शनिवार, 27 मई 2017

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 ‘झरे हरसिंगार’ : अभी भी बाकी ,हैं मन के जज्बात -डॉ.पूर्णिमा राय

डॉ.हरदीप कौर संधु(सिडनी)जी की लिखी पंक्तियाँ -"दुआएँ बाँटने वाले हाथ जब कलम उठाते हैं तो मोह की स्याही से पाठकों के हृदय पन्नों पर अनमोल भाव अंकित करते
चले जातें हैं।" जब मैंनें रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु ' जी द्वारा रचित पुस्तक "झरे हरसिंगार " पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर पढ़ी तो मन एक विशेष स्नेह के वशीभूत हो गया और इस ताँका -संग्रह की खूबसूरती को भीतर तक अनुभव करने हेतु लालायित हो उठा।हिन्दी हाइकु पर मेरी एक लेखिका मित्र मंजूषा मन जी ने एक बार लिंक भेजा कि मेरे हाइकु पर टिप्पणी  लिखी है ,पूर्णिमा जी पढ़िएगा। मैनें उस लिंक पर आ.रामेश्वर जी द्वारा दिये ईमेल पर संपर्क किया और तब से लेकर आज तक रचना कर्म रामेश्वर जी के सानिध्य में फलीभूत हो रहा है। आज आपकी पुस्तक को पढ़ना और उस पर अपनी भावनाएँ व्यक्त करना मेरे लिए महज सीखने का एक ओर ढंग  ही है।
साहित्यजगत में विशेष एवं विलक्षण पहचान बनाए आ.रामेश्वर हिमांशु जी जहाँ आदर्श शिक्षक हैं ,वहाँ सबको एक सूत्र में बाँधकर रखने वाली मजबूत कड़ी भी हैं। अन्तर्जाल के माध्यम से जो रिश्ता आपसे जुड़ा है ,वह अटूट है । इसका प्रमाण कि आज दो साल से अधिक समय हो गया ,पर कभी आपसे साक्षात्कार न हुआ । महज फोन पर बातचीत से साहित्य कार्य चल रहा है। आपके सहृदय व्यक्तित्व के संबंध में अधिक कहा तो अतिशयोक्तिपूर्ण लगेगा।
‘झरे हरसिंगार’  ताँका संग्रह अयन प्रकाशन,दिल्ली से सन् 2012 में प्रकाशित एवं आठ खण्डों --सूरज उगाएँगे,यही जीवन,जीवन की किताब,मिले धरा गगन,नूर की बूँद,झरे हरसिंगार,परम पावन,बरसे ज्योति में विभाजित एक खूबसूरत काव्यात्मक एवं सृजनात्मक संकलन है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.सुधा गुप्ता जी द्वारा लिखा आलेख "श्री हिमांशु का ताँका -रचना संसार" पढ़कर रामेश्वर जी की ताँका अभिव्यक्ति व्यष्टि से समष्टि ,वैयक्तिकता से सामूहिकता,आंतरिकता से बाह्य,सूक्ष्म से स्थूल की अनवरत यात्रा है।जैसे जैसे पन्ने खुलते जा रहे थे,पढ़ने की तीव्रता गहन होती जा रही थी..तभी नज़र ठहरी....वाह
क्या खूब ताँका है......
·      इस गाँव में /आना नहीं दुबारा/क्यों विष घोलें/मीठे ही बोल बोलें/खुशी के द्वार खोलें ।
एक दर्द है,आह है,भीतरी पुकार है ,पर निष्कर्ष क्या ..बस खुशी,प्रेम,स्नेह ,माधुर्य बाँटना। यही तो कवि का कवित्व है ,रचना का मर्म है,जो पाठक हृदय को  छू लेने के साथ-साथ समाज हित में सचेत कर दे। 
·      जितना झुके/न टूटे यह घर/उतना टूटे/बुरी तरह दोनों/हम और घर भी ।
कैसी विडंबना है?यह टूटन क्यों अपनी सी लगी?यह बिखराव ,अधूरापन क्यों सिसक रहा करवटें ले लेकर ..हाय कैसी है नियति ...न समझे यह निष्ठुर मन ....!!
डॉ.भावना कुँअर (ऑस्ट्रेलिया)ने भी कितना सुंदर और सजीव अंकन करते पृष्ठ17 पर लिखा है--" झरे हरसिंगार पढ़ते ही लगता है जैसे हम बीच आँगन में खड़े हों और पुष्पों की वर्षा हमारे ऊपर हो रही हो और उन पुष्पों की पंखुरियाँ कभी पलकों पर ,कभी अलकों पर तो कभी अधरों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हों।"
·      वे दर्द बाँटें/बोते रहे हैं काँटें/हम क्या करें?बिखेरेंगे मुस्कान/गाएँ फूलों के गान
एक सहृदय यथार्थवादी रचनाकार की सार्थक ध्वनि लक्षित होती है ,हम तो बस स्नेह देंगें.,प्यार बाँटेंगें,हम अपनी राह क्यों बदलें ,जब तुम न बदलोगे। किसी ने बहुत खूब लिखा है कि बुरा करने वाला बुराई नहीं छोड़ता तो हम अच्छाई करने से गुरेज़ क्यों करें।
आस एवं विश्वास पर दुनिया टिकती है पर कवि को यह रास नहीं आता..क्योंकि कवि /लेखक अपने वैयक्तिक अनुभवों के साथ -साथ अपने संपर्क में आये संबंधों से भी दो चार हाथ होता है तभी तो उसकी कलम कह उठती है.....
ओ मेरे मन/तू सभी से प्यार की/आशा न रख/पाहन पर दूब/कभी जमती नहीं।
कितनी स्पष्टता ,निर्मलता एवं रवानी है यहाँ!
मिलन/बिछोह,सुख/दुख धूप छाँव की मानिंद कभी खुशी तो कभी गमी के आँसू मानव मन को छलते रहे हैं ....
·      भिगो गई है/भावों की बदरिया/चुपके से आ/जनम-जनम की/जो सूखी चदरिया
सत्य है जब भावनाएँ हिलोर की मानिंद उठती हैं तो किसी का वश नहीं रहता,बेबाक मन तड़प उठता है ,होंठ पुकार उठते हैं पर आँखें सब राज बिन बोले खोल देती हैं ।
 तन के भूखे /मन को क्या जाने/दिखता उन्हें
कीचड़ ही कीचड़/न कि पावन मन
कैसी विसंगति है जिसे चाहो ,वह तो मात्र तन लिप्सा में डूबा है ,मन से उसका दूर-दूर तक सरोकार नहीं,बस कमल चाहिए सबको ,उसके आप-पास की  कीचड़ रूपी मुसीबतों से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता,सब स्वार्थ मोह में ग्रसित हैं।
·      यादों का नीड़/तुम जो सजाओगी/मुझे पाओगी /सहसा द्वार पर/गले लग जाओगी
प्रेम की अति गहन अनुभूति का अनुमान उपर्युक्त ताँका से लगाया जा सकता है।
 कभी कभी जीवन में ऐसे पल भी आते हैं जब मन हताश हो जाता है ,उसे कुछ सूझता नहीं ,बस चारों ओर गहन अँधेरा छाया लगता है..उन पलों को प्राकृतिक रंग में रंगकर रामेश्वर जी ने खूबसूरत ताँका लिखा है 
·      घिरी उदासी/नदिया जैसे प्यासी/सिन्धु पुकारे/समझ नहीं आये/मन यही विचारे।
एक वक्त ऐसा आता है जब सब कुछ पाकर भी खालीपन-सा लगता है ।उस स्थिति को चित्रित करके  कवि ने अपनी काव्य-कला का अद्भुत रूप पेश किया है
·      बीते जो दिन/प्यार की ऊष्मा तले/हमें रुलाते/बीते पल आज भी/हम भूल न पाते।
यही पल तो जीवन के इन भीड़भाड़ भरे माहौल में भी सुकून के साक्षी हैं।

आज की भागदौड़ भरी आधुनिक जिन्दगी पर कटाक्ष करता निम्न ताँका अपनी समसामयिकता के आलोक में निखरा सा लगता है
·      किसे था पता -/ये दिन भी आएँगे/अपने सभी/पाषाण हो जाएँगे/चोट पहुँचाएँगे।

आज के जीवन पर बिल्कुल सत्य एवं सटीक ताँका कथन है ।आज हालात इस कद्र बदल गए कि अपने अपनों को ही मार काट रहे हैं अब बेगानों से क्या उम्मीद करनी!

एक कवि,रचनाकार की खासियत है वह नकारात्मकता में भी सकारात्मकता को ढूँढ लाता है ,धूप में भी छाँव को महसूस करता है,घृणा में भी प्रेम खोजता है ---
·      पास न आए/कभी दुःख की घड़ी/प्यार मुस्काए/दर पे लहराए/खुशी की फुलझड़ी।
आशावादिता का संदेश देने में सिद्धहस्त रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी के निम्न ताँका से मैं अपनी बात को विराम देना चाहूँगी -
·      विदा कर दें/नफरतें दिल से/प्यार बसाएँ/इस दुनिया को ही/जन्नत-सी बनाएँ।
अन्त में अपने लिखे ताँका को 'झरे हरसिंगार' ताँका- संग्रह को  समर्पित करती हूँ
·      अभी भी बाकी/हैं मन के जज्बात/बढ़ती जाए/मेरी कलम प्यास/दिन चढ़ने वाला ।
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
शिक्षिका एवं लेखिका

21/5/17(1.20pm)


शुक्रवार, 26 मई 2017

763

1-भारतीय सेना के शूरवीर सैनिकों को समर्पित

1-शशि पाधा
1
कैसी आज़ादी है
सरहद से पूछो
कितनी बर्बादी है ।
2
यह नेता क्या जाने
वीर सिपाही का
साहस ना पहचाने ।
3
अर्जुन सा वार करें 
दुश्मन टोली का 
सैनिक संहार करें ।
4
दुशमन से जूझ जरा
दृढ़ता सैनिक की
पर्वत से पूछ जरा ।
5
आज़ादी पाई है
कितने वीरों ने
निज जान गंवाई है ।
6
जयघोष सुनाना है
सारा जग सुन ले
अब देश बचाना है ।
7
जब पहने रोता है
बेटा सैनिक का
वर्दी से छोटा है ।
8
सीमा पर ध्यान धरो
जन गण भारत के
सैनिक का मान करो ।
9
माँ धीर ज़रा धरना 
गर हम लौटें ना
नित याद हमें करना ।
10
इक रीत निभानी है
गाथा वीरों की
हर रोज़ सुनानी है ।
-0-
 (भारतीय सेना के शूरवीर सैनिकों को समर्पित)
-0-
2-मंजूषा मन
1
संवाद अधूरे हैं,
मन में झांको तो
सब किस्से पूरे हैं।
2
ये मौन डराता है,
चुप तुमको देखे
तो मन घबराता है।
3
कुछ ऐसे रोएँगे,
काँधे सर रखकर
हम खूब भिगोएँगे।
4
हर सफर अधूरा है,
तुम तक पहुँचाए
वह रस्ता पूरा है।
5
छोड़ो अब जाने दो,
मन बौराया है
मन को समझाने दो।
6
तुमसे न कह पाएँ
पर देखो हमको
हम मौन न रह पाएँ ।
7
किससे हम कह पाते,
अपना कौन यहाँ
जिसको गम दिखलाते।
8
मन के बिखरे मनके
टूटे डोरी से
सब रिश्ते जीवन के।
9
शामों के ढलने पर
याद बहुत आए
दीपक के जलने पर।
10
सब राज कहे तुमसे
अब डर लगता है
रूठो न कहीं हमसे।

-0-

मंगलवार, 23 मई 2017

762

डॉ पूर्णिमा राय
1
हम तेरे कायल हैं
साजन आ जाना
घिर आए बादल हैं
2
बादल घिर आए हैं
यादों की गठरी
भर-भर कर लाए हैं
3
यह दिल है दीवाना
राह तकें नैना
मौसम भी मस्ताना
4
तुम दूर करो गम को
हँसना जीवन है
ख़त लिख देना हमको
5
खिड़की से झाँक रहा
निर्मोही चंदा
बरबस ही ताक रहा।।
6
बूँदें बन बारिश की
 रोता है अम्बर

बू आए साजिश की।।

गुरुवार, 18 मई 2017

761

1-जुगलबन्दी माहिया
सुनीता काम्बोज
1
 लाए अंगूर पिया
मैं हूँ शहजादी
तुम हो लँगूर पिया।
 0
सहता बारहमासी
ताजी दाल मिली
रोटी मिलती बासी।
2
ये अच्छी बात गढ़ी
अपनी जोड़ी है
चावल के साथ कढ़ी।
 0
शीशा  देखा करना
तुम हो थार पिया
हम हैं मीठा झरना।
3
आ प्यार सिखाऊँगी
थानेदार बुला
फिर जेल कराऊँगी।
 0
मुझसा ना पाओगी
ऐसा करके तुम
सजनी पछताओगी।
4
चिपकी है आज गली
जानम तुम लगती
गुड़ की बस एक डली ।
 0
 मैं गुड़ तुम शक्कर हो
हारोगे हमसे
मत ऐसे  टक्कर लो ।
 5
जिसका साजन लम्बा
देखूँ तो लगता
वो बिजली का खम्बा ।
 0
जीना दुश्वार लगे
मेरी सजनी तू
बिजली के तार लगे ।
6
जिसका सजना मोटा
लुढ़का ही जाए
ज्यों बिन पेंदी लोटा ।
0 
लोटे में पानी है
टेढ़े दाँत वही
इस दिल की रानी है।
6
सजना है दिलवाला
लाल पजामा है
पहना कुर्ता काला
 0
गालों पर है लाली
नखरे खूब करे
बस मेरी घरवाली ।
7
तुझ पर मैं मरता हूँ
पर तेरी माँ के
डंडे से डरता हूँ
 0
सहलो ये मार पिया
संग चली तेरे
छोड़ा घर- बार पिया
8
छोड़ो तकरार,चलो
अपनी गाड़ी में
लेकर बाजार चलो
 0
क्या आफत आई है
सेल लगी बीवी
थैले भर लाई है
9
थोड़ा तो डरते हो
बीवी के आगे
तुम पानी भरते हो
 0
हम तो बेचारे हैं
पत्नी के आगे
ईश्वर भी हारे हैं ।
10
ये जेब हुई खाली
खूब खरीदारी
करती है घरवाली
 0
 इसमे भी क्या शक है
ये संसार सकल
बीवी का सेवक है ।
 11
 यूँ बहना अच्छा है
बीवी की हाँ में
हाँ कहना अच्छा है
 0
इतनी औकात नही
उसको समझाना
अब बस की बात नहीं ।
12
 घर पर बतलाऊँगी
तेरे रोगों का
उपचार कराऊंगी।
 0
की सेवा सरकारी
बाप दरोगा है  
भाई है पटवारी।
13
मत कर जोरा-जोरी
तुम हो सूत पिया
हम  रेशम की डोरी।
 0
घर की गाड़ी चलती
करने से पहले
तू माना कर गलती ।
14
तुझ पर मैं मरता हूँ
पर तेरी माँ के
डंडे से डरता हूँ
0
अब काम नहीं दूजा
मैं दिन रात करूँ
पत्नी  की ही  पूजा 
-0-

2-ताँका - सतीश राठी 

1
गहरा ताल
बचा लिया है जल
बची है नदी
सूरज के ताप से
बची रेत होने से
2
बन बैठी है
सीने पर वजन
याद- पहाड़
कैसे भुला दूँ अब
बजाया जो सितार।
3
बरसात में
भीगती रही वह
समूची रात
आँसू बन बहे थे
बवण्डर बादल।
4
हँसते लब
दिल में घाव सा
खामोश मन
गम की नदिया में
कागज की नाव सा
5
नदी ने पूछा
प्रेम करते हो क्या
दिल ने कहा
प्रेम की कलकल
सीखी है तुमसे ही
-0-
सतीश राठी,आर-451, महालक्ष्मी नगर,इंदौर 452010
9425067204
rathisatish1955@gmail.com

-0-