1-कमला निखुर्पा
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थी मैं अभिधा
गिनाए जो तुमने
लक्षण मेरे
बन गई व्यंजना
खुद को पहचाना ।
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2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं निरुत्तर
तेरा नेह-विस्तार
धरा से नभ
नहीं पा सका पार
भिगो रही बौछार ।
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रमेश कुमार सोनी
1
नदी अकेली
प्यास बुझाने दौड़ी
बस्ती बसाती
प्रदूषित हो जाती
बचाओ नहीं बोली।
धूप की कूची
भित्ति चित्र पेड़ों के
रोज बनाती
सदा से ही अधूरी
छोटी –बड़ी हो जाती।
-0-
