डॉ अमिता कौंडल
रूठी किस्मत
तुझसे ऐ नादान
क्या सोचती
न जाने दे अबके
चले जो गए
तो पछताएगी तू
नैनों में आँसू
ले द्वार पर बैठी
हर शाम को
दीप जलाएगी तू
और सुबह
तक दीप संग तू
बुझ जाएगी
विरह की पीड़ा में
औ विरहन
दिन रैन अश्रु ही
बहाएगी तू
उठ रोक ले उन्हें
जाने न देना अब
तुझसे ऐ नादान
क्या सोचती
न जाने दे अबके
चले जो गए
तो पछताएगी तू
नैनों में आँसू
ले द्वार पर बैठी
हर शाम को
दीप जलाएगी तू
और सुबह
तक दीप संग तू
बुझ जाएगी
विरह की पीड़ा में
औ विरहन
दिन रैन अश्रु ही
बहाएगी तू
उठ रोक ले उन्हें
जाने न देना अब
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