गुरुवार, 9 जून 2022

1043

 

1-गुलमोहर

भीकम सिंह

1

प्रेम के नाम

धूप के अफसाने

कितने चले

घण्टों बाँहों में भरे

गुलमोहर हरे।

2

न्योते आ हो

गुलमोहर को ज्यों

तरुवर से

भरे खड़ा धूप में

गुलदस्ते कब से।

3

प्रेम की भाषा

ॠतुएँ समझती

वर्षा ज्यों पले

निरंतर गिरके

गुलमोहर तले।

4

झिलंगी खाट

गुलमोहर पड़ा

झुर्रियों- भरा

तितलियों में रहा

हमेशा हरा-भरा।

5

मुँह उजला

गुलमोहर हरा

पानी ना माँगे

दोपहरी चलता

लेकर गुलदस्ता।

-0-

2-कपिल कुमार

1

प्रेम में दर्प

दूर खड़े रहे ज्यों

ऊँचे पर्वत

नदी-सा मिले होते

फूलों- से खिलें होते।

2

प्रेमवन में

सींचता कौन काँटे

उदास मन

पूछता चिल्लाकर

फूल क्यों नहीं उगे?

3

प्रेम-पथिक

काँटों में राह बना

बढ़ते जाते

घृणा पराजित हो

वो ज्यों हँसते जाते।

4

मन में उठे

स्मृतियों की लहरें

ज्यों ज्वार- भाटा

मुझे खींचे तुम्हारा

प्रेमाकर्षण बल।

5

कभी स्वीकृति

कभी अधर मौन

प्रेम-रहस्य

सभी के लिए बना

बरमुंडा-त्रिकोण।

6

चलते रहे

बिना किसी मेल के

हमेशा साथ

दौड़ती रहती, ज्यों

समांतर रेखाएँ।

7

सँजोये हुए

अपरिमित यादें

आखिरी चिट्ठी

अनंत प्रेम रखे

मन-संग्रहालय।

8

खड़ी हुई हैं

मन में इमारतें

घृणा की लाखों

प्रेम से छूक

इन्हे नष्ट कर दो।

9

किसने बाँधा?

प्रेम को सिद्धांत में

रोज बनते

अलिखित नियम

ज्यों नागरिकशास्त्र।

10

प्रेम-गणित

देखकर तुमको

मस्तिष्क शून्य

हृदय- गति हुई

अनंत, परिमित।

-0-

सोमवार, 6 जून 2022

1042-सर्कस का शेर

                      भीकम सिंह 

   उत्तर प्रदेश के जनपद गौतम बुद्ध नगर की दादरी के स्थानीय विधायक ने भारत सर्कस का उद्घाटन अपने कर कमलों से किया। परसों यह खबर स्थानीय समाचार पत्रों की सुर्खियों में रही और आज समाचार सुनकर स्थानीय लोगों के चेहरों का रंग उड़ गया,  पिंजरे से शेर गायब होने का सवाल खड़ा हो गया । वन- विभाग के कुछ 


कर्मचारी छुपते-छुपाते कोहनी के बल रेंगते रेलवे लाइन की ओर बढ़े,  कभी पटवारी के बाग की ओर पुराने ऊँचे-ऊँचे झुरमुटों की ओट लेकर , कभी कोट के पुल पर मोर्चा लगाए छिपे बैठे रहते, लेकिन शेर पकड़ में नहीं आ रहा था। गाँवों में डर का अंधकार गहराता जा रहा था,  शेर पकड़ने की गतिविधियाँ भी तेज होने लगी थी ।

     वन -विभाग की चौतरफा मोर्चाबंदी देखकर शेर लुहारली के जंगल में देखा गया, ऐसी खबर स्थानीय समाचार पत्रों में छपी।  गाँव के घरों के सब खिड़की दरवाजे बंद,  आधी रात को राजकुमार भाटी ने तंद्रा में सोचा कि उसके कमरे का दरवाजा खुला है और उन्हें बैठा हुआ शेर नजर आया। शेर को देखकर राजकुमार भाटी का पूरा शरीर  पसीने-पसीने हो गया।  शेर क्रोध भरी मुद्रा में कमरे के दरवाजे के बीचो-बीच लंबे कानों को हिला रहा था , दूर कहीं खेत में चल रहे पम्पिंग सैट की धुक- धुक शेर की उफनती साँसों से सह-सम्बन्ध स्थापित कर रही थी । मन ही  मन राजकुमार भाटी ने सारी ऊर्जा समेटकर पिता जी को आवाज़ लगाईऔर आँखें अर्जुन की आँख की तरह सिर्फ और सिर्फ शेर के हिलते कानों पर स्थिर की । अचानक राजकुमार भाटी के मन में एक दूर की कल्पना अँखुवा गई कि यदि धड़ मारे,  मरे रहने का नाटक करें, तो शेर हमला नहीं करता?  सशंकित दिमाग शेर के कानों को गौर से विश्लेषित करने लगा, जो लगातार हिल रहे थे, शेर चौकन्ना हो  गया है ; लेकिन अभी तक दरवाजे के बीचो-बीच बैठा है । फिर राजकुमार भाटी को पिता जी की आवाज़ सुनाई दी-''घबराना मत  ! राइफल लेकर प्रधान जी छत पर आ गए हैं, चुपचाप खाट पर ही पड़े रहना । इसी धमा- चौकडी और हो -हल्ले के बीच राजकुमार भाटी की माँ की आँख खुल गई, जो बिना किसी का नोटिस लिये छत पर  आ गई थी।   झटके से मक्का के बोरे को कोनों (कान)से पकड़कर उठा लिया, जो राजकुमार भाटी को शेर की तरह दीख रहा था । दरअसल बूँदा- बाँदी के डर से राजकुमार भाटी की माँ सूखी मक्का के बोरे को रात में भरकर रख गई थी। कमरे के अंदर इसलिए नहीं रखा था कि आहट से उसके बेटे की नींद टूट जाएगी; लेकिन इस कवायद में पूरा मौहल्ला जाग गया ।

                    करवा देता 

                  अजीब करतूत

                   भय का भूत।

-0-

रविवार, 5 जून 2022

1041

 वह अंतिम रात 

सुदर्शन रत्नाकर

        हम दोनों की एक साथ वह अंतिम रात थी। तन जर्जर और मन शिथिल हो गया था, पर जिजीविषा शेष थी। डॉक्टर के अनुसार जीवन की साँसें केवल दो -तीन दिन की थी, पर अंत कभी भी हो सकता था।अस्थियों के साथ बीमारी ने आँखों, जिह्वा, दिमाग़ ,फेफड़ों को भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। दिल धड़कता था और साँसें कठिनाई से आ रही थीं। पूरा शरीर उपकरणों के घेरे में था। सुइयाँ लगते -लगते शरीर छलनी हो गया था। खाने की इच्छा होती पर खा नहीं पाते। पीड़ा इतनी असहनीय कि आँखें छलक जातीं, पर मुँह से उफ़ तक नहीं। दो दिन आई.सी.यू में यही स्थिति रही। तीसरे दिन मन में एक इच्छा जागी। आई.सी.यू. से निकलकर कमरे में शिफ़्ट होने की, जिसे डाक्टर ने तुरंत मान लिया। वह अंतिम रात थी।साँस लेने में कठिनाई होने लगी। सिस्टर ने निब्लाइजर लगा दिया। साँस लेने में थोड़ी सुविधा हुई। बार बार यही स्थिति होती रही। लेटकर साँस लेने में कठिनाई होती। बैठने की कोशिश करते तो बैठा नहीं जाता। हाथ का सहारा देकर उठाती। क्षण भर बैठ पाते और फिर मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर निढाल होकर लेट जाते।असहनीय पीड़ा और साँस लेने में तकलीफ़। पलंग के पाए पर सिर टिकाए कभी उनकी ओर देखती, उनकी पीड़ा को महसूसती। पर कर कुछ नहीं पाती। सारा शरीर शिथिल हो रहा था। हाथ की पकड़ ढ़ीली होती जा रही थी पर खुली आँखों में अब भी जीवन की आशा शेष थी। साँसों की डोर टूट रही थी सानिध्य धीरे-धीरे छूटता जा रहा था। हाथ अभी भी मेरे हाथ में था।और फिर सब कुछ ख़त्म। उस अंतिम रात के इतने क्रूर अंत को क्या कभी मैं भूल पाऊँगी। 

लड़खड़ाती आवाज़ में वो शब्द, “मैं तुम्हारे दुख को समझ रहा हूँ।”  आज भी कानों में गूँजते रहते हैं। पर बीते क्षणों को पकड़ नहीं पाती हूँ।

1

भूलते नहीं

बिताए तेरे संग

कल के पल।

2

तुम्हारी पीड़ा

चुभती है आज भी

उस रात की।

-0-सुदर्शन रत्नाकर , ई-29, नेहरू ग्राउंड ,फ़रीदाबाद 121001

-0-

कपिल कुमार

1

लिख के भेजे

तुमने प्रेम-पत्र

मैंने सहेजे

ज्यों इतिहास छात्र

सभ्यता-अवशेष। 

2

छज्जे पे बैठ

चाँद देखते हुए

कभी तो लिखो

प्रेम में डूबी कोई

प्रेम- कलन विधि.

3

प्रेम-प्रमेय

सदा सिद्ध करती

प्रेम से प्रेम

घृणा-प्रेम बताती

है व्युत्क्रमानुपाती।

4

हम दोनों हैं

समझो गणित का

प्रेम-निर्मेय

संभव न ज्यों बिना

पटरी-परकार। 

5

फिर से करें

बालकनी पे चढ़

पत्र-प्रतीक्षा

तकनीक ज्यों आई

प्रेम-मूल्य घटाया। 

6

खो गए कहीं

हीर-राँझा के किस्से

किसको भेजें

लिख के प्रेम-पत्र

कबूतर ढूँढते। 

7

प्रेम में डूबे

बालकनी पे देखें

ज्यों तोता-मैंना

मुझको याद आया

अपरिमित-प्रेम। 

8

ऐसे टटोले

अलमारी में रखे

तुम्हारे पत्र

ज्यों पुरातत्वविद्

पुराने अभिलेख।

9

प्रेम में डूबी

आँखें ढूँढती रहीं

अथाह-प्रेम

ज्यों पुरातत्त्ववेत्ता

अतीत का रहस्य। 

10

प्रेम-दर्शन

द्वैत से परिबद्ध

मैं और तुम

प्रेम का अध्ययन

मन बना चंदन। 

-0-

*(किसी भी समस्या का चरणबद्ध तरीके से समाधान निकालने की प्रकिया को अल्गोरिथम (Algorithm) / कलन विधि

कहते हैं।)