शनिवार, 24 जनवरी 2015

माँ स्वरात्मिके !



ज्योत्स्ना प्रदीप

माँ स्वरात्मिके !
हे बोधस्वरूपिणी !
तेरा ही नाद ,
बिन्दु से ब्रह्माण्ड में।
पाता आह्लाद,
कण भी संगीत से ,
सुर -ताल को -
बाँधतीं हो गीत से।
अधिष्ठात्री हो
विद्या ,ज्ञान बुद्धि की
आत्म -शुद्धि की ,
तुम ही माँ धात्री हो।
ढाल देती हो
शोक को भी श्लोक में ,
तेरे ही स्वर
गूँजें हर लोक में।
ये उपनिषद्  ,
वेद और पुराण
तेरी ही गति
तेरे ही देह -प्राण।
करो उच्छेद
सम्पूर्ण अज्ञान का
रहे न भेद
जाति ,धर्म नाम का
हे महावाणी !
जुग कुटुम्ब बने
ऐसा वर दो
पुण्य -ज्योति भर दो ,
रवि - मन कर दो।
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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

हे विहंगिनी !





कुमुद रामानन्द बंसल

1

मधुर   स्वर,

धुन  है  पहचानी

हे  विहंगिनी!

तुझ-सा  ही आनन्द

पाएगा  मेरा  मन 

2

चिनार-वृक्ष,

हिमरंजित  वन,

धरा-वक्ष  पे

घूमते  बादलों  की

मीठी-सी  है  छुअन 

3

शरद्  ॠतु  में

झड़ा  हरेक  पात,

सूनी  शाखों  की

दर्द  भरी  है  बात

सुनती  दिन-रात 

4

भीनी-सी  गन्ध

पीली-पीली  सरसों

मंजरी - गुच्छ,

झरते  बेला ­ पुष्प

सूँघे  मन  बरसो 

5

मेघ-तड़ित

रूठते-झगड़ते,

आँखमिचौली

सूर्य,  मेघ,  पवन,

देखी  इन्हीं  नयन 

6

सौ सौ  ठौर  हैं

विचरण  के  लिए,

नभ  छू  कर

लौट  आता  है  पिक,

तृण-नीड़  अपने 

7

कृश  है  काया,

मुट्ठी  भर  है  मिट्टी,

छोटे - से  पंख,

उड़ान  गजब  की,

गगन  को  हराती 

8

शाख  पे  बैठे

बतियाएँ  परिन्दे,

गाते  सुमन,

पग  घुँघुरू  बाँध

नाचता  उपवन 

9

मधु ॠतु  है

बौराये  आम्र-वृक्ष,

पलाश  डालें

पुष्पित  हुईं,  भौरे

गाएँ  गान  वासन्ती 

10

इस  ख्याल  ने

चिड़िया  के  परो  में

ऊर्जा  भर  दी,

बाट  जोहते  होंगे

बच्चे  चुग्गे  के  लिए 

11

हवा  का  झोंका,

पंछी  गुनगुनाएँ,

हज़ार  गीत।

उड़ी  तितली  संग

तोड़  कर  बन्धन 

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( सद्य प्रकाशित संग्रह हे विहंगिनी' से )

सोमवार, 19 जनवरी 2015

राहें कँटीली




रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

घने अँधेरे
फिर राहें कँटीली,
साथी न कोई
हैं पलकें भी गीली ।
चलते रहे
थके पाँव  घायल
पाएँगे कैसे
लापता गाँव हम
        की थी दुआएँ-
        पर न जाने  कैसे
        शूल वे बनी ,
        की केसर की खेती
        अभिशप्त हो
        वो बनी नागफनी 
        कैसे अपने?
        दुआओं से आहत ,
        शाप यदि दो
        करते हैं स्वागत ।
आँसू जो पोंछे
वो लगता विषैला
भाया सदा ही
इन्हें मन का मैला ।
आओ समेटे
वो  शुभकामनाएँ
नहीं लौटना-
कहने को घर हैं
ये हिंसक गुफाएँ ।
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