ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण इस अवसर पर फूलों की होली खेलते हैं और रंगोत्सव का शुभारम्भ करते हैं। इस दिन से सब पर फागुनी रंग चढ़ने लगता है”-कहते हुए दीप प्रज्वलित करने लगीं।
"मेरे लिए भी यह दिन विशेष महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इसी शुभ दिन पर ईश्वर ने तुम्हें इस धरती पर भेजा था। मेरी प्यारी माँ जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ"
"अरे तुझे याद है?"
"भला मैं कैसे भूल सकती हूँ माँ? बताओ क्या दूँ तुम्हें?"
हँसकर मेरे सर पर स्नेह से हाथ धर कह उठी "मेरे ईश ने मुझे सबसे सुंदर उपहार तेरे रूप में दिया है बेटी और मुझे क्या चाहिए?"
"आ बेटी ईश चरणों में वंदन करें"
"माँ मेरी ईश तो तुम ही हो"-
मेरी आराध्या

तूने जीवन दिया

वंदन तुझे।

जीवन के 74 वसंत देख चुकी तुम्हारी आँखों ने मेरे सुखद भविष्य के न जाने कितने स्वप्न देखे हैं,उन स्वप्नों को साकार करने हेतु तुमने कई संघर्ष झेले हैं।
मेरी खुशी के लिये तुम हर मुश्किल से लड़ी होकोई विषम परिस्थिति यदि मेरे समीप आई, तुम सामने चट्टान बनकर खड़ी हो गईं मुश्किलें तुम्हें झुका नहीं सकीं जैसे कि तेज रफ्तार हवाएँ कभी पर्वत को हिला नहीं पाईं।दुखों की आँधी मुझे छू भी नहीं पा।तुम्हारी ओट में मेरी हर साँस सदैव सुरक्षित रही है
मैं कृतज्ञ हूँ माँ
तुम्हारे प्रेम से सुवासित मेरा जीवन...तुम्हारी मातृत्व छाँव में हर घड़ी हँसता मुस्कराता रहा हैतुम हजारों बरस जियो माँ। तुम्हारा साया मेरे सर पर सदा यूँ ही रहे।
मैं बलिहारी
मिली कल्पवृक्ष माँ
शैलकुमारी।

मंगलवार, 30 मार्च 2021

965-मेरी कामना

  पूनम सैनी

 

नयी डगर

अनजान स


पुराने
ख़्वा

आरम्भ मिला नया 

कलम वही

बदला है अंदा

मार्गदर्शन

बना रहा सहारा

उम्मीद न

जगायी थी मुझमें

बढ़ा उत्साह

आपने ही सँवारा

लिखना रही

चाहत मेरी सदा

सीखा आपसे 

कलम का अर्थ भी

कलमकार 

क्या उत्तरदायित्व

समझाया है

काव्य का मतलब

साहित्य- ज्ञान

नित नया है मिला

सिखाया भी है

इस राह बढ़ना

बचाया मुझे

पिता- सम आपने

लुटाया स्नेह

असीम मुझ पर

गुरु-शिष्या का

सम्बन्ध ये हमारा

प्रेम,लगाव

यूँ ही रहे सदैव

आशीष मिले

सर्वदा ही आपका

कामना यही मेरी!

(19 मार्च , 2021)

-0-


रविवार, 28 मार्च 2021

964

 

प्रीत का रंग

डॉ.महिमा श्रीवास्तव

  होली आती रही और जाती रहीं मेरे जीवन में।


कोई भी तन या मन
, किसी को ना रँग पाई, मात्र एक के अतिरिक्त।

समय की लहरों को पार कर मन सुदूर अतीत में जा पहुँचता है।

बचपन में होली खेलने से बहुत डरती थी। याद पड़ता है कि पिताजी जब रँगे-पुते होली खेलकर घर आते थे तो मैं उनसे रूठ, चारपाई के नीचे जा छुपती थी।

बचपन की दहलीज़ पार कर किशोरावस्था में प्रविष्ट हुई।

पन्द्रह वर्ष की आयु व अत्यंत शर्मीली- से स्वभाव वाली एक लड़की यानी मैं।

उस वर्ष होली पर सुबह-सुबह द्वार की घंटी बजी, तो पता नहीं कैसे मैं दरवाज़ा खोलने जा पहुँची।

पर यह क्या?

द्वार खोला ही था कि मेरे गालों पर गुलाल मल दिया व सामने खड़ा प्रतिवेशी परिवार का किशोर पुत्र आण्टी को पूछता अंदर आ गया।

मैं सिहर उठी थी, इतना दुस्साहस?

संभवतः मुझे पहली व अंतिम बार होली पर तभी रंग लगाया गया।

विवाह होकर जिस घर आई वहाँ होली खेलना पूरी तरह वर्जित था।

पूरा दिन त्योहार पर नाश्ता-खाना बनाने में ही व्यतीत हो जाता था।

एकरस जीवन में रची बसी मैं भूल गई कि कभी किसी ने मुझे भी रँगना चाहा था, खुशियों के रंग से।

1

होली मनाने

तन मन रँगने

फिर आओगे?

2

प्रीत का रंग

होली पर हो संग

बाजे मृदंग।

 -0-

डॉ महिमा श्रीवास्तव

34 / 1, सर्कुलर रोड, मिशन कंपाउंड के पास, झम्मू होटल के सामने।

अजमेर (राज।)

mob. no.8118805670

jlnmc2017@gmail. com

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

962

 `

1-मन तेरा बरसाना 
ज्योत्स्ना प्रदीप 
1

प्रीति अग्रवाल

लो! फागुन आया है
 सरहद पर 
सजना
ये मन बौराया   है।
2
ये ढोलकमंजीरे 
सखियों  की टोली 
गाती  धीरे- धीरे।
3
ये  टेसू  भी  सीले
तुम जो आ  जाओ
मन खुशियों में जी ले।
4
पलकें तो हैं भारी 
सपना साजन  का 
मिलने की तैयारी।
5
सखियाँ कसती ताना 
गजरों  की  ढेरी 
कब ला दीवाना !
6
वो सुधियों का मेला 
साजन क्या जानें
इस दिल ने क्या झेला।
 7
यादें बिखरी-बिखरी 
पिय   सैनिक  मेरा 
कुछ पाती तो लिख री।
8
 लो!अपने घर आया 
झोली में खुशियाँ 
कितनी सारी लाया।

9
ग़म  के आँसू  सारे 
पी  ने  पी   डाले 
लब पर खुशियाँ धारे।

10
मिलकर खेलें होरी
फिर से बन जाएँ
ब्रज के छोरा- छोरी।
11
मन तेरा बरसाना
राधा मैं तेरी 
रंगों को बरसाना।

 
-0-[चित्र- प्रीति अग्रावल ] 

-0-

बेस्ट फ्रेंड

डॉ. पूर्वा शर्मा

मन में एक अजीब-सी बैचैनी थी उससे मिलने के बाद । तकरीबन पूरे एक वर्ष के बाद उसे देखा। उसका मुग्ध करना वाला चेहरा मुरझाया-सा लगा, जैसे कोई फूल शाख से खिर जाने पर मुरझा जाता है। सदा हँसते-मुस्कुराते उस नूरानी चेहरे पर कोई नूर नहीं, हाँ वो हल्की-सी मुस्कान जरूर दे रही थी ।


उसकी इस मुस्कान से इतनी तसल्ली हो गई कि उसे मुझे देखकर ख़ुशी हुई । उसकी बुलंद आवाज़ पार्टी में जान भरती थी, लेकिन उस आवाज़ में अब जैसे जान ही नहीं । जैसे-तैसे वो आवाज़ मेरे कानों तक पहुँची...धीमी.. बहुत धीमी । पिछले कई वर्षों में शायद उसे पहली बार इतनी धीमे बोलते हुए सुना । वो सदा ही खिलखिलाती रहती थी । हमेशा ऊर्जा से भरी, सबको ऊर्जा देने वाली बहुत बेबस नज़र आई । बेबसी इतनी कि तेज़-तर्राट शेरनी की तरह दौड़ लगाने वाली अब चल भी नहीं पा रही थी । उसके बेजान पैर और ज़रा-सी हरकत करता शरीर, उसके दर्द की दास्तान खुद ही कहे जा रहा था । उसकी इस स्थिति को देखकर रौंगटे खड़े हो गए, मन में उथल-पुथल मच गई, आँखें भर आई लेकिन पता था कि उसके सामने यह भाव को प्रकट किए तो शायद वह भी फूट पड़ेगी । बड़ी मुश्किल से खुद को सँभालते हुए उसे दिलासा दिया कि वो शीघ्र ही बिलकुल ठीक हो जाएगी । काफ़ी देर उसके पास बैठकर उससे बात करने के पश्चात् वापस लौटते हुए मन में बस उसका ही चेहरा, उसके ही ख़याल उठने लगे । मन बस प्रार्थना कर रहा था कि वो जल्दी ही ठीक हो जाए लेकिन यह कमबख्त दिमाग कुछ और ही बोले जा रहा था । हृदय में बस उसके लिए प्रार्थना ही चल रही थी और तीन-चार दिनों में ही अचानक वो समाचार मिला जिसके मिलने उम्मीद इतनी जल्दी तो कदापि नहीं थी । उसकी जीवन-यात्रा समाप्त हो चली, अब तो बस उसकी बातें-यादें रह गई । वह इस भौतिक दुनिया को भले ही छोड़ चली तो क्या, सबके दिलों में तो उसकी स्मृतियाँ सदा ही बसी रहेगी । कहाँ सोचा था कि यह साथ इतनी जल्दी खत्म हो जाएगा? उसकी एक बात बार-बार याद आ रही कि “तू ही मेरी बेस्ट फ्रेंड है”, वह सभी को अपना बेस्ट फ्रेंड कहती थी । आज एक बात समझ आई – जीवन का क्या भरोसा ? कल हो न हो !

§  पिंजरा तोड़

उड़ चली है मैना

जाने किधर ?

§  जहाँ जाएगी

चहचहा उठेगा

नया आँगन ।

-0-

रविवार, 21 मार्च 2021

961-माहिया

 सुनने के लिए नीचे दिए गए माहिया के लिंक को क्लिक कीजिए-

माहिया

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु' ( स्वर : ज्योत्स्ना प्रदीप)

1

क्यों इतनी दूर गए?

मिलने की आशा

कर चकनाचूर गए ।

2

पाहन का दौर चला,

पूजा था जिसको,

उसने हर बार छला।

3

हमको हर बार मिली,

घर के आँगन में

ऊँची दीवार मिली ।

4

चिट्ठी जब खोली थी;

आखर की  चुप्पी

रह-रहकर बोली थी।

5

दिन-रात हमें काटा

दर्द हमें देकर

सुख गैरों को बाँटा ।

6

तन-मन सब दे डाला

बदले में पाया

इक ज़हर-भरा प्याला ।

7

हर रोज़ दग़ा देंगे

रिश्ते आँधी हैं

बस आग लगा देंगे ।

8

हम यूँ भी कर लेंगे

दोष तुम्हारे भी

अपने सिर धर लेंगे ।

9

तुम चन्दा अम्बर के

मैं केवल तारा

चाहूँगा जी भरके।

10

तुझको उजियार मिले

बदले में मुझको

चाहे अँधियार मिले।

11

तुम सागर हो मेरे

बूँद  तुम्हारी हूँ

तुझसे ही लूँ फेरे।

12

हम बहुत अकेले हैं

क़िस्मत के हाथों

उजड़े  ये मेले हैं।

13

तुमको मन आँगन दूँ

छोड़ नहीं जाना

निर्मल तन दर्पन दूँ।

14

अब तो तुम आ जाओ

साँसें हैं व्याकुल

जीवन बन छा जाओ।

-0-

गुरुवार, 18 मार्च 2021

960

1-गुंजन अग्रवाल

1

फागुन की रुत आई 

फूट पड़े अंकुर

सुधा फिर हर्षाई।

2

करताल बजाते हैं

पेड़ों के पत्ते

फगुआ भी गाते हैं।

3

जब दहक उठे टेसू

यादों में सजना

औ भीग गए गेसू।

4

अलि गुंजन करते हैं

फूलों -कलियों से

मधु रस वो भरते हैं।

5

हँसती हैं जब कलियाँ 

पागल- से भँवरे

सुधि लेते हैं बगियाँ।

6

फागुन रुत भरमाई 

याद पिया तेरी

आँखों से झलकाई।

-0-

2-रश्मि विभा त्रिपाठी 'रिशू'
1
हम कहाँ अकेले हैं
मन-आँगन निश दिन
सुधियों के मेले हैं।
2
अखियाँ हैं भर आती
उर-तरु से उड़ते
सुधियों के जब पाखी।
3
अमरित का प्याला है
प्रेम जिलाता है
यह जीवन- हाला है।
4
यादों की इक पाती
बाँचे जब ये मन
अँखियाँ भर-भर आतीं
5
जीवन- से प्यारे हो
डूबे मन के पिय
तुम एक सहारे हो
6
नैनों से नीर बहे
बुँदिया इक खारी
सब अपनी पीर कहे
7
मन पाखी उड़ता है
धरती से अम्बर
पिय को ही तकता है
8
हमको अफ़सोस रहा
निष्ठुर को चाहा
अपना ही दोष रहा
9
क्या साथ निभाएगी
धोखे में डूबी
यह प्रीति रुलागी
10
अब और न तरसाओ
साँसें बुझने को
अंतिम पल आ जाओ

-0-


शुक्रवार, 12 मार्च 2021

959

 सेदोका-नारी

सुदर्शन रत्नाकर

 

1

नारी की सोच

सागर- सी गहरी

फिर भी वो बेचारी

क्यों ऐसा होता

तिल- तिल जलती

खुशियाँ वो बाँटती

 

2

छुपा लेती है

भीतर ही भीतर

मन की सारी पीड़ा

वाह री नारी

गरल सदा पीती

 फिर भी मुस्कुराती

3

रहती शांत

धधके चाहे ज्वाला

भीतर जितनी भी

भावनाओं की

करती समझौता

सपने ले उधार।

4

अल सुबह

ठिठुरती औरतें

सरदी का मौसम

बीनें कचरा

पीठ पे लादे बोझ

अभिशप्त होने का

5

नैनों में पानी

अधरों पे मुस्कान

घुटन में रहती

नहीं कहती

अभिशप्त जीवन

नारी आज भी जीती।

6

चुप न रह

मुखर होना सीख

मन की बात कह

घुटे न साँस

शक्ति को पहचान

अपना हक़ जान।

7

लुटती रही

नारी हर काल में

भावना के अस्त्र से,

बँधती रही

ममता की डोर से

 फिर भी जीती रही।

8

सीमा होती है

हर अत्याचार की

कब तक सहोगी?

उठ, जाग जा

स्वयं को पहचान

दुर्गा का रूप दिखा।

9

घूमती रही

फिरकी की तरह

जिधर हवा बही

जीवन भर

पतंग की तरह

डोर से बँधी रही।

10

जूझती रही

अकेली तूफ़ानों से

कठिन है डगर

पाँवों में छाले

पर चलती रही

हारी नहीं जीवन।

-0-सुदर्शन रत्नाकर ,ई-29,नेहरू ग्राउंड ,फ़रीदाबाद -121001

मो.9811251135