शनिवार, 3 मार्च 2018

797


ताँका
   -अनिता ललित
सिर टिका के
नभ के काँधे पर
सूरज सोया
धरा गुनगुनाए
मधुर लोरी गाए। 
रखे अधर
धरा के माथे पर
भीगे नैनों से
सूरज ने ली विदा
दिल साँझ का डूबा।
3
कैसे अपने!
ये लालच में अंधे
घोलें ज़हर
मीठी-मीठी बातों में
दें घातें –सौग़ातों में!
4
चीर दें दिल
कड़वी दलीलों से
नहीं इलाज
कपटी इंसानों का
प्रेम की किताबों में!
5
मिलता काट
साँप के ज़हर का
न मिले तोड़
आस्तीन में पलते
अपनों के काटे का!
6
छाई बहारें
कुछ खट्ठी-मीठी सी
याद-फुहारें
मन-अँगना झरी
भीगी आँखों की क्यारी!
7
फ़ागुन गीत
फ़ज़ाओं में जो गूँजें
महका जाते
बचपन पुकारे
पर हाथ न आए!
8
रूठा है चाँद
नहीं प्रेम-ललक
सूना फ़लक
मन की गली में भी
छाई आज उदासी!
9
कानों में गूँजे
नेह भरी आवाज़
वो एहसास -
आशीष-भरा हाथ
रहेगा सदा साथ!
10
कर्म हमारे
करते लेखा-जोखा
कर्ज़ चुकाते
भाग्य न सके बाँच
साँच को नहीं आँच!
-0-
निता ललित ,1/16 विवेक खंड ,गोमतीनगर
लखनऊ -226010
ई मेल: anita.atgrace@gmail.com


रविवार, 25 फ़रवरी 2018

796


कृष्णा वर्मा
1
ओ मधुमास
मख़मली अहसास
जाग्रत हुई प्यास
छाया उल्लास
महके पल छिन
ठुमकता सुहास।
2
कैसा करार
थिरकती चेतना
मनवा बेकरार
सिसके चाह
तरस गईं बाहें
साजन उस पार।
3
प्रेम- जुनून
क़ायदा ना कानून
मिटना लगे चंगा
जले बेबाक
एक ओर दीपक
दूजी ओर पतंगा।
4
प्रेम -लगन
पथ पर बिछता
बन कर गुलाब
मेल की चाह
मिटाए या जिलाए
प्रेम बेपरवाह।
5
छोटा जीवन
गिनी-चुनी घड़ियाँ
चलना सम्भल के
टूटते रिश्तों
की, जोड़ लो कड़ियाँ
ज्यों मोती की लड़ियाँ।
6
है अनमोल
यह ख़ून के रिश्ते
गँवाना ना बेकार
देके अपना
उन्हें हिस्सा रोकले
आँगन में दीवार।
7
पीड़ा क्या हास
कटा करवटों में
उम्र का बनवास
नित आँसुओं
ने लिखा चेहरे पे
नूतन इतिहास।
8
मिले फुर्सत
तो पढ़ लेना कभी
पानी की तहरीरें
हर दरिया
के, हैं हज़ारों साल
पुराने अफ़साने।
9
सूखें शजर
जब कभी रिश्तों के
भीगी हुई पलकों
से, सींच देना
फूट पड़ेंगी फिर
सुकोमल कोंपलें।
10
हुए जब से
हम तुमसे दूर
किसको बतलाएँ
हो गए हम
ख़ुद स्वयं से दूर
पीर बनी नासूर।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

795


1-भावना सक्सैना
1
गीत सुरीले
गाती है ये ज़िन्दगी
सुर पकड़
नए सृजन करो
मन आनंद भरो।
2
छाँव सुख की
नटखट बालक
चंचल दौड़े
नयन मटकाती
टिके नहीं दो घड़ी।
-0-
2-अनिता मण्डा
1
इच्छा के दीप
मन का गंगाजल
ले जाएँ लहरें
तैरते व डूबते
दिन-रात बीतते।
2
घूरती आँखें
गली चौराहों पर
भूली संस्कार
पोतें सभ्यता पर
कालिख़ दिन-रात।
3
छानते युवा
सड़कों की धूल
कर्तव्य भूल
अधर में भविष्य
वर्तमान हविष्य।
4
मन हो जाता
पत्थर से भी भारी
रहे डूबा सा
सुधियों की नदियाँ
कितनी उफनाता
-0-
3-पूनम सैनी (हरियाणा साहित्य अकादमी-परिष्कार  कार्यशाला की छात्रा)
1
अंगार- भरी,
चंदन- सी घाटी ये
तेरी ज़िन्दगी।
रोते या मुस्कुराते,
सफर तो तय है।
2
कुछ अपनी,
कुछ अजनबी-सी,
अनकही- सी,
दास्ताँ है वतन की।
वीरों के जतन की।
3
मेरी साँसों में
उसके जीवन का
एहसास है।
अब न मैं न ही वो,
बस प्रेम जीता है।
4
सीमाएँ भी है,
धर्म और जाति भी
ढूँढे न मिला  
आदमी की बस्ती में
इंसान है लापता।
5
पतझड़ में
बसंत न खिलता
बिन तुम्हारे।
आशाओं की बेल थी
हिम्मत के सहारे।
6
घुमड़ते-से
बादल बनकर
तुम आओ तो।
थार से मन पर
प्रेम बरसाओ तो।
-0-


मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

794


जुगल बन्दी : माहिया 
डॉ सुधा गुप्ता : ज्योत्स्ना प्रदीप 
1
गरमाहट नातों की
डोरी टूट गई
भेंटों-सौगातों की।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
डोरी तो जुड़ जाती 
सागर जान गया  
नदिया उस तक आती ।- ज्योत्स्ना प्रदीप  
2
अब आँसू सूख  चले
रेत -भरी आँखों
सपना कोई न पले ।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
कुछ सीपी हैं बाकी 
मोती झाँक रहे 
कैसी प्यारी  झाँकी !  ज्योत्स्ना प्रदीप  
3
जाना था तो जाते
लौट न पाएँगे
इतना तो कह जाते ।- डॉ.सुधा गुप्ता
0
 फिर तुम तक आना है
तुझ  बिन जग झूठा 
सब कुछ वीराना है !  ज्योत्स्ना प्रदीप  
4
सब दिन यूँ  ही बीते
बाती से बिछुड़े
हैं दीप पड़े रीते ।-डॉ सुधा गुप्ता
0
अब मिलने की बारी 
बाती   दीप  धरी 
जलने की तैयारी ।- ज्योत्स्ना प्रदीप  
5
अब नींद नहीं आती
रातें रस- भीनी
कोरी आँखों जाती ।- डॉ .सुधा गुप्ता
0
आँखें ना कोरी हैं 
देखो रस  बरसा 
वो चाँद चकोरी हैं।- ज्योत्स्ना प्रदीप
6
जब चाहो तब मिलना
पर यह वादा हो
फिर सितम नहीं करना ।- डॉ .सुधा गुप्ता
0
ये सितम नहीं गोरी 
कुछ मजबूरी थी 
बस  इतनीं -सी चोरी ।-ज्योत्स्ना प्रदीप