जीवन जाल ( सेदोका)
डॉ. जेन्नी शबनम
1.
जीवन जाल
जो सुलझे न कभी
ऐसा यह जंजाल
मिलता नहीं
कोई ओर या छोर
न रास्ता किसी ओर।
2.
तमाम उम्र
अभिनय में बीता
सच कोई न जाना,
मुख पे हँसी
मन में व्याप्त पीड़ा
कौन समझ पाया?
3.
जीवन स्वाँग
पल-पल गँवाया
जीवन हुआ व्यर्थ
जी नहीं सकी
अंत समय आया
मन है पछताया।
4.
वक़्त देखता
टकटकी लगाए
अपना हर खेल,
उसे है पता
किसी का न चलता
उसपे कोई ज़ोर।
5.
चौसठ कला
लगे चौसठ दिन
गुरु संदीपनी ने
सिखाई कला
कृष्ण और सुदामा
बलराम भी साथ।
6.
मेरी सहेली
नहीं है तू अकेली
साथ है छाया तेरी
साहस रख
मत छोड़ना आस
रखना तू विश्वास।
7.
सुन्दर जग
बेजोड़ शिल्पकारी
किसने कब की थी?
धरा-गगन
नदिया व पहाड़
अजब कलाकारी।
8.
वक़्त प्रहरी
चौकीदारी करता
रात हो या दिन हो,
पर झेलता
सबका रंजो-ग़म
मगर न थकता।
9.
भेष बदले
वक़्त बहुरूपिया
सबको भय दिखा
ठठाके हँसे
ये नहीं नादानी
उसकी मनमानी।
10.
सब्र के फल
दुःख के पकवान
मैंने जीभर खाए
अंततः हारी
जीवन बना ख़ार
मन है तार-तार।
-0-
4 टिप्पणियां:
जीवन के यथार्थ और दर्शन को दर्शाते बहुत ही सुंदर सेदोगा। बहुत-बहुत बधाई आपको। सुदर्शन रत्नाकर
ये जापानी काव्य विधा तांका/सेदोगा है। मुझे इस विषय की कोई जानकारी नहीं है। लेकिन जितना भी लिखा हुआ समझ आया मेरे विवेक अनुसार ये मुक्तक समय के प्रभाव को दिखाते हैं।
ये मुक्तक जीवन-दर्शन की सूक्ष्म अभिव्यक्ति हैं। कवयित्री ने जीवन को 'जाल', 'स्वांग' और 'अभिनय' के रूपकों से बहुत सटीक पकड़ा है। भाषा बेहद सरल, पर भाव गहरा है - बाहर हँसी, अंदर पीड़ा; पूरा जीवन अभिनय में बीत जाना और अंत में पछतावा। हर बंद में वक़्त को सबसे बड़ा निर्णायक बताया गया है, जिसके आगे किसी का ज़ोर नहीं चलता। संक्षिप्तता में इतनी बड़ी बात कहना ही इन रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
बहुत समय बाद सुंदर सेदोका पढ़ने को मिले। जीवन दर्शन को उकेरते सुंदर रचना-कर्म की बधाई डॉ जेन्नी शबनम जी।
जीवन के यथार्थ को दर्शाते अत्यंत भावपूर्ण व बहुत सुंदर सेदोका, जेन्नी जी!
~सादर
अनिता ललित
एक टिप्पणी भेजें