रविवार, 17 जुलाई 2016

717



माहिया
श्वेता राय  ( देवरिया –उत्तर प्रदेश)
1
मन को मेरे भाती
प्रीत भरी बतियाँ
जीवन को महकाती ।
2
होते हैं वो अपने
जगती आँखों से
देखें हम जो सपने ।
3
दिल से न भुला देना
चाहो जब मिलना
यादों में बुला लेना
4
मन एक समन्दर है
प्रीत सीप- मोती
ले यादें अंदर है ।
5
सँभले न सँभलते हो
रेत सरीखे तुम
हाथो से फिसलते हो
6
नयना बदरी छाई
बहती है देखो
यादों की पुरवाई
7
मन का मेरे दर्पन
तेरी ये अँखियाँ
देखूँ जिनमें जीवन

-0-


शनिवार, 16 जुलाई 2016

716



कृष्णा वर्मा
1
लिपटी रही
तन्हाई में जिंदगी
जीता रहा उदास,
उठा जनाजा
शामिल थे जिन्होंने
कभी दिया ना साथ।
2
गुणा भाग को
रखा है सदा मैंने
जिन्दगानी से दूर,
इसलिए ही
शायद मेरी राहें
जाती हैं अम्बर को।
3
यादों के पंछी
जब-जब आ बैठें
मन के अँगना में,
हिला जाते हैं
अनजाने में कहीं
वह दिल के तार।
4
पढ़ा त्रिकोण
फिर-फिर पढ़ा था
चौकोण न्यूनकोण
कैसे भुलाया
सबसे उपयोगी
पढ़ना दृष्टिकोण।
5
स्याही नायाब
तेरी-मेरी कलम
बिखेर दे जो उसे ,
बने अल्फ़ाज़
ख़ुद बिखर जाए
तो बन जाए दाग।
6
पढ़ लेने का
यदि होता सलीका
तो पढ़ लेते मौन,
जो अनदेखा
आँख के आँसुओं में
भीगी बातों का सार।
7
कर दी तूने
आज की ये दुनिया
क्यों इतनी ग़रीब,
देने को सिर्फ
छोड़ दिया क्यों धोखा
दफ़ना के तमीज़।

-0-

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

715

 मुरझाया फूल (हाइबन)

कमला घटाऔरा 

बाल्कनी में मैंने फूलों के कुछ पौधे लगा रखे थे । सुबह धुँधलके में ही उठकर उन्हें देखने और पानी देने उनके पास आ जाती । जल्दी उठने का एक बहाना सा मिल गया था । उस दिन जैसे ही मैं  बाल्कनी  में आई मैंने देखा बाहर सड़क पर आने जाने वाले लोग एक पल रुक कर कुछ देख रहे हैं ।जिज्ञासा बस मैंने भी उस ओर देखा । वहाँ ध्यान खींचने वाली ऐसी क्या चीज है कि आते जाते लोग रुक-रुक कर कुछ देख रहे हैं । मैंने देखा -सड़क से हट कर एक मानव तन झाड़ियों से बनी दीवार में सिर डाले पड़ा है । कुछ देर मैं वहाँ उस तन के हिलने- डुलने का इन्तज़ार करती रही । वह तो जैसे प्रगाढ़ निंद्रा का आनंद ले रहा हो ; इसीलिए शायद किसी ने उसे जगाना भी उचित नहीं समझा अथवा उसने ज्यादा पी रखी  हो ,सोचकर आगे बढ़ जाते । लेकिन मेरा मन सवालों की भूलभुलैयाँ में खो गया ! कहीं मृत तो नहीं ? नहीं मृत नहीं हो सकता । ऐसा होता तो किसी न किसी ने पुलिस को सूचित कर दिया होता  और अब तक इस एरियाको  लाल और सफेद रंग के फीते से घेर दिया होता । पुलिस की गाड़ियों की गूँज  सारे मुहल्ले को जगा देती । ऐसा कुछ नहीं  हुआ था ।  सब अपने घरों मे गहरी नींद का आनंद ले रहें लगते हैं ,ऊपर से रविवार भी तो है। 
मेरे मन में फिर से ख्यालों ने शोर मचाना शुरू कर  दिया। हो सकता है किसी से इसका झगड़ा हुआ हो वह इसे धक्का देकर झाड़ियों में फेंक गया हो । लूटने वाले तो सरे आम लूट की बारदात  करके गायब हो जाते हैं। लेकिन यह हुआ तो कब  हुआ ? किसी के चीखने  चिल्लाने की तो कोई आवाज़ भी सुनाई नहीं पड़ी।  एक बार  रात के  दस ग्यारह का वक्त होगा कि कोई चिल्ला- चिल्लाकर अपने किसी का नाम लेकर पुकार रहा था और उसके पीछे दौड़ रही कई कदमों की आवाज़े उस के साथ मार पीट करने की बेताबी की जैसे सूचना दे रही थी  ।मगर किसी ने बाहर झाँककर भी नही देखा ,क्योंकि कुछ भी होता रहे  लोग  किसी की या अपनी प्राईवेसी में किसी की ताक झांक पसंद नहीं करते यहाँ । सब अपना जीवन अपने ढंग में जीने में मस्त रहना चाहते हैं। 
मैं अपनी बालकनी में खड़ी देखती रही । सामने स्कूल है । उसी से लगी  एक तिकोनी सी खाली जगह है । साथ लगती एक सड़क जो आगे जाकर रुक जाती है रात दिन खुला रहने वाले शोपिंग स्टोर तक। लगता है शोपिंग स्टोर से इस बंदे ने कुछ ड्रिंक वगैरह लेकर अधिक पी ली होगी और लुढ़क गया । इस देश की आजादी और आर्थिक रूप से स्वावलंबन बच्चों को बिगाड़ता तो है लापरवाह भी बना देता है । अपनी ही उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती । औरों की क्या होगी । कोई इधर ध्यान भी नहीं देता । सब अपना जीवन अपने ढंग से जीते  हैं । दखल अन्दाजी यहाँ किसी को भी स्वीकार नहीं । कुदरत की कृपा समझो कि अब तक सूर्य देव अपनी किरणों का रथ लेकर प्रकट नहीं हुए थे । आसमान में  हलकी लालिमा नज़र आने लगी थी । कैसा इन्सान है  उठ ही नहीं रहा । कोई क्यों नहीं इसे हिला डुला रहा ?खुद ही मैं अपने से प्रश्न करती खुद ही उत्तर दे देती । यहाँ कानून के झंझटों में कौन फँसे?
मैं भी पानी डाल कर अपनी दिनचर्या में लग गई । कुछ देर बाद बाहर आई तो देखा वहाँ कोई नहीं था । क्या यह मेरी आँखों का भ्रम था ? नहीं, भ्रम नहीं  हो सकता । वहाँ झाड़ियाँ तो अब भी मुचड़ी हुई दिखाई दे रहीं हैं ।सच में वहाँ कोई सोया हुआ था । कैसे लोग हैं यहाँ किसी को न अपनी परवाह है न बच्चों की ।  जब सारे संसार के बच्चों के लिये नशा ही जीवन का आनंद हो गया हो तो कोई क्या कर सकता है ?

बालकनी में 

मुरझा गया फूल 
 पानी बगैर । 




शुक्रवार, 24 जून 2016

714

स्नेह-सिंचन

कहकशाँ हाइबन आदरणीया सुधा गुप्ता को उनके 82 वें जन्म दिन पर त्रिवेणी परिवार की तरफ़ से एक छोटा सा उपहार था ,जो समय के अभाव से कुछ दिनों की देरी से उनको भेंट किया गया। 
18मई, 1934 में जन्म, 83 वें वर्ष में पदार्पण कर चुकी डॉ सुधा गुप्ता जी ने 12 वर्ष की अवस्था से काव्य -रचना शुरू कर दी थी । अब तक आप ने बालगीत,कविता संग्रह, शोध , हाइकु ,ताँका, चोका  आदि  विभिन्न विधाओं में लिखा है और कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । हाइकु की विधा में जब गुणात्मक रचना -संसार की बात आएगी तो शीर्ष पर आपका ही नाम आएगा ।इस विधा में समर्पण का जुनून ही कहिए कि  ‘अकेला था समय’ ग्रन्थ आपके हस्तलेख में होने के साथ-साथ आपके द्वारा बनाए गए चित्रों से सुसज्जित है । आपको  ‘प्राइड ऑफ़ मेरठ’ का सम्मान भी मिल चुका है । 

कभी वह किणमिण उजाले  में बैठकर धूप से गपशप करती है और कभी उसके हिस्से में आई चुलबुली रात ने कोरी मिट्टी  के दिए जलाकर ओक भर किरणें  से खुशबू का सफ़र तय किया है। अपने कलात्मक करिश्मों से वह मुहांदरा चमकाती गई जब कभी अकेला था समय। उसकी नई मंजिलों के दस्तावेज़ महज लफ्ज़ नहीं बल्कि उसके सफ़र छाले हैं। 
अपनी शारीरिक अस्वस्थता एवं अ्समर्थता के बावजूद अपनी प्रतिक्रिया इस पत्र द्वारा भेजी है जिसे पाकर हम धन्य हो गए। 

















त्रिवेणी परिवार आपके सुखद ,स्वस्थ जीवन की कामना करता है  ! आपका आशीर्वाद सदा सबको मिलता रहेगा ।