सुदर्शन रत्नाकर ।
1
चहचहाती
नीले पंख फैलाती
स्वच्छंद उड़ी
आसमान नापती
वह नन्ही चिड़िया
।
2
तुम्हारी आँखें
बोलती रहतीं हैं
कुछ कहतीं
भावनाओं से भरी
खुशी है झलकती ।
3
चाँद आया था
उजियारा लेकर
मेरे आँगन
पर मैं सोती रही
खिड़की बंद किए ।
4
पेड़ों से छन
उतरती किरणें
नव सूर्य की
भरतीं तन मन
स्फ़ूति नव स्पंदन
।
5
सोचती रही
लौट कर आएगा
वक़्त -पखेरू
उड़ा, उड़ता गया
हँसता मुझ पर ।
6
भोर होते ही
बहीं ठंडी हवाएँ
पंछी हैं जगे
पत्तियाँ
गुनगुनाईं
सूरज मुस्कुराया ।
डॉ ०ज्योत्स्ना शर्मा
1
ड्योढ़ी पर दीप जला
हँसता उजियारा
तम के मन ख़ूब खला ।
2
बैरन हैं ये सखियाँ
लब ख़ामोश रहें
चुग़ली खातीं अँखियाँ ।
3
मन -उत्सव मन जाते
जो तेरे मन का
अनमोल रतन पाते ।
4
है कुफ़्र सितारों का
बीत गया तन्हा
ये वक़्त बहारों का ।
5
थोड़े से हैं खारे
आए हैं दिल से
सुख-दुख के हरकारे ।
6
देखूँ खिलती कलियाँ
याद बहुत आएँ
बाबुल तेरी गलियाँ ।
7
फूलों की थी ढेरी
शूल चुभाती है
यादों की झरबेरी ।
8
साथी ना संगी हैं
ये सुख दुनिया के
अहसास पतंगी हैं ।
9
मुश्किल -सा रस्ता है
बिखरी यादों का
ये दिल गुलदस्ता है ।
10
कैसा यह खेल किया
झूठे सपनों से
अँखियों का मेल किया ।
-0-
सुदर्शन रत्नाकर
1
नारी की सोच
सागर- सी गहरी
फिर भी वो बेचारी,
क्यों होता ऐसा
तिल -तिल जलती
ख़ुशियाँ वो बाँटती ।
2
द्वार खुले हैं
ठंडी हवा के झोंके
छू रहे तन –मन,
फिर भी कहीं
तपिश है भीतर
अरक्षित होने की ।
-0-
चोका
‘राशनिंग’ धूप की
डॉ सुधा गुप्ता
शीत राजा ने
शुरू की मनमानी
क्या करे कोई ?
नए क़ानून बने
हुई घोषणा :
‘राशनिंग’ धूप की !
बन आई है
अफ़सरशाही की
देर से ख्ले
सूरज का दफ़्तर
बन्द हो जल्दी
निष्ठुर ‘अधिकारी’
एक न सुने
किसी ‘फ़रियादी’ की
पीड़ित जन
गुहार लगाते औ’
कँपकँपाते
धरती बस रोती
दूर्वा भिगोती
धूप को तरसते
बेबस प्राणी
‘निहोरा’ हैं करते
पंछी बेचारे
ठण्ड से ठिठुरते
बेमौत मरें
गुमसुम –से खड़े
पेड़-पौधे भी
बस, आहें भरते
असर नहीं
किसी भी प्रार्थना का
पत्थर दिल !
रोते-बिलखते
छोड़ सभी को
चल देता सूरज
‘तख़्ती’ लटका
बस’कोटा
ख़त्म’ की
आततायी का
ठिठुरते जग से
नहीं है नाता
अन्यायी राजा सदा
दीन प्रजा सताता ।
-0-
(14-15 नवम्बर ,
2014)
-0-
2-शरदागमन---माहिया
शशि पाधा
1
यह
मौसम गीला- सा
पर्वत
धूप छिपी
सूरज
कुछ ढीला सा
2
डाली
क्यों काँप रही
आहट
सर्दी की
सिहरन
से भाँप रही |
3
इत
-उत क्यों डोल रही
अँगना
धूप खड़ी
मुख
से ना बोल रही
4
हरियाली
छोड़ रहे
चादर
बर्फीली
पर्वत
सर ओढ़ रहे
5
अम्बर
कुछ नीला -सा
झिलमिल तारों में
इक चाँद सजीला -सा
6
यह
धरती सोई है
ओढ़
दुशाला तन
सपनों
में खोई है
7
यह
कैसी साजिश है
ठंडी
धूप हुई
ओलों
की बारिश है
8
सूरज
को टोक रहा
शरद
सिपाही- सा
किरणों
को रोक रहा
9
रुत
कुछ भरमाई -सी
सूरज
मंद हुआ
किरणें
अलसाई -सी
10
मौसम
बंजारे हैं
सर्दी
-गर्मी से
हम
तो ना हारे हैं
-0-