शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

1087

 

धूप की चोटी (चोका)

                   अनिता ललित

 


जी यह चाहे

उचक के पकड़ूँ

धूप की चोटी

और खींच ले आऊँ

अपने पास

नरम गुदगुदी

मन की मौजी  

सूरज की बिटिया –


धूप-चिरैया। 

लुकछिप फिरती

शैतान बड़ी

ये नटखट परी।  

इसे अभी से 

कैसी ठंड है लगी!

अँखियाँ मीचे

ये सुबह-सबेरे

जम्हाई लेते   

अनमनी -सी जागे।

सूरज बाबा

पकड़ के उँगली

इसे घुमाते

फुदकती फिरती

कभी खिड़की,

कभी द्वारे ठिठके

भीतर झाँके।

ये चंचल गुड़िया

मौज मनाती -

छत पर सूखते

पापड़- संग

ये पसरी रहती 

या अचानक

अचार के सिर पे -

धप्पी कहती।

बादल संग कभी

होड़  लगाती,

आँखों को चुँधियाती,

हवा के संग

गलबहियाँ डाले  

दौड़ लगाती,

पेड़ों की छाँव जब  

उसे लुभाती

वह ठहर जाती,

होती उनींदी  

फूलों की गोद में ही

थककर सो जाती।

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अनिता ललित

1/16 विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010

ई मेल: anita.atgrace@gmail.com  

 

बुधवार, 9 नवंबर 2022

1086

 भीकम सिंह 

 

गाँव  -18

 

गाँव ढूँढता 

गली के नुक्कड़ पे

खुद आपको 

होता नशे में सारा 

जब रात को 

हर एक का होता 

एक ही रोना 

बगैर नींद सोना 

बीच-बीच में 

पलकों को भिगोना

भोर में खेत खोना 

 

गाँव  - 19

 

गाँव रात का

बिस्तर बाँधकर

तह कर दे

दिन के उजालों का

क्या है भरोसा 

कब रात कर दे

पूरा पा पके 

दिन उस ख्वाब को 

कहकर दे 

काँटों भरे हैं खेत

दुःख सहकर दें ।

 

गाँव  - 20

 

ईंट गारे का

गाँव बना बैठा है 

खुद को ताज

मानकर बैठा है 

सब कुछ तो 

मंडी ने चुरा लिया 

खुद मानके 

थानेदार बैठा है 

राजनीति में 

मकई के दाने- सा 

भुट्टा मान बैठा है 

 

गाँव  - 21

 

 

गर्मी या सर्दी 

खेतों की अँगड़ाई 

खलिहानों में 

पड़ जाती दिखाई

दिल खोलके 

जैसे हँसे तन्हाई 

सूदखोर त्यों 

बोने आता रुस्वाई

देख न पाती 

किसान की बिनाई

खो जाती पाई -पाई ।

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शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

1085-गाँव

भीकम सिंह 

 गाँव- 12

 

हल खेत से 

वह जब भी छूता

उत्पादन के 

प्रतिमान गढ़ता

बैंक का कर्ज

पर नहीं पटता 

खेतों का थोड़ा 

क्षेत्रफल घटता 

पेट की ओर

शरीर झुक जाता 

फिर भी बच जाता 

 

गाँव- 13

 

अब क्या करें 

वो फसलें पुरानी 

गाँव जिनकी 

हरिताभ छाया में 

देखता सूर्य 

होता हुआ नूरानी 

शोध-गर्भ से 

ज्यों बौनी किस्में आई

सिर पे सूर्य 

करता ताता-थाई

कोने में पड़ी झाई 

 

गाँव-14

 

ईख झूमती 

नये कल्ले उगते 

आशीष देने 

खाद -पानी चलते

सुधा से भरे 

तब गन्ने पलते 

हवा चलती 

हरी-सूखी पत्ती से 

गन्ने-गन्ने के 

माँसल-से अंगों का

आलिंगन करते 

 

गाँव  - 15

 

ऊँची मीनारें 

गाँव थम-थम के 

देखें नज़ारे 

तम भरी रात में 

वारे के न्यारे 

शांत नभ में कोई 

ज्यों फेंके तारे 

बार-बार मन में 

लड्डू-सा फूटे 

खामोशी से देखती 

कच्ची- पक्की दीवारें 

 

गाँव  - 16

 


गाँवों में साँझ

देर तक उतरी 

खाँस-खूँसती

खेतों में ही पसरी 

अलसा-सी

कनखियों से देखे 

बँधती हुई

सूरज की गठरी 

फुनगियों पे

जो कोने मोड़ रही

टँगी हुई है वहीं 

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गाँव  - 17

 

गाँव का जिस्म 

अँधेरा हो जाता है 

शाम के आते 

चमके शहर का 

दीया जलाते 

कई राह खुलती 

भोर के आते 

सिलसिला मिलता 

गाँवों को कहाँ 

वो तो रोना चाहते 

पर रो नहीं पाते।

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