बुधवार, 17 अगस्त 2022

1063

 

भीकम सिंह

 

पहाड़  - 8

 

पर्वत बड़े 

बड़ी शिलाएँ खड़ीं

बड़े ही खड्ड 

तिरछे कटकर 

आड़े खड़े हैं 

 सब गढ़े ग हैं 

शैल- साँचों में 

जैसे मढ़े ग हैं 

पर्यटकों की

ओढ़कर याना 

माँगे क्षमा-याचना ।

-0-

पहाड़- 9

 

अल सुबह

अकड़कर खड़े 

पर्वत सारे

जंगल की जुल्फों को

हवा सँवारे 

शबाब का सूरज 

पूर्व दिशा से

भरता है हुंकारे

ऊर्जा के लिए 

वनों में जैसे जादू

धूप-धूप पुकारे 

-0-

पहाड़  - 10

 

उजले - से हैं

पहाड़ के अँधेरे 

प्रेम से मिले 

परछाई के घेरे 

हलचल - सी 

चाँदनी पैदा करे

पल - पल में 

बौरा गया हो जैसे 

रात में चाँद 

छोड़ के सारे ताड़ 

सबकी लेता आड़ ।

 

पहाड़  - 11

 

चढ़ा ज्यों पारा 

पहाड़ों के जिस्म पे

दुःख को रोते 

बढ़ा नदी का धारा

देखा लोगों ने 

था साँझ में उतारा 

पेड़ों से आरा 

जो छोड़कर गया 

बेतुके चिह्न 

और वनों का नारा 

वो लौटेगा दोबारा ।

-0-

पहाड़- 12

 

पहाड़ों से यूँ 

नीचे उतरा कोई 

पुराना जख़्म

उभार गया कोई 

प्लास्टिक फेंकी 

जिन रस्तों पे कभी 

उनसे आज

फिरगया है कोई 

हरियाली- थी 

जिसको मरुभूमि 

कर गया है कोई 

-0-

1062

 कपिल कुमार

चोका

1

मेघों के राजा

किधर चले तुम

एक पंक्ति में

बोरी-बिस्तर उठा

विदा ले ली क्या

या धरा से नाराज़

लौटके आओ

खेत अति व्याकुल

प्यास के मारे 

अब पूर्ण खोल दो

अधखुले कपाट। 

-0-

ताँका

1

मन करता

कैद करके तुम्हें

मन-भीतर

बाहर से लगा लूँ

अलीगढ़ का ताला। 

2

नभ में घूमे

मखमल- सी रुई

मेघों का दल

खेतों की समस्याएँ

पल में की थी हल। 

3

मेघ रूठके

खेतों को स्वप्न दिखा

झूठमू के

रथ पे बैठकर

हुए रफू-चक्कर। 

4

नभ को घेरे

खड़े हुए थे मेघ

साँझ-सवेरे

ज्यों ही बरसे प्यारे

खेतों के वारे-न्यारे।

5

मेघों से रिश्ता

जोड़े रखना धरा

वरना मेघ

खेतों के स्वप्नों पर

जाएँगे, पानी फिरा। 

6

मेघों को दिए

धरा ने लिखकर

मन के भाव

मेघों ने पाट दिए

सब गाँव के गाँव।

-0-

शनिवार, 13 अगस्त 2022

1061

 1-सोच  

 सुदर्शन रत्नाकर

 

       संसार में मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो सोचने की क्षमता रखता है। पशु -पक्षी में शायद यह गुण नहीं है। है भी तो वह अपने भावों को व्यक्त नहीं कर सकते। पर मनुष्य सोच भी सकता है और व्यक्त भी कर सकता है।  लेकिन यह उस पर निर्भर करता है कि वह कैसी सोच रखता है-सकारात्मक अथवा नकारात्मक। उसकी इस सोच और अभिव्यक्ति का उसके जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है केवल उसके जीवन पर  ही नहीं अपितु उसके संपर्क में आने वाले लोगों को भी यह सोच प्रभावित करती है।

         जैसी सोच ,वैसा जीवन। पानी का गिलास आधा ख़ाली है या आधा भरा हुआ है बात तो एक है लेकिन ख़ाली है कहना हमारी नकारात्मक सोच को दर्शाता है और भरा हुआ सकारात्मक विचार है। यही दृष्टिकोण जीवन के प्रति है, जो नहीं है उसका विलाप करते रहना , शिकायत करते रहना ,जीवन को कंटकों से भर देता है, जो है उसके लिए ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त कर संतुष्ट हुआ जा सकता है।  यह सकारात्मक सोच होगी। बात केवल सोच बदलने की है इससे हमारा जीवन स्वाभाविक रूप से बदल जाएगा ।यदि हम मानसिक रूप से ख़ुश हैं तो हमारे आसपास का वातावरण भी ख़ुशगवार होगा। तन स्वस्थ होगा , काम करने की  क्षमता बढ़ेगी जिससे हम अपने परिवार. समाज को अपना कुछ देकर आगे बढ़ाने में सहयोग दे सकते हैं।

 सोच बदल

बदलेगा जीवन

खिल उठेगा ।

-0- सुदर्शन रत्नाकर , ई-29,नेहरू ग्राउंड,फ़रीदाबाद 121001

मोबाइल- 9811251135

 -0-

भीकम सिंह

 पहाड़  - 1

 

केदार काँठा

धूसर -सा पहाड़

उसके पार

खड़े देवदारों की

लम्बी कतार

वन जैसा विस्तार

जिसे देखके

ठिठक जाती है

ठंडी  बयार

मौसम खड़ा होता

देखकर बहार ।

 पहाड़- 2

 

नंगे पहाड़

कोई पेड़ ना फूल

ना कोई घास

बर्फ में लेटे सब

पाँव पसारे

झोंपड़ी में लेटा ज्यों

थका श्रमिक

अपनी भूख मारे

मनरेगा के

तसला-फावड़ा ज्यों

अभी-अभी उतारे।

 पहाड़  - 3

 

हिम शिखर

चुनौती का सृजन

किया करते

मेघ कंधों पे धरे

उतर आते

सारी वनस्पति को

हरा करते

हिम वर्षा करते

जीवों में जैसे

ऊर्जा भरा करते

हार , हरा करते 

 पहाड़  - 4

 

जब कभी भी

पर्वत का खिसका

भाग जरा -सा

देखकर मनुष्य

कुछ डरा-सा

ईश्वर का स्थान भी

और नाम भी

जप लेता जरा-सा

फिर वो सारे

षड़यंत्रों के जाल

ढाई घोड़े की चाल ।

 पहाड़  - 5

 

पेड़ पाँवों में

विकास की रस्सियाँ

बाँध के खड़े

पहाड़ की छुअन

घसीट रहे

पहाड़ चुप खड़े

भरे ही रहे

शिला कसती रही

हँसती रही

गुस्से उम्रभर के

दुःख सारे मन के ।

 पहाड़  - 6

 

जैसा भी होता

सह लेता पर्वत

मृदा- स्खलन

सोचे मन ही मन

ऐसा होगा क्या

यह कभी ना सोचा

शिला गिरेगी

इतनी धँसकर

रस्ता रहेगा

महीनों फँसकर

खड़ा होगा लश्कर ।

 पहाड़  - 7

 

शान्त मूड़ के

हम तो पहाड़ हैं

हिम चूड़ के

जहाँ हिम गिरती

धूप तो कभी

तनिक-सी मिलती

सूर्य का यहाँ

पक्षपात चलता

कभी मिलता

कभी-कभी तो वह

सुबह ही ढलता ।

-0-

3-विभा रश्मि 

 

 

हमवतन

कर राष्ट्र जतन

उत्सर्ग प्राण 

वीरों की सुन दास्ताँ

लहू क्यों न खौलता ?

2

माथे कफ़न

बाँध किया प्रस्थान

जननी जय

गाते - गुनगुनाते

वीर रणबाँकुरे ।

 3

राखी रेशमी

सद्भावना से भरी

बाँधे सैनिक

बना वो अरिहंत

भिड़ंत - छिपी जीत ।

4

पत्थरबाज़

आतंकी चहुँ ओर

ताक में बैठे

आक्रमण विफ़ल

देख हौसला बल ।

 5

क्रूर आतंकी  

घाटी को हैं रँगते

देंगे कुर्बानी

सैनिकों ने भी ठानी

अरिबल हो ढेर ।

-0--