शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

793


 1-कमला निखुर्पा
1
भोर की दौड़
थी साँझ तक चली 
होड़-सी मची
साथी रूठते गए
पीछे छूटते गए।
2
मंजिल वहाँ
जिसे ढूँढने चले
गुम हो गए
वो कदमों के निशाँ,
पर रुकना कहाँ ।
-0-
2-कृष्णा वर्मा
1
रात औ दिन
हाथ में मोबाइल
बातों में मग्न
तन-मन को घेरे
फिर एकाकीपन।
2
तरीके तौर
गए  सब बदल
मरे संस्कार
इंसानी रिश्ते में जो
आया मंदी का दौर।
-0-
(16 फरवरी-18)
1
थके पाँव थे
दूर-दूर गाँव थे
सन्नाटा खिंचा,
लगा कुछ न बचा-
कि आप मिल गए
2
राहें कँटीली
चुभन व कराहें
बाधाएँ बनी
पास में  ही छाँव थी
कि फूल खिल गए।
3
तलाशा जिसे
भोर से साँझ तक
सूखा हलक
नदी- तीर पर मिले
मन दोनों के खिले।
4
रेत -सी झरी
भरी -पूरी ज़िन्दगी
कुछ न बचा
था सुनसान वन
कि पार था चमन ।
5
भोर -सी मिली
साँझ -सूरज  हँसा
कि आज कोई
आके  मन  में बसा
वह भोर थी तुम्हीं ।
6
घेरते रहे
बनके रोड़े कई
हारने लगे
जब अकेले पड़े
तुम साथ थे खड़े।
7
कामना यही-
जब तन में बचे
साँस आखिरी
अधरों पे हास हो
सिर्फ़ तुम्ही  पास हो।
8
मुट्ठी में कसा
बस तेरा हाथ हो
सदा साथ हो
जितनी  साँसें  बचें
कुछ नया ही रचें।
-0-





गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

792


डॉ.कविता भट्ट
1
कभी पसारो
बाहें नभ-सी तुम,
मुझे भर लो
आलिंगन में प्रिय
अवसाद हर लो।
2
उगता रवि
धरा का माथा चूमे
खग-संगीत
मिले ज्यों मनमीत
दिग-दिगन्त झूमे।
3
ताप-संताप
मिटे हिय के सब,
प्रिय -दर्शन
प्रफुल्ल तन-मन
ज्यों खिले उपवन।
4
आँखें लिखतीं
मन पर अक्षर
प्रेम-पातियाँ,
उन अध्यायों पर
मैं करूँ हस्ताक्षर।
5
मन की खूँटी
झूलता फूलदान
तेरी प्रीत का
प्रिय फूल सजाऊँ
नित खिले मुस्कान।
6
झूलती प्रीत
मन के छज्जे पर
बचपन की
सुन्दर गमले-सी,
खिलें नए सुमन ।
7
बदले रंग
मन की दीवारों के,
नहीं बदली
उस पर चिपकी
तेरी तस्वीर कभी।
8
मन का कोना
उदीप्त-सुवासित
प्रिय प्रेम से ! 
इत्र नहीं, कपूर; 
पूजा के दीपक-सा
-0-

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

791


हरियाणा साहित्य अकादमी-परिष्कार  कार्यशाला के विद्यार्थी
1-पूनम  सैनी
1
फूलों में कलियों में,
दिल तो महके है,
यादों की गलियों में।
2
पावन सा दरिया है,
बच्चों का हँसना,
खुशियों का ज़रिया है।
3
पूजा है ईश्वर की
 मात-पिता सेवा,
 पूजा जगदीश्वर की।
4
काँटों का राही है,
जीवन मानव का,
कष्टों की स्याही है।
5
यह घोर परीक्षा है,
सुख-दुख की छाया,
जीवन की दीक्षा है।
6
अनजान डगर है ये,
खुद से ही खुद का,
अनजान सफर है ये।
7
करुणा का रस्ता है,
मानव भीतर ही,
वह ईश्वर बसता है।
8
क्या वो रणधीर नहीं,
फर्ज निभाते हैं,
क्या वो भी वीर नहीं।
9
खेती लहराते हैं,
फिर भी मुफ़लिस हैं,
फसलें उपजाते हैं।
-0-
2- रुखसाना
1
जीवन सारा सींचा
फिर भी माया को
मानव ने ही खींचा।
2
जो माया में भटका
मंज़िल ना पाए
वह बीच डगर अटका ।
3
पैसा- पैसा करते
प्रेम उसे मिलता
जो धन पर ना मरते।
4
काली रतियाँ छाई
निर्भय हो जाओ
आई  है कठिनाई ।
5
माया को सब छोड़ो
बेशक धन-दौलत
हीरे- मोती जोड़ो ।।
-0-
3- विनती गर्ग
1
जीवन है सिखलाता
धूप कहाँ छाया
हमको है दिखलाता।
2
माँ देखो बोल रही
जल्दी तू आजा
यादों को खोल रह॥
3
पत्थर भी कहते हैं-
ना मारो उनको
जो दुख ही सहते है।
-0-

बुधवार, 17 जनवरी 2018

790

मेरी जिंदगी
-भावना शर्मा (पानीपत)

मेरी जिंदगी
नाटक ही तो रही
उम्रभर ये
कठपुतली बनी
जीवन मेरा
पात्र बना इसका
भूमिका रही
कुछ इस तरह             
मैं उम्रभर
अच्छा -बुरा क्या मिला
सोचती रही
एहसास आज ये
मुझको हुआ
जो मर्जी थी उसकी
बस वही था
जैसे चाहा उसने
वैसे मुझको
बनाए रखा कुछ
अच्छी या बुरी
वो मैं नहीं थी कभी
परवाह की
सबकी हर दिन
लापरवाह
सबकी नजरों में
मैं बनी रही
नाराज़ न हो कोई
मुझसे कभी
हँसती हुई कुछ
शब्दों से मैं यूँ
खास चुनती रही
बहुत हुआ
अब चलने भी दो
शुक्रिया करूँ
 मेरे मालिक तेरा
अच्छी या बुरी
मैं तेरी बनी रही
कब पूरा हो
नाटक ये तुम्हारा
आना चाहती
मैं पास तेरे अब
सुनते ही ये
बात वो मेरी हँस
देता है कुछ
मुझ पर वो मेरा
महान सूत्रधार  ।    

शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

788

मंजूषा मन
1
जीवन से हारे हैं
शिकवा क्या करते
अपनों के मारे हैं।
2
धोखा ही सब देते
अपने बनकर ही
ये जान सदा लेते।
3
रोकर भी क्या पाते
गम में रोते तो
रो -रोकर मर जाते।
4
उम्मीद नहीं टूटी
तेरे छलने से
हिम्मत भी है छूटी।

-0-

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

787


  विभा रश्मि 

सोन  चिरैया 
चुग्गा चोंच - दबाए
उड़ी थी फुर्र  
बसेरे का सपना 
नीड़ अपना 
चूज़े भरें आनंद 
पंख फैलाएँ
तपिश -आलोडन
महके मन
चिरैया डाल -डाल
है इठलाए
तिनके भरे चोंच
बनी  श्रमिक 
कलरव नवल
वसंत हर पल ।
-0-

ललना प्यारी
घुटरुन खिसके
मोह ले हिया 
मनोहारी  मुद्राएँ 
वश में मैया 
विस्मृत दिनचर्या
लेती बलैयाँ 
पकड़ भई खड़ी
साड़ी का पल्लू 
गिरे जब  विलापे 
अंक में छिपी
ललना किलकारी 
मैया दुनिया सारी । 

-0-

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

786

डॉ. सुधा गुप्ता
1.
जैसे ही ज़रा
पंख फरफराए
उड़े, छोड़ ममता
घोंसला रोता
धीरज बँधाने को
कहीं, कोई होता।
2
टूटे भरम
नदी हँसती रही
घिरे आग में हम
झूठे सपन
वो मख़मली  फूल
बने कैक्टस शूल
3
फूलों का ढेर
जीवन भर सींचा
मोहक था बग़ीचा
वक़्त का फेर
फूलों का उपवन
बना पाहन-वन
4
प्यास थी घनी
रूठे कुएँ, पोखर
सरिता अनमनी
दो घूँट जल
पाने को तरसे
रहे सदा विफल।

-0-