शुक्रवार, 27 मई 2022

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1-कृष्णा वर्मा

 1

लाख बनाएँ

अब मकाँ को घर

आख़िरकार

फिर हो जाए घर

बस एक मकान।

2

जुदा ज़माना

था अपना पैमाना

सब था सांझा

नहीं कोई पराया

था न्यारा सरमाया।

3

भतीजे- भांजे

दुख- सुख थे सांझे

गली मोहल्ले

सब चाचा- ता थे

खुशियों के साए थे।

4

ड्योढ़ी में खाट

दादा और हुक्के की

होती थी धाक

सब अपने ख़ाते

थे वहीं सुलझाते।

5

दादी औ नानी

सुनाती थी बीती औ

कथा- कहानी

चहकें थीं खुशियाँ

थे आँगन आबाद।

-0-

2-कपिल कुमार

1

प्रेम के बीज

वसुधा पे बिखेरे

घृणा की मात

ऐसे मिट्टी में मिली

ज्यों खरपतवार। 

2

हमारा प्रेम

साथ दौड़ते मार्ग

कभी ना मिलें

परंतु साथ रहे

मीलों तक चुप से। 

3

दूर क्षितिज

धरा- नभ- मिलन

प्रेम विजित

सूर्य गुस्से में लाल

हो गया बदहाल । 

4

स्नेह-नेत्रों से

चुटकी भर प्रेम

खोजता खग

वन-वन भटका

जैसे कस्तूरी-मृग। 

5

प्रेम-संयोग

सदा शाश्वत रहे

ज्यों भोर- उषा

प्रतीची भी चमकी

नियमविवर्जित। 

6

प्रेम-वियोग

बची स्मृतियाँ शेष

प्रतिज्ञा टूटी

शरीर जीर्ण-क्षीण

ज्यों अस्थि-अवशेष। 

7

क्यों बैठी प्रिये

मुँह फेरे उदास

प्रणय-मास

एक उदास नदी

ज्यों ढूँढ रही सिंधु। 

8

दुःख या सुख

सदा साथ रहे, ज्यों

चाँद-चाँदनी

दुःख साथ काटते

सुख साथ बाँटते। 

9

प्रेम में लीन

सदा ऐसे मिले, ज्यों

नदी सिंधु में

पूर्णतया विलीन

उत्सुक साथ बहे। 

10

प्रेम के क्षण

कृष्ण-राधा बजाते

बाँसुरी संग

हृदय में गूँजता

स्नेहपूर्ण संगीत। 

11

प्रेम में आस्था

शांत नदी ढूँढती

सिंधु का रास्ता

मिलों दूर मंजिल

सड़क भी सर्पिल। 

12

ज्यों पुष्प खिले

तितलियों ने खींचे

उनके गाल

प्रणय- अनुभूति

मन में लिये फिरे।

13

मेघों ने पढ़ी

नदियों की उदासी

क्यों रहीं प्यासी

रो- रोकर की वर्षा

ज्यों वियोग में प्रेमी। 

14

भ्रम में हुए

रिश्तों में समझौते

क्षणभंगुर

जन्मों-जन्म का प्रेम

पल में बने खोटे।

15

हवा का स्पर्श

कर रहा पेड़ो से

प्रेम-विमर्श

पत्ते झूमने लगे

डाल चूमने लगे। 

16

प्रणय नदी

चतुर्दिक बहती

हर्ष बिखेरे

घृणा बहा ले गई

प्रेम गीत कहती। 

17

छुपके फेंका

पत्थर में लपेट

प्रणय-पत्र

बालकनी पे पढ़े

चुनरी में समेट। 

18

दुःख लपेटे

खिड़की से झाँकते

नभ के पाखी

विथियों को ताकते

मंजूषा का बंधन। 

19

पढ़ा आज ज्यों

खिड़कियों में बैठ

आखिरी पत्र

याद आया अतीत

प्रेम था शब्दातीत।

20

हृदय -पीड़ा

प्रेम में भी ढूँढते

लोग सुविधा

विष बना, अमृत

कृष्ण नाम ज्यों लिया। 

21

खोया है कहीं

राधा-कृष्ण- प्रणय

प्रेम में चले

शतरंजी मोहरें

नेह मिला नगण्य। 

-0-

7 टिप्‍पणियां:

Rashmi Vibha Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर ताँका।
आदरणीया कृष्णा दीदी व कपिल कुमार जी को हार्दिक बधाई।

सादर

Anima Das ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचनाएँ.... 🌹🌹🌹आंतरिक बधाई आप दोनों को 🌹🙏🌹🙏

बेनामी ने कहा…

अतीत का मर्मस्पर्शी चित्रण। सब छूट गया है। बहुत सुंदर ताँका। बधाई कृष्णा वर्मा जी।
प्रेम को परिभाषित करते बेहतरीन ताँका। हार्दिक बधाई कपिल कुमार जी। सुदर्शन रत्नाकर

Krishna ने कहा…

बहुत सुंदर ताँका...हार्दिक बधाई कपिल कुमार जी।

प्रीति अग्रवाल ने कहा…

बहुत सुंदर रचनाएँ, कृष्णा जी और कपिल जी को हार्दिक बधाई!

नीलाम्बरा.com ने कहा…

सुंदर रचनाएँ। हार्दिक बधाई शुभकामनाएं।

Anita Lalit (अनिता ललित ) ने कहा…

सभी ताँका बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण!
हार्दिक बधाई आ. कृष्णा दीदी एवं कपिल जी!

~सादर
अनिता ललित