हाइबन
: डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
हड़बड़ी
में बिट्टू की आवाज़ सुनाई दी ,माँ ...जल्दी से एक चादर दीजिए और कहते-कहते अपने दोस्तों की टोली के साथ
दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया । ‘क्या हुआ’- कहती घबरा कर मैं वहाँ पहुँची और दरवाज़ा खोलते ही हैरान -परेशान बच्चों को देखा ।अरे जल्दी लाइए माँ !हाथ में एक लंबा बाँस ..उस पर
बँधा एक छोटा- सा चाकू ..और इतनी जल्दी ??? नहीं ...पहले बताओ ..क्या हुआ है ??? यह सब लेकर
कहाँ जा रहे हो ???माँ ...ऊपर पतंग के धागे में कबूतर की टाँग
फँसी है ,नहीं निकल
पा रहा है .हमने नहीं निकाला तो मर जाएगा न ..ऐसे ही ...रोनी सूरत से एक साँस में
कह गया बिट्टू ।ओह ...मेरी साँस में साँस आई । चादर मेरे हाथ से छीनी और भाग गए
सारे । अरे कहीं गिर न जाना ,ज़रा सँभाल कर ,कोई साथ में बड़ा
है या नहीं ....कहते कहते मैंने भी गैस का चूल्हा बंद किया ।घर की चाबी और मोबाइल
उठाए, बाहर आकर दरवाज़ा लॉक किया और लिफ्ट का बटन दबा दिया
।अब पाँच माले चढ़कर जाना तो मेरे बस में नहीं था । खैर...कहाँ हो तुम लोग आवाज़- लगाती मैं जब तक छत पर पहुँची ...तब तक नन्हा अभय भागा भागा मेरे पास आया
और मुझे छत के कोने में बैठे कबूतर के पास ले गया । देखिए आंटी ..हमने उसे बचा
लिया । धुकुर-पुकुर साँस लेता कबूतर चकित- सा सब ओर देख रहा
था और बच्चे गर्व- मिश्रित प्रसन्नता से कभी मुझे और कभी
कबूतर को देख रहे थे ....उनके मुख का असीम आनन्द
मुझे बेहद आश्वस्त कर गया ......
नन्ही अँजुरी
रस से भरी अभी
रीते न कभी ।
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