बुधवार, 17 दिसंबर 2014

तुम्हारी आँखें



सुदर्शन रत्नाकर ।
1
चहचहाती
नीले पंख फैलाती
स्वच्छंद उड़ी
आसमान नापती
वह नन्ही चिड़िया ।
2
तुम्हारी आँखें
बोलती रहतीं हैं
कुछ कहतीं
भावनाओं से भरी
खुशी है झलकती ।
3
चाँद आया था
उजियारा लेकर
मेरे आँगन
पर मैं सोती रही
खिड़की बंद किए ।
4
पेड़ों से छन
उतरती किरणें
नव सूर्य की
भरतीं तन मन
स्फ़ूति नव स्पंदन ।
5
सोचती रही
लौट कर आएगा
वक़्त -पखेरू
उड़ा, उड़ता गया
हँसता मुझ पर ।
6
भोर होते ही
बहीं ठंडी हवाएँ
पंछी हैं जगे
पत्तियाँ गुनगुनाईं
सूरज मुस्कुराया  

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

ड्योढ़ी पर दीप जला



डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
ड्योढ़ी पर दीप जला
हँसता उजियारा
तम के मन ख़ूब खला ।
2
बैरन हैं ये सखियाँ
लब ख़ामोश रहें
चुग़ली खातीं अँखियाँ ।
3
मन -उत्सव मन जाते
जो तेरे मन का
अनमोल रतन पाते ।
4
है कुफ़्र सितारों का
बीत गया तन्हा
ये वक़्त बहारों का ।
5
थोड़े से हैं खारे
आए हैं दिल से
सुख-दुख के हरकारे ।
6
देखूँ खिलती कलियाँ
याद बहुत आएँ
बाबुल तेरी गलियाँ ।
7
फूलों की थी ढेरी
शूल चुभाती है
यादों की झरबेरी ।
8
साथी ना संगी हैं
ये सुख दुनिया के
अहसास पतंगी हैं ।
9
मुश्किल -सा रस्ता है
बिखरी यादों का
ये दिल गुलदस्ता है ।
10
कैसा यह खेल किया
झूठे सपनों से
अँखियों का मेल किया ।

-0-

रविवार, 30 नवंबर 2014

नारी की सोच



सुदर्शन रत्नाकर
1
नारी की सोच
सागर- सी गहरी
फिर भी वो बेचारी,
क्यों  होता ऐसा
तिल -तिल जलती
ख़ुशियाँ वो बाँटती ।
2
द्वार खुले हैं
ठंडी हवा के झोंके
छू रहे तन मन,
फिर भी कहीं
पिश है भीतर
अरक्षित होने की ।
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बुधवार, 26 नवंबर 2014

‘राशनिंग’ धूप की



चोका
राशनिंग धूप की
डॉ सुधा गुप्ता

शीत राजा ने
शुरू की मनमानी
क्या करे कोई ?
नए क़ानून बने
हुई घोषणा :
राशनिंग धूप की !
बन आई है
अफ़सरशाही की
देर से ख्ले
सूरज का दफ़्तर
बन्द हो जल्दी
निष्ठुर अधिकारी
एक न सुने
किसी फ़रियादी की
पीड़ित जन
गुहार लगाते औ
कँपकँपाते
धरती बस रोती
दूर्वा भिगोती
धूप को तरसते
बेबस प्राणी
निहोरा हैं करते
पंछी बेचारे
ठण्ड से ठिठुरते
बेमौत मरें
गुमसुम से खड़े
पेड़-पौधे भी
बस, आहें भरते
असर नहीं
किसी भी  प्रार्थना का
पत्थर दिल !
रोते-बिलखते
छोड़ सभी को
चल देता सूरज
तख़्ती लटका
बसकोटा ख़त्म की
आततायी का
ठिठुरते जग से
नहीं है नाता
अन्यायी राजा सदा
दीन प्रजा सताता ।
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(14-15 नवम्बर , 2014)
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2-शरदागमन---माहिया
शशि पाधा
 1
यह मौसम गीला- सा
पर्वत धूप छिपी
सूरज कुछ  ढीला सा
2
डाली क्यों काँप रही
आहट सर्दी की
सिहरन से भाँप रही |
3
इत -उत क्यों डोल रही
अँगना धूप खड़ी
मुख से ना बोल रही
4
हरियाली छोड़ रहे
चादर बर्फीली
पर्वत सर ओढ़ रहे 
5
अम्बर कुछ नीला -सा
 झिलमिल तारों में
 इक चाँद सजीला -सा 
6
यह धरती सोई है
ओढ़ दुशाला तन
सपनों में खोई है
7
यह कैसी साजिश है
ठंडी धूप  हुई
ओलों की बारिश है
8
सूरज को टोक रहा
शरद सिपाही- सा 
किरणों को रोक रहा
9
रुत कुछ भरमाई -सी
सूरज मंद हुआ
किरणें अलसाई -सी
10
मौसम बंजारे हैं
सर्दी -गर्मी से
हम तो ना हारे हैं
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