बुधवार, 27 जुलाई 2022

1054


1-रश्मि विभा त्रिपाठी

1

मिला उन्हीं से

मधुमय संगीत

मौन की तोड़ी रीत

मेरी उनकी

जन्म- जन्म की प्रीत

मन को बाँचें मीत।

2

मीठी वाणी से

मेरा विषाद हरें

मोह का भाव भरें

वे मंत्रमुग्धा

जादू मन पे करें

बोलें तो फूल झरें।

3

नेह तुम्हारा

न्यारा इत्र लुटाए

जीवन महकाए

मन- मरु में

मधुमास ले आए

प्रिय! प्राण हर्षाए।

4

धन्य जो पाया

प्रिय का प्रोत्साहन

प्रेम- भाव पावन

दुर्भाग्य! देखूँ

द्वेष का ही हवन

धू- धू औरों का मन।

5

प्रिय तुमने

प्रार्थना गीत गाए

प्राण मेरे जिलाए

भावप्रवण

मन तुमको ध्याए

मोल चुका न पाए।

6

समृद्ध हुआ

मन का कोना रिक्त

मधु भाव, न तिक्त

मिला प्रिय का

आशीष नेहसिक्त

माँगूँ क्या अतिरिक्त।

7

मुझे देते हैं

नित नव आशाएँ

करके कामनाएँ

ये उपकार

प्राण कैसे चुकाएँ

प्रिय की लें बलाएँ।

8

रोक लेता है

पीड़ाओं का प्रहार

प्रिये तुम्हारा प्यार

धमनियों में

नित्यप्रति संचार

होता हर्ष अपार।

9

प्रिय तुम्हीं से

मेरा जीवन- सार

मिला मुझे आधार

भूलकरके

मैं सकल संसार

तुम्हीं में एकाकार।

10

दुख का रोग

जो हो असरदार

मेरा तीमारदार

पल में करे

पीड़ा का उपचार

प्रिये तुम्हारा प्यार।

11

सादा मन पे

चले रंग लगाने

हरगिज न माने

मैं सराबोर

आए प्रिय लुटाने

आनंद के खज़ाने।

-0-

2-कपिल कुमार

1

नापों अगर

लेके प्रेम-पैमाना

मिलेगा सदा

प्रेम से भरपूर

हृदय मेरा

इसके अतिरिक्त

तुम्हारे लिए

ईर्ष्या का क्षेत्रफल

शून्य से थोड़ा नीचे।

2

कर रहा हूँ

प्रेम-अनुप्रयोग

बना रहा हूँ

प्रेम त्रिज्याएँ खींच

सुन्दर से दो

संकेंद्री-प्रेम-वृत्त

जिसके मध्य

परिधि-परिबद्ध

समस्त भाग

रखेगा सदा शून्य

ईर्ष्या का क्षेत्रफल। 

3

छोड़के गंगा

पंच प्रयाग, घूमें

देश-विदेश

हिमालय से लेके

बंगलादेश

पीछे छोड़के गई

तटों की पीड़ा

अकेली ही दौड़ती

ना कोई वीजा

होकरके उदास

गंगा के घाट

भगीरथ की देखें

आठों पहर बाट। 

-0-


रविवार, 24 जुलाई 2022

1053-नदी

 भीकम सिंह 

 

नदी -8

 

फिर से मची 

सिन्धु में खलबली 

रुकी हुई-सी 

एक नदी ज्यों चली 

कुछेक लाश 

लेकर अधजली 

कोरोनाओं की 

जब आँधी-सी चली 

झूठ ने बोला 

लेकर गंगा जल 

नदी की कहाँ चली 

 

नदी  - 9

 

एक है व्या 

बेशुमार सपने 

उसने देखे 

बरफ़ की चादर 

हटा-हटाके

धूप के पल सेंके 

कुल्लू से मण्डी 

ज्यों हवा बही ठंडी 

झूमके दौड़ी

तट के पेड़ बड़े 

तरसे खड़े-खड़े 

 

नदी  - 10

 

हुम्म-हुम्म-सा 

बोलके कराहती 

दम तोड़ती 

तड़पती थी नदी 

सिन्धु लपेटे 

साँझ का झुरमुट

निहारता था 

मिलने को आतुर 

तट पर ही 

हाथ-पाँव मारती 

लहरें पुकारतीं 

 

नदी  - 11

 

नदी की पीड़ा 

ज्यों घनीभूत हुई 

हवा निश्चल 

पेड़ों पे गुम हुई 

छिटक गए 

रास्ते के पाथर भी 

डेल्टा पे लगे 

सागर के पहरे 

सहानुभूति 

जताने को उमड़ी 

तट पर लहरें ।

 

नदी- 12

 

रुग्ण हो गई 

दो किनारों के बीच 

सदी की नदी 

बालू से पीठ लगा 

फूँकती साँस 

सुबह से उठती 

दिशा-मैदान 

कछारों में करती 

पानी रखती 

उगी दूब के पास 

श्याम में जगी आस 

गुरुवार, 21 जुलाई 2022

1052

 

भीकम सिंह 

 

नदी  - 6

 

बाढ़ ओढ़के 

खींच लेती है नदी 

तट की बाहें 

गुजरे समय की,

याद करके 

कुछ भूली - सी राहें 

छोड़के आई 

सावन में बहाके 

तोड़ी गई वो

तमाम वर्जनाएँ 

नदी को याद आएँ ।

 

नदी -7

 

निजी मानके 

तटों ने बीचों-बीच 

बहती नदी 

गहरे कोहरे में 

कभी-कभी यूँ 

सोचकर हैरान 

बड़बड़ाती 

शायद हो हूबहू 

पहले जैसा

ऋषि का कोई रास

पैदा हो वेदव्यास ।

-0-

रविवार, 10 जुलाई 2022

1051-सम्बन्धों की सुनामी

  रश्मि विभा त्रिपाठी

 

कोई अपना


भरोसे पर बना

छोड़के घर

नए सफर पर

निकलता है

करके रुख सख्त

विदा के वक्त 

मन दरकता है

पाँव के तले

जब सरकता है

एक टुकड़ा 

जमीन का, था खड़ा

उठाए सर

उम्मीद का महल

वहाँ केवल 

बचता खंडहर 

स्वप्न बेघर

सर पे छत नहीं

नींव से बही

आँसू की नदी खारी 

मन की आशा

भँवर बीच हारी

उठा तूफान

आफत में जी, जान

आई जो आज 

सम्बन्धों की सुनामी

स्नेह में क्या थी खामी?

 -0-

शनिवार, 9 जुलाई 2022

1050- नदी

 भीकम सिंह

 

नदी- 1

 

नदियाँ सभी

जहाँ तक भी गईं

भँवर सारे

उसके साथ गए

फिर कौन है

जो नदियों की सारी

हँसी खा गया

बड़े सिन्धु के बीच

चर्चा ज्यों हुई

शहरी काफिलों पे

रुकी शक की सुई।

 

नदी- 2

 

नदी बूढ़ी है

हौसले को हारी-सी

मैदान खोले

जंग की तैयारी-सी

निर्बल तट

उदासियों की बालू

बेच -बेचके

पत्थर तराशे हैं

चला-चलाके

दिल पर आरी -सी

जागी है खुद्दारी-सी ।

 

नदी - 3

 

नावें थकीं -सी

घाटों पे बँधी हुई

तेरे दुःख से

दुःखी हुई हैं नदी !

तुझ पे जुल्म

बढ़ता देखकर

सभी ने जैसे

अन्याय के विरुद्ध

हड़ताल की

तेरा पाट लौटेगा

केवट ने बात की।

 

नदी- 4

 

साल वृक्षों से

लिपटकर रोई

पीड़ित नदी

दूभर हुआ मेरा

इस समय

जिन्दा बने रहना

किससे कहूँ

तुमसे क्या छिपाना

खोजे हैं मैंने

जमीन में सूराख़

आती सीता की याद ।

 

नदी  - 5

 

भटके हुए

मैदानों के हालात

देख नदी ने

जख़्मी हुए पंखों को*

जैसे फैलाया

रोता हुआ झरना

बुदबुदाया

ठेकेदार गुज़रे

जहाँ-जहाँ से

निर्जन है वहाँ पे

तू सँभल यहाँ से ।

 

* पर्वतीय ढाल से जब नदी मैदानों में प्रवेश करती है तो जलोढ़ पंख नाम की स्थलाकृति बनाती है, उससे पहले जल प्रपात (झरना) का निर्माण कर चुकी होती है

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रविवार, 3 जुलाई 2022

1049-चार चोका

भीकम सिंह 

 

नदी-1

 


दर्रों
, ढालो से 

छिपती-छिपाती-सी

एक नदिया 

गंदे नालों के फंदे 

सुलझाती-सी 

प्रेम में जब पड़ी

सुध-बुध खो 

सागर की साँसों का 

तूफान बनी 

लहर-लहर का

वो,अभिमान बनी 

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नदी-2

 

सुडौल देह

पहाड़ों से उतरी 

बलखाती-सी 

खजुराहों की याद 

हर मोड़ की

भंगिमा दिलाती थी

कुछ था, नदी !

जो बाँहें फैलाकर

तटों ने माना 

क्यों विदेह हो गई

दया की पात्र नदी 

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नदी -3

 

बेजान नदी !

तेरे लिए आखिर 

सागर क्यों है 

इतना सपनीला 

जिसके लिए 

पाँव-पाँव चलके 

जख़्मी हो जाना 

पसन्द है तुझको 

ताक लगाए 

गिद्ध-से नालों का भी

खौफ नहीं तुझको 

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नदी-4

 

डेल्टा के तले 

दीर्घ नि:श्वास भरा 

नदी ने जब

ठोकर - सी खाकर


गिरीं लहरें
 

सभी किनारों पर 

मोती छिटका 

सीपियाँ बिखरी ज्यों 

गुस्से में सिन्धु 

आलोड़ित हुआ त्यों 

और विलोड़ित भी 

 

 डेल्टा  - जब नदी सागर से मरणासन्न स्थिति में मिलती है तो डेल्टा स्थलाकृति का निर्माण करती है ।

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