परमजीत कौर 'रीत'
1
खामोशी कहती है
यादें सावन बन
आँखों से बहती हैं
2
आँगन के फूलों की
याद बहुत आए
नानी-घर झूलों की
3
नभ को तकती नजरें
पाँव धरा पे जो
मंजिल थामे बाहें ।
4
क्या खोना ,क्या
पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर
जाना।
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