धूप की चोटी (चोका)
अनिता ललित
जी यह चाहे
उचक के
पकड़ूँ
धूप की चोटी
और खींच ले आऊँ
अपने पास
नरम गुदगुदी
मन की मौजी
सूरज की
बिटिया –
धूप-चिरैया।
लुकछिप
फिरती
शैतान बड़ी
ये नटखट परी।
इसे अभी
से
कैसी ठंड है
लगी!
अँखियाँ
मीचे
ये
सुबह-सबेरे
जम्हाई
लेते
अनमनी -सी जागे।
सूरज बाबा
पकड़ के
उँगली
इसे घुमाते
फुदकती
फिरती
कभी खिड़की,
कभी द्वारे ठिठके
भीतर झाँके।
ये चंचल
गुड़िया
मौज मनाती -
छत पर सूखते
पापड़- संग
ये पसरी
रहती
या अचानक
अचार के सिर
पे -
धप्पी कहती।
बादल संग
कभी
होड़ लगाती,
आँखों को
चुँधियाती,
हवा के संग
गलबहियाँ
डाले
दौड़ लगाती,
पेड़ों की
छाँव जब
उसे लुभाती
वह ठहर
जाती,
होती उनींदी
फूलों की
गोद में ही
थककर सो
जाती।
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अनिता ललित
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