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शनिवार, 11 मार्च 2023

1115

1-ताँका / सुदर्शन रत्नाकर 

1

तुम्हारा मौन

कचोटता है मुझे 

कुछ तो बोलो

अनकही बातों को

आवाज़ तो दे दो। 

2

सुनो तो ज़रा 

कराहती टहनी

कहती है क्या 

मत मारो कुल्हाड़ी 

बौर अभी आया है। 

 

3

प्रभात बेला

घंटियों की आवाज़ 

जगे मंदिर 

देता देव दर्शन 

शांति हर मन को। 

4

प्रकृति देती

भर- भर आँचल

मानव स्वार्थी 

सँभाल नहीं पाता

धरोहर उसकी। 

5

कोई तो होता

आँसू ही पोंछ लेता

सांत्वना देता

कम होती चुभन 

अनचाहे काँटों की। 

6

कैसा है मन 

करे सदा क्रंदन 

सोच बदल

रोते का कोई नहीं 

सँवार ले जीवन। 

7

रौंदते रहे

जीवन भर हम

धरा का सीना

हमें गिराया नहीं

सहारा देती रही। 

8

किवाड़ खोल

खटखटा रहे हैं

बाहर खड़े

मस्त हवा के झोंके 

जो वसंत लाया है। 

9

चाँद आया था

रात घूमता रहा

चाँदनी संग

आते ही सूरज के

छोड़ा साथ उसने। 

-0-Sudershanratnakar@gmail.com

-0-

॰_ताँका/ प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

1

भोर की बेला

जाग रे! स्वप्न द्रष्टा

ईश स्मरण

पवित्र जल स्नान

कर आत्म कल्याण।

2

कुरूप लगें

सारे पुष्प जग के

अश्रु-प्रपात

बन बहे जीवन

त्रस्त लगे सबसे।

3

हुआ प्रभात

विहग कलरव

उगा सूरज

मंदिर शंखनाद

शुभ देव दर्शन।

4

आई सुबह

लाई नव विश्वास

मन उमंग

पुलक उठा गात

हैं संकल्पित मन।

5

हृद ने कहा

सुंदर बनो ललिता!

घोर तम में

न हो भ्रमित तुम

हे, जग की दुहिता!

-0-ईमेल-v. maudichya@yahoo. com