मेरी पसन्द [पुस्तक झरे हरसिंगार से एक ताँका]/ सुरभि डागर
आदरणीय रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी विख्यात साहित्यकार अभिनंदनीय और वंदनीय है। इनको किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। इनका लेखन स्वयं इनका परिचय देता है आपने बाल साहित्य अथवा लघुकथा, हाइकु, ताँका, सेदोका,चोका तथा हाईवन आदि जैसी जापानी विधाएँ, दोहा , मुक्तक और छंद आदि में विशेष साथ ही स्वभाव से सरल और विनम्रता के धनी हैं ,जो अपनी स्नेह की डोरी से बाँध लेते हैं इनकी रचनाओं में गहन संदेश छुपा होता है। एक ताँका देखिए-
चुप्पी
से झरे
ढेरों
हरसिंगार
अबकी
बार
देखो
तो मुड़कर-
ये थे
बोल तुम्हारे।
यह
काव्यांश विरह, स्मृति और मौन की गहन अनुभूति को अत्यंत
संक्षिप्त शब्दों में व्यक्त करता है। कवि ने यहाँ चुप्पी और हरसिंगार जैसे
प्रतीकों के माध्यम से अनकहे प्रेम और बिछोह की मार्मिक अभिव्यक्ति की है।
चुप्पी
से झरे/
ढेरों हरसिंगार पंक्ति में हरसिंगार केवल फूल नहीं, बल्कि मौन में झरते भाव, अधूरे संवाद और स्मृतियों का प्रतीक बन जाता
है। हरसिंगार का स्वभाव ही रात भर खिलकर प्रातः चुपचाप धरती पर बिखर जाना है। यही
गुण मानवीय संबंधों के उस दर्द से जुड़ता है, जहाँ प्रेम बोलता कम है और बिखरता अधिक है।
अबकी
बार देखा
तो मुड़कर में एक विनम्र आग्रह है। यह
आग्रह शिकायत नहीं, बल्कि अंतिम आशा का स्वर है। इसमें प्रतीक्षा
भी है और इस संभावना का संकेत भी कि शायद एक बार पीछे मुड़कर देखने से बिछुड़े हुए
संबंधों में फिर से ऊष्मा लौट सके।
ये थे
बोल तुम्हारे" अंतिम पंक्ति पूरे काव्यांश को स्मृति के धरातल पर स्थापित कर
देती है। पाठक को ज्ञात होता है कि यह वर्तमान का संवाद नहीं, बल्कि प्रिय के कभी कहे गए शब्दों का स्मरण है। यही स्मृति वर्तमान की नीरवता
को और अधिक मार्मिक बना देती है।
शिल्प
की दृष्टि से यह रचना अत्यंत सघन और सांकेतिक है। कम शब्दों में अर्थात् 5+7+5+7+7= 31 वर्णों
में व्यापक भावभूमि रच देना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। हरसिंगार का
बिंब कविता को सौंदर्य और करुणा दोनों प्रदान करता है, जबकि चुप्पी उसे गहन मनोवैज्ञानिक आयाम देती है।
-0-

23 टिप्पणियां:
सुंदर रचना,सरलता से समझती समीक्षा❤️ आप दोनों को बधाई एवं शुभकामनाएं 💐
बहुत ही भावपूर्ण रचना और उतनी ही भावप्रवण समीक्षा। आप दोनों ही प्रशंसा के पात्र हैं। शुभकामनाएं।
बहुत ही सुन्दर रचना और उत्कृष्ट समीक्षा... 🙏🏻👏🏻👏🏻
बधाई और अनेकों शुभकामनाएं.... 🙏🏻
आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
बहुत सुन्दर ताँका सृजन और उत्तम समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई।
विभा रश्मि हैदराबाद
जितना सुंदर ताँका है,आपने उतने ही सुंदर व सहज ढंग से उसके भावों की व्याख्या करके रसानुभूति को और बढ़ा दिया। बहुत बधाई।
जितना सुंदर, कोमल और भावपूर्ण ताँका है, उतनी ही कोमल व्याख्या है!
~सादर
अनिता ललित
जिस भावभूमि पर कवि किसी रचना का सृजन करता है, उसी मनःस्थिति में जाकर उसकी व्याख्या करना सहज नहीं होता किन्तु सुरभि डागर जी ने यह कार्य सहजता से किया है। आदरणीय काम्बोज जी के इस भावपूर्ण ताँका के अर्थ का मर्म उसी भावभूमि में उतरकर खोला है। इस सरस ताँका और उसकी भावपूर्ण व्याख्या के लिए आदरणीय काम्बोज जी और सुरभि डागर दोनो को बधाई
भाव बहुत ही बढ़िया लगे
पूनम जी आपका हार्दिक आभार।
सुरभि डागर
आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
सुरभि डागर
आपका हार्दिक आभार।
सुरभि डागर
आपका हार्दिक धन्यवाद।
सुरभि डागर
आपका हार्दिक आभार।
सुरभि डागर
बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
सुरभि डागर
वृहत एवं लीक से हटकर की गयी समीक्षा की बधाई, शुभकामनाएँ।
काम्बोज जी की रचनाओं में इस तरह के अद्भुत दृश्य, विचार और भावों को अलग दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।
शुभकामनाएँ सर।
वाह! आदरणीय काम्बोज भाई साहब की लेखनी को नमन!
अत्यंत सरल, सहज, गहन और सुकोमल तांका!!
सुरभि जी की सुंदर, सारगर्भित व्याख्या ने पूरा न्याय किया!! धन्यवाद!
सुंदर सरस ताँका और उसकी सुंदर विश्लेषणात्मक समीक्षा के लिये स. काम्बोज भाई जी को व सुरभि जी को हार्दिक बधाई | पुष्पा मेहरा
आपका हार्दिक आभार।
सुरभि डागर
आपका हार्दिक आभार।
सुरभि डागर
बहुत सुन्दर तांका।
बहुत सुन्दर समीक्षा।
हार्दिक बधाई आप दोनों को।
सादर
एक खूबसूरत संग्रह की एक सार्थक समीक्षा...आदरणीय कंबोज जी व सुरभि जी को बहुत बधाई।
उत्कृष्ट ताँका का बहुत सुन्दर विस्तृत विश्लेषण। हार्दिक बधाई। सुदर्शन रत्नाकर
एक टिप्पणी भेजें