डॉ.सुरंगमा यादव
क्या बन जाऊँ!
जो पी के मन भाऊँ
सारे सपने
अपने बिसराऊँ
स्वप्न पिया के
मैं नयन बसाऊँ
मौन सुमन
सुरभित होकर
कंठ तिहारे
मैं लग इठलाऊँ
कुहू -सा स्वर
पिया मन आँगन
कूज सुनाऊँ
पीर-वेदना सारी
सह मुस्काऊँ
बनूँ प्रीत चादरा
पिया के अंग
लग के शरमाऊँ
और कभी मैं
जो जल बन जाऊँ
अपनी सब
पहचान भुलाऊँ
रंग उन्हीं के
फिर रँगती जाऊँ
योगी -सा मन
हो जाए यदि मेरा
सम शीतल
मान -अपमान को
सहती जाऊँ
जो ऐसी बन जाऊँ
तब शायद
पिया के मन भाऊँ
प्रेम बूँद पा जाऊँ
-०-








