मंगलवार, 25 अगस्त 2015

नाम लिखूँ तेरा

माहिया
प्रियंका गुप्ता
1
ये बात पुरानी है
जन्मों का रिश्ता है
अब प्रीत निभानी है ।
2
सागर ये गहरा है
कैसे पार करूँ
साँसों पे पहरा है ।
3
नैया ये डूब गई
हार गया हिम्मत
उस पल ही हार हुई ।
4
साँसों की डोरी पर
नाम लिखूँ तेरा
मन -चादर कोरी पर
5
आ जाना यादों में
साथ नहीं छोड़ूँ
कह देना वादों में ।
6
सन्नाटा ये बोले
भेद दिलों के अब
दो नैना भी खोले
7
अब नींद नहीं आती
चाँद सताता है
भेजे ना तू पाती ।

-0-

रविवार, 23 अगस्त 2015

खिलेंगे फूल



अनिता मण्डा

1- खिलेंगे फूल

ओह! जिंदगी
कौनसे लफ़्ज लिखे
तूने पन्नों पे
हम पढ़ न सके
तेरा लिखा ये
मिटा भी नहीं सके
जिएँ तो कैसे?
चल तू ही बता दे
कोई रास्ता तो
मंजिल का होगा ही
वही पता दे
चलने से रोकेंगे
पाँव के छाले
मुझको कब तक
बोये हैं मैंने
उम्मीदों के सपनें
आँसू से सींचे
कोई कोंपल फूटे
बढ़ें शाखाएँ
खिलेंगे कभी फूल
जिऊँगी दर्द भूल।
-0-
2- उपजाऊ खाद

लब छू कर
गई थी शबनम
ज़ायका वही
रखा है होठों पर
झूम रहे हैं
अभी भी सूखे पत्ते
उड़ हवा से
दे रहे हैं आवाज़
तो क्या हुआ कि
सूख गए हैं आज
तुम्हें दी छाँव
जब जले थे पाँव
गिरकर भी
बेकार नहीं हम
बनेंगे खाद
करेंगे उपजाऊ
उस मिट्टी को
जिसमें पनपेगी
नई पीढ़ी हमारी।
-0-

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

रोशनी



प्रियंका गुप्ता

बात कई साल पहले की है। तब मेरा बेटा चुनमुन ढाई-तीन साल का रहा होगा और मेरे जेठ की बेटी टीटू करीबन छ साल की...। गर्मियों के दिन थे और शहर में हर साल की तरह भरपूर बिजली कटौती...। घर में तब एक ही इन्वर्टर हुआ करता था और वो भी कई बार चार्ज़ नहीं हो पाता था...। ऐसे में अगर शाम को या रात के वक़्त बिजली गई नहीं कि मुसीबत...। एक तो गर्मी...ऊपर से अँधेरे में चुनमुन और टीटू की धमाचौकड़ी...। इन दोनो की बदमाशियाँ भी कोई मामूली नहीं होती थी, बल्कि हम सब का यही मानना था (और आज भी है) कि चुनमुन को विभिन्न प्रकार से शरारतें कैसे करते हैं, इसका दिव्य-ज्ञान टीटू से मिला था...। ख़ैर, बात गर्मियों की बिजली कटौती की हो रही थी। दिन तो जैसे-तैसे कट जाता था, पर रात में एक तो सारा काम-धन्धा बहुत अटक जाता था, उस पर थोड़ी- सी बोरियत भी...। ऐसे समय में दिन भर का थका-हारा शरीर आराम भी माँगता था;लेकिन दोनो बच्चे मेरे ही आसपास रहते थे, इसलिए मैं आराम कर पाऊँ, यह असम्भव का दूसरा नाम था।
        कुछ देर तो दोनो बच्चे अपनी शरारतों में मस्त रहते, पर जैसे-जैसे लाइट आने में देर होती...बच्चे, खास तौर से टीटू, बेसब्र होने लगती। उसके सौ मर्ज़ों की एक दवा...हज़ार सवालों का एक जवाब...उसकी चाची...यानी कि मैं...। हर शैतानी आजमाने के बाद ऊबकर वे दोनो मेरे पास आते...। सवाल टीटू ही दागती...चाची, लाइट कब आएगी...?
        अब इस शहर में बिजली कब आएगी, कब जाएगी...ये तो  किसी को भी नहीं पता, तो भला मेरी क्या बिसात थी? शुरू में तो मैं...पता नहीं बेटू...कह कर चुप रह जाती थी, पर अचानक ही एक दिन मुझे एक उपाय सूझा। अगली बार जब टीटू और चुनमुन अपने भोले-भाले मुखड़े पर ये सवाल चिपकाए हुए मेरे सामने प्रस्तुत हुए, मैने बड़े आत्मविश्वास से उनसे कहा...लाइट बुलानी है न...? तो आओ, दोनो मेरे पास चुपचाप लेट जाओ...। न तो उठना है, न कुछ बोलना है। देखना, अभी लाइट आ जाएगी...।

मैने अपने पूरे जीवन में दोनो बच्चों को इतना आज्ञाकारी कभी नहीं देखा, जितना उस पल हो जाते थे। दोनो चटपट मेरे दोनो ओर लेट जाते थे। लेटने से पहले टीटू की चुनमुन को सख़्त ताकीद होती थी...चुनमुन, बिल्कुल चुप रहना है...ठीक...? नहीं तो मैं खेलूँगी नहीं...। चुनमुन जी एक बार मेरी अवज्ञा कर सकते थे, पर टीटू की हर बात सिर-माथे...। पहली बार तो मैने कुछ पल के चैन की खातिर यह बात यूँ ही कह दी थी, पर जब तक ये दोनो नासमझ रहे...और जब तक उन्हें कुछ देर शान्ति से लिटा पाने की मेरी यह कोशिश कामयाब होती रही...तब तक मेरे कहे हुए दस मिनट बीतते-बीतते हमेशा लाइट कैसे आती रही, आज तक यह बात मेरे लिए रहस्य ही है।
        आज दोनो बच्चे समझदारी की दहलीज़ पर आ चुके हैं और दोनो को यह बात बहुत अच्छी तरह याद भी है। आज भी कभी ज़िक्र चलने पर दोनो अपनी ऐसी बेवकूफ़ी पर दिल खोल कर हँसते हैं...पर मेरा सवाल अभी भी वैसे ही अनुत्तरित है...।
        क्या यह बच्चों का मेरे ऊपर वह मासूम विश्वास, मेरी बातों पर उनका अटल भरोसा ही था जो रोशनी बनकर सब कुछ उजियारा कर देता था...?
        विश्वास तेरा
        किसी दिये सरीखा
        राह दिखाता ।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

सागर की धारा है



 सुदर्शन रत्नाकर
1
सागर की धारा है
चप्पू टूट गया
मिलता न किनारा है ।
2
रिश्तों की बात करो
साथ निभाना है
तो नीयत साफ़ करो
3
तेज़ हवा का झोंका
भीतर आने दो
किसने रस्ता रोका ।
4
काले मेघा छाए
मन तो तरस रहा
प्रीतम घर ना आए।
-0-

सोमवार, 17 अगस्त 2015

ढूँढे नेह का पाश



सुशीला श्योराण
1
इस सावन

गूगल से साभार

बरसीं जो बुँदियाँ
झरी  अँखियाँ
तेरी याद में अम्मा
रोई रतियाँ
टूट गया री अम्मा
यादों का बाँध
बह रही हैं देख
भूली सुधियाँ
भीगे- से सावन में
भीगी माटी के
भीगे-भीगे गीतों में
बढ़ी पींगों में
सरसता वो प्यार
सौंधी ख़ुश्बू ने
तोड़ दिए हैं आज
मन के बाँध
बुला रहा है गाँव
वट की छाँव
हरियल डालियाँ
झूले-सखियाँ
मेंहदी-चूड़ी- संग
रोली बिंदिया
थाल भर घेवर
उठाए हूक
कोयलिया की कूक
छूट गए हैं
तेरे संग ही अम्मा
तीज-त्योहार
वो मान-मनुहार
उजड़ गया
भरा घर-आँगन
तुलसी चौरा
वीरान-सा कँगूरा
तुझे बुलाएँ
बिलखें अकुलाएँ
ये दिन-रैन
जड़ हैं जानें कैसे
नहीं लौटता
जाके कोई वहाँ से
पगले नैना
नहीं छोड़ते आस
तुझे ही ढूँढ़ें
ढूँढे नेह का पाश
तू दिख जाए काश !
        -0-