1-ताँका / सुदर्शन रत्नाकर
1
तुम्हारा मौन
कचोटता है मुझे
कुछ तो बोलो
अनकही बातों को
आवाज़ तो दे दो।
2
सुनो तो ज़रा
कराहती टहनी
कहती है क्या
मत मारो कुल्हाड़ी
बौर अभी आया है।
3
प्रभात बेला
घंटियों की आवाज़
जगे मंदिर
देता देव दर्शन
शांति हर मन को।
4
प्रकृति देती
भर- भर आँचल
मानव स्वार्थी
सँभाल नहीं
पाता
धरोहर उसकी।
5
कोई तो होता
आँसू ही पोंछ लेता
सांत्वना देता
कम होती चुभन
अनचाहे काँटों की।
6
कैसा है मन
करे सदा क्रंदन
सोच बदल
रोते का कोई नहीं
सँवार ले
जीवन।
7
रौंदते रहे
जीवन भर हम
धरा का सीना
हमें गिराया नहीं
सहारा देती रही।
8
किवाड़ खोल
खटखटा रहे हैं
बाहर खड़े
मस्त हवा के झोंके
जो वसंत लाया है।
9
चाँद आया था
रात घूमता रहा
चाँदनी संग
आते ही सूरज के
छोड़ा साथ उसने।
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॰_ताँका/
1
भोर की बेला
जाग रे! स्वप्न द्रष्टा
ईश स्मरण
पवित्र जल स्नान
कर आत्म कल्याण।
2
कुरूप लगें
सारे पुष्प जग के
अश्रु-प्रपात
बन बहे जीवन
त्रस्त लगे सबसे।
3
हुआ प्रभात
विहग कलरव
उगा सूरज
मंदिर शंखनाद
शुभ देव दर्शन।
4
आई सुबह
लाई नव विश्वास
मन उमंग
पुलक उठा गात
हैं संकल्पित मन।
5
हृद ने कहा
सुंदर बनो ललिता!
घोर तम में
न हो भ्रमित तुम
हे, जग
की दुहिता!
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