सोमवार, 17 दिसंबर 2018

846-चुप ही है लड़की


चुप ही है लड़की
डॉoकविता भट्ट

स्वयंप्रभा थी
चित्र - गूगल से साभार
सुरम्या थी ,जो कभी
दीपशिखा-सी
मौन है ओढ़े हुए
बुझी रात्रि के
यों शीत तिमिर से
कुछ नमी है
मन के भीतर ही
आँखों की छत
अब भी न टपकी
चुप ही है लड़की...

15 टिप्‍पणियां:

अनिता मंडा ने कहा…

बहुत सुंदर उपमाएँ प्रयुक्त हुई हैं। बधाई कविता जी

neelaambara ने कहा…

हार्दिक आभार अनिता जी

dr.surangma yadav ने कहा…

अतिशय सुंदर चोका,बधाई कविता जी।

Dr. Purva Sharma ने कहा…

वाह ! सुन्दर रचना... हार्दिक बधाई

Krishna ने कहा…

बेहद सुंदर चोका, बधाई कविता जी।

Sudershan Ratnakar ने कहा…

बहुत सुंदर चोका।बधाई कविता जी

Dr.Purnima Rai ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति एवं उत्कृष्ट रचना

Kailash Sharma ने कहा…

लाज़वाब अभिव्यक्ति...

Satya sharma ने कहा…

बहुत ही उम्दा सृजन
हार्दिक बधाई

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बेहद भावपूर्ण, बधाई कविता जी.

rameshwar kamboj ने कहा…

लघुता में भावों की गुरुता अभिनन्दनीय है ।

neelaambara ने कहा…

आप सभी स्नेहीजन को हार्दिक धन्यवाद।

Dr.Bhawna ने कहा…

bahut sundar bhav bahut bahut badhai

ज्योति-कलश ने कहा…

बहुत सुन्दर सृजन , बधाई !

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

कविता जी, बहुत गहरे तक छू गई ये पंक्तियाँ...ख़ास तौर से आखिरी की दो पंक्तियाँ...| ढेरों बधाई...|