मंजु गुप्ता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंजु गुप्ता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

733



1-शशि पाधा
1
कुछ भूला- भटका सा
इत-उत फिरता मन
अम्बर से लटका -सा ।
2
क्यों माया जाल बुना
बंद पिटारी से
क्यों जी जंजाल चुना ।
3
दो दिन का डेरा है
नगरी अनजानी
बस रैन बसेरा है
4
दुख कितना भोग लिया
जब से लगन लगी
सुख से संयोग किया।
5
दोराहे आन खड़े
रसता सूझे ना
शंका में पाँव जड़े ।
6
सब कुछ जब अर्पण हो
धुँधला मिट जाए
मन निर्मल दर्पण हो ।
-0-
2-मंजु गुप्ता

1
बनके उपकार नदी
है माँ की महिमा
गाती हर एक सदी .
-0-

शुक्रवार, 26 जून 2015

बाँस -सुकन्या



1-कमला घटाऔरा
1
बाँस -सुकन्या
पिया प्रेम पाने को
कराये तन छेद
भरी नाद से
अधर -स्पर्श मिला
झरी बन संगीत।
2
ठूँठ ने कहा -
जाओ न रूठ कर
प्रिय सखी पवन ,
आये बसंत
ला दूँगा पूरा थान
सुगंधित फूलों का ।
3


चाबी का गुच्छा
देकर रजनी को
संध्या रानी थी बोली-
लो मैं तो चली
सम्भालो घर चन्दा
तारों से भरा।
  -0-


2-मंजु गुप्ता
1
भुला न पाती
बचपन की यादें
वे खिलोने  , लोरियाँ
नेह  की बाहें
परियों की कहानी
माँ -नानी की  जुबानी।
2
लता- कुंज  में
कोमल लतिका -सी
कोंपल का आँचल
ओढ़े किशोरी
पतंग जैसी  उड़े
चढ़ ख़्वाबों की  डाली।
3
लज्जा रानी के
मुखमंडल पर
झूलती   शोख लटें ,
 कह न पाती
अभिसार की बातें
साजन के आने पे।
4
बैरन बिंदी
साजन को रिझाए
वैरी नींद न आए 
यादों की बाढ़
आँसुओं  को बहाए
पिया नजर आए।
-0-