शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

मन भटका


मीनाक्षी धन्वन्तरि
आज अचानक आटा गूँथने ही लगी थी कि तेज़ दर्द हुआ और हाथ बाहर खींच लिया... देखा छोटी  उँगली से फिर ख़ून बहने लगा था ।ज़ख़्म गहरा था ।दर्द कम होने के बाद किचन में आने का सोचकर बाहर निकल आई।याद आने लगी कि रियाद में कैसे शीशे का गिलास धोते हुए दाएँ हाथ की छोटी उँगली कट गई थी और ख़ून इतनी तेज़ी से बह रहा था कि उसका सुर्ख रंग मन में एक अजीब -सी हलचल पैदा करने लगा था।उँगली कुछ ज़्यादा ही कट गई थी; लेकिन दर्द नहीं  हो रहा था ।
मैं बहते खून की खूबसूरती को निहार रही थी-चमकता लाल सुर्ख लहू! गिरता भी खूबसूरत लग रहा था !!अपनी ही उँगली के बहते ख़ून को अलग -अलग एंगल से देखती आनन्द ले रही थी!!!
  अचानक उस खूबसूरती को कैद करने के लिए बाएँ हाथ से दो चार तस्वीरें खींच लीं;लेकिन अगले ही पल एक अनजाने डर से आँखों के आगे अँधेरा छा गया ।भागकर अपने कमरे में गई ।सूखी रुई से उँगली को लपेटा और कसकर पकड़ लिया.... उसी दौरान जाने क्या -क्या सोच लिया !
        एक पल में ख़ून कैसे आँखों में चमक पैदा कर देता है और दूसरे ही पल मन को अन्दर तक कँपा देता है । सोचने पर विवश हो गई कि दुनिया भर में होने वाले ख़ून ख़राबे के पीछे क्या यही कारण हो सकता है !
बहते ख़ून की चमक,तेज़ चटकीला लाल रंग,उसका लुभावना रूप देखने की लालसा,फिर दूसरे ही पल एक डर,,गहरा  अवसाद घेर लेता हो । मानव प्रकृति ऐसी ही है शायद !
पल में दानव बनता, पल मे देव बनता मानव शायद इंसान बनने की जद्दोजहद में लगा है-क्या सिर्फ मैं ही ऐसा सोचती हूँ!!पता नहीं आप क्या सोचते हैं...  !!!!!
                मन भटका
                जन्मी वहशी सोचें
                राह मिले न ।


बुधवार, 16 जुलाई 2014

खनके बाजूबंद




सेदोका
कृष्णा वर्मा

1
बरसे मेंह 
धुले छत-आनन
स्नान करें  दीवारें,
गंदे जल से
मुख भर करते
हैं कुल्ले परनाले
2
छनकी बूँदें
सरसे धरती भी
ज्यों कविता में छंद
मंद समीर
सरगम गाए ज्यों
खनके बाजूबंद
3
बरसी घटा
मचली हैं लहरें
जा -जा छुएँ  किनारे
तट के काँधे
चढ़कर लहरें
झाँकें देखें नज़ारे।
-0-
ताँका
घनश्याम नाथ कच्छावा
1
गर्म तवे -सी
तपती धरा पर
वर्षा की बूँद
छम-छम सी बोली
नभ से गिर कर ।
 2
प्यार कीजिए
तभी जान पाओगे
जीने का सच
वरना जो जन्मा है
उसको मरना है।
-0-
 

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

भारी बुगची


                                                                                                                                                                                 

काली स्याह अँधेरी रात ........... फोन की घंटी  ........... बेवक्ती अनहोनी। उसकी साँसे डूबने लगीं। कुछ ही पलों में उसका रंग धुएँ जैसा हो गया। उसकी सोच को जैसे लकवा मार गया हो। आँखों में झरना बने आँसू रोकने पर भी रुक नहीं रहे थे। कलमुँही अनहोनी ने कहर ढाह दिया था। उसकी ज़िन्दगी के रास्तों का हमसफ़र ........... लम्बे सफ़र का साथ छोड़ ........... किसी अज्ञात देस चला गया ........... जहाँ से कभी कोई लौटकर नहीं आया। दिनों के महीने .......और ........महीनों के साल बनते गए मगर उसके लौटने की इन्तज़ार कभी ख़त्म न हुई।
             उसको ज़िंदगी एक खला लगने लगी। सूली टँगे पल पीछा करते हुए  लगते। ज़िंदगी सूखी शाखा जैसे तिड़क गई। दुखों की आँधियों को झेलती ......रब से शिकवे करती वह टूट जाती," उसका साथ तो अब एक सपना ही बन गया। रब ने पता नहीं किन कर्मों का बदला लिया मुझसे। बिलकुल भी रहम नहीं आया .... बूढ़े माँ -बाप की लाठी का सहारा न रहा। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ये ज़िंदगी इतनी मुश्किल भी हो सकती है। जब कभी किसी बूढ़े -जोड़े को एक साथ देखती हूँ.... लगता है यह लकीर तो मेरे हाथों पर रब शायद डालनी ही भूल गया। न जाने कैसे निकलेगी यह पहाड़ जैसी जिंदगी अकेले ?
  बहुत मुश्किल होता है पाँव में शूलों का पनपना और इसकी पीड़ा को अपने दिल में समाना। उसको प्रतिदिन भीतर ही भीतर पिघलते देखती हूँ। मुझे कभी कुछ नहीं मिला उसके आश्वासन की सूनी झोली में डालने के लिए ..... मोह तथा अपनेपन की दिलासा के सिवाय ।शायद यही उसकी अँधेरी राहों में कभी रौशनी की लौ बन जाएँ।
भारी बुगची
कँकरीले ये रास्ते
ख्मी है पैर।   
डॉ हरदीप कौर सन्धु