गुरुवार, 8 सितंबर 2022

1073

 1-भीकम सिंह 

 

सागर- 11

 

पाँव पसारे 

जब- जब सिन्धु ने

काँधों पे झूला 

त्यों तटों के सलीब 

मौन पीड़ाएँ 

किनारों में रेंगती

क्लिफ का तन   

हुआ है भयभीत 

सिन्धु के प्रति 

चिर - कृतज्ञ खड़ा 

ज्यों अहिंसा को लड़ा ।

--

सागरीय तट और किनारे में अन्तर होता है, किनारा तट से लगा वह भाग जहाँ पानी आता- जाता रहता है । तट वह जहाँ पानी ना पहुँचे ।

क्लिफ सागरीय जलकृत स्थलरुप है, जो सागर की ओर खड़ा दिखता है ।

 

सागर- 12

 

गीले तट पे

सूखा लंगर डाला 

मुसकाया है 

सारा तटीय क्षेत्र 

क्षुब्ध हो गया 

त्यों, लहरों का वेग 

थपेड़े मारे 

गिरती-पड़ती- सी 

राह भटके 

सैलानी-सी पहुँचे

शरमीले तट पे 

 

 

सागर- 13

 

सिन्धु की साँस 

ऊपर नीचे गिरी 

लहरें बनी 

हरेक आकर की

स्पष्ट रेखीय 

और वृत्ताकार भी

सीमा के रुद्ध 

मुड़ीतटों की ओर

देने उनको 

प्रेम की अभिव्यक्ति 

नई सृजन शक्ति 

 

सागर- 14

 

तट के आगे 

घूम रहे उदास 

डूबे - डूबे से 

सैलानी कुछ खास

गर्म रेत पे

करे क्षणिक वास 

आँखों का नशा 

बनाये देवदास 

लेके पैरों में 

हैं वनवास 

मन में है संन्यास 

 

सागर- 15

 

तट ने सब

बदला हुआ देखा

द्वीपों को देखा 

बनते - बिगड़ते 

सिन्धु आस्था में 

डूबता हुआ देखा 

मछुआरों को

श्रम - गँवाते देखा 

टाटैनिक

क्या जाने कैसे डूबा 

तट ने वो भी देखा 

-0-

2-कपिल कुमार

1-चोका

1

मेघों के जाते

मौसमी नदियों की

नस-नस में

सूखेपन का दर्द

ज्यों उभरता

तसले-फावड़े ले

भूमाफिया का

एक जत्थे का जत्था

छाती चीरने

उत्सुकता के साथ

घर से निकलता।

2

चली छोड़के

पहाड़ों को अकेली

होने को सिद्ध

घाटी से पीछे लगे

प्राण लेने को

मानव-रूपी गिद्ध

ज्यों नीचे आई

नाले ऐसे झपटे

नभ में देख

छोटी-छोटी चिड़िया

गिद्ध-लार टपके।

3

सिन्धु ने काटे

पिछले तीस साल

डर-डरके

आधुनिकता-भाव

देता था घाव

तटों पर खड़ी हुई

ज्यों इमारतें

ताजी-ताजी हवा के

रोक के रास्ते

रही-सही कसर

मेघ पूरी करते।

--0-

ताँका

1

नदी ने देखें

बेमिसाल स्थापत्य!

तटों पर खड़े

छोटे से लेके बड़े

और पुराने।

2

नदी ने देखें

तपते हुए ऋषि

लिखते वेद

इसके अतिरिक्त

युद्धों में मात खाते।

3

नदी ने सुनी

गुनगुनाते हुए

वेदों की ऋचा

झेलम, यमुना पे

युद्धों के शंखनाद।

4

सिन्धु ने देखा

सिकंदर झुकते

वक़्त के आगे

अच्छे-अच्छे योद्धा भी

दुम दबाके भागे।

5

गंगा ने ढोई

पाप के साथ-साथ

मनुष्य-अस्थि

बोझ में दबके भी

दौड़ रही हँसती।

6

कैसे मिलती?

पितामह भीष्म को

पाप से मुक्ति

हे गंगा मैया, जाना

बताके कोई युक्ति।

7

बिना जल के

मरुस्थल में बने

भ्रम की नदी

ज्यों आती है, तुम्हारी

आहट कभी-कभी

8

होते ज्यों तुम

मेघ इतने भले

तुम्हारे हाथों

मौसमी नदी, सिन्धु

ना गए होते छले।

9

अरे ओ मेघो!

इन्द्र का नंबर दो

अगले साल

कहना है उनसे

समय पर भेजें।

10

धन्य! तुम्हारा

बेशक देर आ

मेघों के जत्थे

वर्ना कौन है ऐसा?

जो जाके लौटता है।

11

फर्क पड़ा है

क्या कुछ लिखने से?

रोटी का राग

या कलम उड़ाती

भूखों का उपहास।

-0- ** रोटी का राग, श्रीमन्ननारायण अग्रवाल की एक कृति है।

बुधवार, 7 सितंबर 2022

1072

 

1-डॉ भीकम सिंह

सागर- 5

 

नदी को देख 

सिन्धु उतर गया 

बरस पड़ीं

नदी की बूढ़ी आँखें

ज्यों प्रियवर 

खोया-सा मिल गया 

लाश - सी  नदी 

काँधों पे उठाकर 

लहरों में से

तर-ब-तर होके

सिन्धु गुज़र गया 

 

सागर  - 6

 

सुबह लगे 

इतना प्यारा सिन्धु 

पानी वही है 

लेकिन खारा सिन्धु 

मंथन हुआ 

तो,थक - हारा सिन्धु 

देवों के लिए 

है क्षीर , सारा सिन्धु 

जाल समेंटे 

तो , मछुआरा सिन्धु 

तटों का नारा सिन्धु 

 

सागर  - 7

 

रिश्तों- सी  लौटी 

तट से  ज्यों लहरें 

बाँधे न बँधा 

रेत का वो घरौंदा 

उम्मीदों ने जो 

आँखों में उतारा था 

वह प्यारा- सा 

जिस पर नाम भी 

लिखा तुम्हारा 

सागर में डूबा है 

प्रेम में थका-हारा 

 

सागर - 8

 

किसने सुना 

खुलती सीपियों से 

मोती का राग

तटों पर मिली वो

खाली थे हाथ 

एक टुकड़ा तट

उस पर भी 

फेंकी हजारों बार

दूर कहीं पे

मोती का कारोबार 

करे , सिन्धु पे वार 

 

सागर- 9

 

मोती की जिद

सीपियों के भीतर

जागे रात में 

करती ठक -ठक

सिन्धु सुनता 

और जगाता सारे

नए - पुराने 

टिमटिमाते तट

वाणिज्य-वृत्ति 

जहाजों से झाँकती 

उतरे फटा-फट 

 

सागर - 10

 

काटते हुए 

एक नदी  को देखा 

तट का गला 

भरती चोर ज़ेबें 

कछारों वाली 

फेर मुख पे जल

उसी नदी को 

सागर के तलुवे 

चाटते देखा 

हतप्रभ- सा खड़ा 

सिन्धु का कोई धड़ा ।

-0-

ताँका- रश्मि विभा त्रिपाठी 

1

तू लोहे जैसा

मुझको काट रहा

मैं तो हूँ मिट्टी

क्यों मुझमें गहरे

खुद को पाट रहा।

2

जब भी बाँचा 

कौन कितना साँचा 

इसी धुन में

रह गया है शेष

अब हड्डी का ढाँचा।

3

उसने पूछा!

मैं सन्न- सी थी खड़ी

जब बिगड़ी- 

पापा की तबीयत 

'कहाँ है वसीयत?'

4

कृष्ण को पूजें 

फिर भी नहीं सूझें 

गीता के श्लोक

मोह पे नहीं रोक

छल से जीतें लोक!

5

अभिमन्यु- सी

रणक्षेत्र में फँसी

छल से मारा 

भेदना था दुरूह 

रिश्तों का चक्रव्यूह।

6

रिश्तों का रूप

हुआ बङा विद्रूप 

अंगुलिमाल 

मेरा घर लूट के

बन गए हैं भूप।

7

किसने किया

प्रेम का जीर्णोद्धार 

सजा रहे हैं

अपना दरबार

करके वो संहार।

8

कृष्ण मैंने तो

कुछ भी नहीं सहा?

ये जग वही

चौथ का चन्द्र रहा

तुम्हें भी चोर कहा।

9

भरा विकार

द्वेष औ अहंकार

मन से प्रेम

उसे न था स्वीकार

कर दिया संहार!

10

आओ मोहन

वियोगिनी मैं राधा

एकाकिनी हूँ

जगभर की चिंता

मेरा शरीर आधा!

11

लोग सारे ही

पैसे पर अटके

प्रेम के रिश्ते! 

क्या करते?, हारके 

फाँसी पर लटके!!

-0-

चोका- रश्मि विभा त्रिपाठी 
1
कर पाती हूँ
तभी तो आसान मैं
भारी से भारी
रोज के व्यवधान
जितनी मर्जी
खूब हुंकार भरे
देती ही नहीं
कभी आँधी पे ध्यान मैं
ठहरा नहीं
कहीं भी देर तक
कुछ पल का
मौसम मेहमान
लहराती हूँ
वादी में हवाओं- सी
देखकरके
मुझे इस रंग में
कुछ भी कहो
मंजूर मामी पीना
मगर यूँ ही
जीवन को है जीना
पाँव धरा पे
मन आसमान में
बिखेरूँ मुस्कान मैं।
2
दु:ख का बोझ
काँधों तले उठाना
मीलों- मील के
सफर पर जाना
रुलाता खूब
रास्तों का रुख कड़ा
देखता रहा
हुजूम दूर खड़ा
इस सच से
रोज ही पाला पड़ा
मैंने ले लिया
फिर फैसला बड़ा
तुम भी यही
नियम अपनाना
भीगें आँखें, तो
भीना हास बहाना
आँसू पोंछने
किसको यहाँ आना
अपने लिए
ये जग अनजाना
दबकरके
घुट ही जाता दम
मैंने न कभी
दुख को दुख माना
मुझे न भाया
किसी भी सूरत में
हिलकियों का
कोई दृश्य दिखाना
तमाशा बन जाना
!!

-0-