गुरुवार, 17 सितंबर 2015

पाँव छिले हैं !



पाँव छिले हैं !
1-ताँका:अनिता ललित
1
कैसे गिले हैं !
ज़हरीले काँटों से-
पाँव छिले हैं !
वक़्त ने उगाए जो,
दिल में वो चुभे हैं !
2
तुम जो रूठे
यादें ठहर गईं
वक़्त न रुका !
चलती रही साँसें
धड़कन है थमी।
3
भूलेंगे कैसे !
तुमसे ग़म मिले-
सहेजे मैंने !
ये हैं प्यार के सिले-
अब होंठ हैं सिले !
4
दिल की गली
तेरी यादें हैं टँगी
आँखें हैं गीली !
पलक-अलगनी
हुई हैं सीली-सीली।
5
उनींदी रात,
चाँद-झूमर सजा
घर को चली।
किरणें थामें हाथ
कहें, भोर हो चली
-0-
2-माहिया-सुदर्शन रत्नाकर
1
मिसरी की डलिया हैं
खिलने दो इनको
कोमल ये कलियाँ हैं।
2
हर घाट लगा पहरा
मोती वह चुन लेगा
साहस जिसका गहरा।
3
महलों में रहते हैं
वो कैसे जाने
निर्धन  दुख सहते हैं।
4
कंचन सी काया है
मत अभिमान करो
पल भर की माया है।
5
सागर की लहरें हैं
कैसे टूटे वो
रिश्ते जो गहरे हैं।
6
सुख -दुख तो छाया है
सब कुछ सह ले तू
प्रभु की यह माया है।

    -0-

सोमवार, 14 सितंबर 2015

दीप्त हो तेरा वेश



ज्योत्स्ना प्रदीप

सब बदला !
बस !तुम ही तो हो
आज तक भी ,
हो उतनी ही प्यारी ।
वह पहली
मिश्री- सी किलकारी ,
रसना पर
तूने ही तो घोली थी ।
शिशु रूप में
माँ! सच!. तू बोली थी
घर में ही क्यों ?
हर प्रान्त में तेरी
वो मीठी चास 
तुझसे वर्तमान
  इतिहास ।
विदेशों में भी  तो
अपना ध्वज
फ़हरा  कर आई
वीराने दिल
बहारें बन आई
मन की बात
 सबने  ही  जानी है
और ठानी है-
राजभाषा  के साथ
मातृभाषा का
छत्र तुझे  चढ़ाना
अभी शेष है
दीप्त हो तेरा वेश
यही शुभ्र सन्देश ।
   -0-

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

यादों वाला पिटारा



1- डॉ भावना कुँअर

हौले से आया
दबे पाँव लेकर
ख्वाबों में मेरे
मेरी अम्मा का गाँव
बिना दस्तक
सपनों के दर पे
रख के गया
सुनहरी यादों के
चमचमाते
जुगनू से दीपक।
पहले लाया
पिटारे से अपने
मीठे से आम
नीम की निबौंलियाँ
जामुन,बेर
मक्खन और छाछ
गरम गुड़
अनोखा बड़ा स्वाद।
बैलों की जोड़ी
घुँघरुओं की बोली।
कुएँ का पानी
परियों की कहानी।
जली-बुझी सी
डिबिया की वो बाती
न बन पाती
जो पतंगों की साथी?
दूजा पिटारा
कचरे और फूँट
मेडों से कहे
वो किस्से भरपूर।
मकई रानी
ओढ़कर दोशाला
शान से खड़ी
है सेक रही धूप।
पोई की बेल
छत पे चढकर
नीचे न आती।
तीजा पिटारा जब
वो खुल जाए
भीनी माटी गंध को
खूब फैलाए।
तीज,होली, दीवाली
तो मेले कभी
जाने कितने रंग।
चौथा पिटारा
चुप न रह पाए।
मीठी गुँझिया,
खोया ओढ़े घेवर
है इतराए।
फूले न समाते थे
नीम के पेड़
चलती थी उनपे
झूलों की रेल।
कितने अनोखे थे
सारे ही खेल।
अब फ्रोजन खाते,
डिबिया नहीं
बल्ब टिमटिमाते।
पेड़ भी नहीं,
बोनसाई सजाते।
न मीठा पानी
बिजलेरी ही लाते।
अगले साल
उस गाँव जाऊँगी
बिना बताए
यादों वाला पिटारा-
अम्मा की बुनी
रंगबिरंगी लोई,
दरी,गलीचा
रंगीन टोकरियाँ
सब लाऊँगी
सूने मन के कोने
फिर हरषाऊँगी।
-0-
2-कमल कपूर

भावना! !!

संग तुम्हारे
बह रही हूँ मैं भी
आँसू नदी में
आसान नहीं होता
यादें भूलाना
और मुश्किल भी है
उन्हें बुलाना
क्यों जी नहीं सकते
उन्हें फिर से
कसक जगती है
सुहाने दिन
जो गुजर गये हैं
अब तो सिर्फ
साँस ही ले रहे हैं ।
-0-
3-सेदोका-कमल कपूर
1
पथ पे मेरे
बिछाते थे वो शूल
मैंने बिछाए फूल
तो हुआ यूँ कि
पलक पाँखुरियाँ
बिछाने लगे हैं वो।
-0-

बुधवार, 9 सितंबर 2015

629-'ये नाम के अपने'



अनिता ललित
1
अपने बाँटें
जब काँटे ही काँटे
ठेस भरी सौगातें,
चुभती बातें !
चिलकता है मन
हो बोझिल जीवन।
2
देते हैं धोखा
पहन के मुखौटा
ये नाम के अपने
लगाते गले
दवा के नाम पर
दें ज़हर का प्याला।
3
शब्दों के बाण
जब-तब चलाते
आहत कर जाते
दिखाते शान
ये लेते नहीं प्राण
देते ज़िंदा ही मार।
4
आशा की डोर
कोई ओर न छोर
बरबस ही बाँधी,
सन्तान- संग-
हुई कैसी ये भूल
है किसका क़ुसूर ?
5
झूठे हैं रिश्ते
हैं बातें मिलावटी
जब नीयत खोटी
ओ मेरे ख़ुदा !
नहीं पुकारता क्या
अब ख़ून, ख़ून को?
-0-