शनिवार, 3 दिसंबर 2022

1090

1-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

मैं और तुम


एकाकार जबसे

कोई भी भेद नहीं,

जीवन मेरा

परिपूर्ण है अब

कुछ भी खेद नहीं। 

2

प्रिय को सुख 

अपने लिए कुछ 

दिल में चाह नहीं,

वह प्रणय

समुद्र समान है 

उसकी थाह नहीं।

3

मेरी आशा की

दीप अवलियों के

तुम रखवारे हो,

ओ मीत मेरे 

मन के अम्बर के

तुम ध्रुवतारे हो।

4

मधुमास- सा

जीवन का मौसम 

कितना है निराला,

आके जबसे

मन की नगरी में

तुमने डेरा डाला।

5

तय था मेरा

धूप के सफर में 

प्यासे गले मरना,

प्यार तुम्हारा

शीतल पानी का ज्यों 

सीकस* में झरना।

6

ये मन तेरा 

और जीवन तेरा

साँसें तेरी सम्बन्धी

तेरे सिवाय

अब कुछ न दिखे 

मैं हो गई ज्यों अन्धी।

7

अपने सुख

देके मेरा दुख जो

तुमने सहेजा है 

सचमुच ही

तुमको ईश्वर ने

मेरे लिए भेजा है।

8

तू पल पल

मेरे हर दुख में

देता मुझे संबल

तेरे रूप में

मिला प्रभु से मेरी

पूजा का प्रतिफल।

9

ये प्रेम तेरा

सच में सजीवन

इसमें है जीवन

जी उठे अब

अखियों के सपन 

बल पा गया मन।

10

अति निर्मल 

निश्चल औ उदार

पाया जो तेरा प्यार

है यही मेरा

पावन तीर्थस्थल 

कैलाश, हरिद्वार।

 -0-*सीकस - रेतीली धरती

 2-भीकम सिंह 

गाँव  - 22

 


ले ग
सारे 

खेतों को खींचकर 

शहर

मुट्ठी में भींचकर

देखता गाँव 

आँखों को मींचकर

आखिरकार 

पहचान थे वह

जिन्हें फेंका है 

उन्हीं की जमीन से 

जैसे उलीचकर।

 

 

गाँव  - 23

 

देसी किस्मों को 

खोना नहीं है आज

सोचते खेत 

बिक जाने के बाद 

देखती आँखों 

ख़्वाब उड़ा दि हैं 

रातों ने आज

जी. एम. फसलें हैं

खेतों में आज

कल वीराना होगा 

खुलेंगे जब राज ।

 

गाँव  - 24

 

खेत - क्यारी को

वजूद-सा पहने

धोखे के मारे 

गाँव सामने आ

घंमडियों से

मंडियों में दिखते 

ज्यों नपे खड़े 

तुला की डंडियों से 

सोच रहे हैं 

कैसे बचे, मंडी के 

इन शिखंडियों से 

 

गाँव  - 25

 

सुख के लिए 

गाँवखेत बेचके 

बने हुए हैं 

सुख मिले कहाँ से 

जब से मुए 

ठेके घने हुए हैं 

सरकार ने 

जब करे नाराज़ 

गाँव तब से 

अनमने हुए हैं 

कटखने हुए हैं 

 -0-

-0-

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

1089

 1-सूने हुए पहाड़(चोका )

सुदर्शन रत्नाकर

 

 बोलते नहीं

चुपचाप हैं खड़े

आदि सृष्टि से

अनथक है यात्रा

भू समेटती

धरोहर अपनी

प्राण तुम्हारे

अनगिनत पेड़

बहें झरने

मधुर गीत गाते

गोद है भरी

हरीतिमा निराली

उड़ते पक्षी

विचरते हैं पशु

स्वार्थ में लिप्त

समझे न मानव

काटे जंगल

बदला सब कुछ

टूटें पत्थर

 

आसमान थे छूते

रूठी प्रकृति

ले रही प्रतिकार

सूने हुए पहाड़।

-0-ई-29,नेहरू ग्राउंड,फ़रीदाबाद 121001

-0-

तेरी बातों का (चोका)

रश्मि विभा त्रिपाठी

1


तेरी बातों का

चाँदनी- सा शीतल

ये अहसास

होने लगूँ विकल

तो उसी पल

दबे पाँव आकर

हुड़ककर

हारे- थके मन से

लिपटता है

और दो- चार जो बूँदें

छिटकता है

अमृत के घट से

 अनुराग से

अमावस की रात

अकबकाई

कि किसने सजाई

पलकों पर

झिलमिल जुन्हाई

सच कह दूँ?

तेरा साथ जो मिला

तो नहीं गिला

अपनी किस्मत से

ईश्वर हआ

बड़ा मेहरबान

अब मुझपे

मिला है वरदान

तेरे रूप में

तू साँझ बेला में

नित प्रति ही

मंदिर  में जलता

एक दीप है

मैं जिसका शलभ,

मेरी भोर का

या फिर तू सूरज

उगता हुआ

मैं जिसका हूँ नभ

बड़भागी हैं

तुझे जबसे देखा

सारे के सारे

उम्मीद के सितारे

जगमगाए

तू कुछ कहता है

तेरे होठों से

उजाले का झरना

पूरे वेग से

बहता रहता है

मेरी आँखों में

ओ मेरे मनमीत

चाँद चमकता है

-0-

आलिंगन में(सेदोका)

रश्मि विभा त्रिपाठी

1

आलिंगन में,

कसकरके मींजा,

अचक अवसाद,

और तुमने

ज़िन्दगी की जीभ पे

रख दिया है स्वाद।

2

लिखे जाएँगे

प्रेमियों के अगर

इतिहास में किस्से

अव्वल तुम्हीं

लेते मेरे दुख जो

तुम अपने हिस्से!!

3

तुमको पाके

दौड़ती दिल में जो

ख़ुशी की रवानी है

तुम्हारा प्यार

गोमुख से निकली

गंगा का वो पानी है।

4

मेरे माथे पे

महकता, खिलता

है जो ख़ुश्बू का बोसा

मिला इसमें

मुकद्दस प्यार का

एक पुख़्ता भरोसा।

5

जमाने को तो

लगेगा ये गुनाह

या कोई शरारत!

एक बोसे से

पल में पी गया जो 

वो मेरी हरारत।

6

मेरे मन से

तेरे मन की जुड़ी

इस तरह डोरी!

गोदी में लेटे

नन्हे- मुन्ने के लिए

ज्यों होती माँ की लोरी।

7

गले लगाके

पल में पिघलाया

ताप सारा का सारा,

ओ प्यार मेरे!

तरनतारन हो

तुम गंगा की धारा!!

8

दुआ के रंग

दिन पर उड़ेले

हर रात दीवाली!

बदल डाली

तूने तो ज़िन्दगी की

शक़्ल- सूरत काली।

9

मुझे न लगे

कोई भी दुख, रोग

नाचूँ मोर बनके

दुआ में पगे

तूने फेरे मनके

बना है शुभ योग।

10

कड़कड़ाते

जाड़े की तुम धूप

गुनगुनी, गुलाबी

मुरझाया जो

मौसम की मार से

खिला ये मेरा रूप।

11

अपने सुख

मुझे सौंपके तूने

मेरे दुख को पाला

इस जग में

किसी ने भी किसी को

ऐसे नहीं सम्भाला।

शनिवार, 12 नवंबर 2022

1088- यह अकेलापन

रश्मि विभा त्रिपाठी

 


 
कभी तो आओ

मनमीत यों तुम

मुझपे छाओ 

जैसे कि छा जाता है

धरती पर 

प्रेमासक्त गगन

बाहों में भर

उसका तपा तन 

हो बेसबर 

सीने में छिपाता है

सारा का सारा

ताप पिघलाता है

तब जाकर

शीतलता पाता है

धरा का मन

यह अकेलापन 

सच मानो तो

आग के जैसा ही है

तुम आकर

विरह को बुझाओ

बरस जाए

ज्यों सावन में घन

और मिटाए

हर एक जलन

है निवेदन

तुम भी यों ही करो

बरस जाओ

बुझ चले विषाद

बचे तो बस

प्रेम की ही अगन

जिसमें फिर

कुंदन का- सा बन 

निखर जाए 

मेरा रंग औ रूप

मुझको मिले 

केवल औ केवल

सिर्फ तुम्हारी 

गुनगुनी, गुलाबी

नेह की धूप

भोर से साँझ तक

जो मुझे सहलाए।

--0--

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

1087

 

धूप की चोटी (चोका)

                   अनिता ललित

 


जी यह चाहे

उचक के पकड़ूँ

धूप की चोटी

और खींच ले आऊँ

अपने पास

नरम गुदगुदी

मन की मौजी  

सूरज की बिटिया –


धूप-चिरैया। 

लुकछिप फिरती

शैतान बड़ी

ये नटखट परी।  

इसे अभी से 

कैसी ठंड है लगी!

अँखियाँ मीचे

ये सुबह-सबेरे

जम्हाई लेते   

अनमनी -सी जागे।

सूरज बाबा

पकड़ के उँगली

इसे घुमाते

फुदकती फिरती

कभी खिड़की,

कभी द्वारे ठिठके

भीतर झाँके।

ये चंचल गुड़िया

मौज मनाती -

छत पर सूखते

पापड़- संग

ये पसरी रहती 

या अचानक

अचार के सिर पे -

धप्पी कहती।

बादल संग कभी

होड़  लगाती,

आँखों को चुँधियाती,

हवा के संग

गलबहियाँ डाले  

दौड़ लगाती,

पेड़ों की छाँव जब  

उसे लुभाती

वह ठहर जाती,

होती उनींदी  

फूलों की गोद में ही

थककर सो जाती।

-0-

अनिता ललित

1/16 विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010

ई मेल: anita.atgrace@gmail.com