रविवार, 17 जून 2018

812-प्राणों की डोर


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1- प्राणों की डोर

प्राणों की डोर
प्रेम -पगे दो छोर
हाथ तुम्हारे।
तुम जो चल दिए
व्याकुल उर,
रेत पर मीन ज्यों
जिए न मरे
तड़पे प्रतिपल
पूछे सवाल-
'पहले क्यों न मिले
छुपे थे कहाँ? '
भूल नहीं पाएँगे
सातों जनम
ये स्वर्गिक मिलन,
शब्द थे मूक
बिछुड़ने की हूक
चीर ही गई
रोता है अंतर्मन-
'अब न जाओ
मेरे जीवन धन'
वक़्त न रुका
छूट गया हाथ से
मन बाँधके
पकड़ा नहीं गया
वो आँचल का छोर।
-0-
2-चूमा था भाल

चूमा था भाल
खिले नैनों के ताल
चूमे नयन
विलीन हुई पीर
चूमे कपोल
था बिखरा अबीर
भीगे अधर
पीकर मधुमास
चूमे अधर
खिला था रोम रोम
खुशबू उड़ी
भरा मन आकाश
कसे तुमने
थे जब बाहुपाश
तन वीणा के
बज उठे थे तार
कण्ठ से गूँजा
प्यार का सामगान
कानों में घोला
मादक मधुरस
तुम जो मिले
ताप भरे दिन में
धरा से नभ
खिले सौ-सौ वसन्त।
कामना यही-
हो पूर्ण ये मिलन
पुलके तन मन।
-0-
(सभी चित्र गूगल से साभार )

गुरुवार, 7 जून 2018

811-कंठ है प्यासा

डॉ.कविता भट्ट                                                                                                                                               
कंठ है प्यासा
पहाड़ी पगडंडी
बोझ है भारी
है विकट चढ़ाई
दोपहर में
दूर-दूर तक भी
पेड़ न कोई
दावानल से सूखे
थे हरे-भरे
पोखर-जलधारा
सिसके-रोए
ये खग-मृग-श्रेणी
स्वयं किए थे
चिंगारी के हवाले
वृक्ष -लताएँ
अब गठरी लिये
स्वयं ही खोजें
पेड़ की छाँव घनी
और पीने को पानी
-0-

बुधवार, 30 मई 2018

810



1-सेदोका
1-डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
जिंदगी मेरी
ये रंग कैसे-कैसे
इसमें दिए डाल
ओ चित्रकार  !
अब इस चित्र से
बाहर तो निकाल ।

-0-
2-शशि पाधा
1
लो छू ही गई
बंद खिड़कियों से
सलाखों में लिपटी
गुलाबी गंध
रोम- रोम महका
सुवासित- सा तन
2
डगमगाई
सिहराई सिसकी
अँखियों से पिघली
मन की पीर
बह गई नदियाँ
टूटे बाँध -किनारे
3
परतें खुलीं
अतीत की चादर
सलवटों से झाँके
कोई निशानी
कब से बिसराई
वो ही प्रीत पुरानी
--०-
 2-ताँका
1-पुष्पा मेहरा
1
जल से बर्फ़
बर्फ़ से बना जल
सत्य अटल
जन्मे नारी औ नर
बढ़े सृष्टि –चरण ।
2
बाँधना नहीं
जड़ बन्ध से कभी
पाँव ये मेरे
काटना नहीं डैने
चूमूँगी आकाश मैं।
3
कली–कली में
भरो,सृजन-रस
हरो उदासी
छेड़ो मृदु  भैरवी
फिर जागें तन्द्रा से !!
4
घट पराग
छिपाए थीं कलियाँ
मधु से भरा
नटखट था भौंरा
उड़ा ले गया सारा !!
5
पाला था भ्रम
यहीं-कहीं फूलों का
चाही ख़ुशबू
घूमी जो घाट-घाट
मिले काँटों के बाँध !!
6
खुली जो आँखें
पढ़े चार अध्याय
नियतिबद्ध
अंतिम चौखट पे
धुँधले मिले सारे !!
7
रात ढलेगी
सूर्य फिर उगेगा
छाया हुआ जो
आतंक अँधेरे का
एक दिन छँटेगा ।
8
भरे उड़ानें
मन, यह बावरा
कभी न थके
ढंग पाले निराले
तौलता रहे डैने ।
9
छेनी से नहीं
हथौड़े से भी नहीं
खाता है चोटें
जब अविश्वास की
मन टूटता तभी ।
10
बादल बनूँ
आकाश से उतरूँ
धरा से मिलूँ
वेणी माँ की सजा दूँ
सीप का मोती बनूँ ।
11
मुझे ना मार
सुहाग मैं धरा का
घर पाखी का
कहता थका पेड़
पर,कत्ल हो गया 
12
नई है पीढ़ी
छिपाए है दावाग्नि
छेड़ो न इसे
जलेगी-जलाएगी
रोको,आँधी उत्पाती ।
13
सभ्य गढ़ में
बसी ,सृष्टि की देवी
चाहे सुरक्षा
अग्नि की ज्वालाओं से
खूंखार पशुओं  से ।
14
चिरैया प्यारी
ढूँढे ना मिली कहीं
सभ्य नगर
यात्राएँ विकास की
विनाश –रेल चढीं
15
मथा जो जग
मिले सुधा औ विष
किया चिन्तन
फेंकी विष –गागर
पी के छकी अमृत ।
16
पल दो पल
आओ ! हँस बोल लें
न जाने कब
समय का मछेरा
फाँसे हमे जाल में !!
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शुक्रवार, 25 मई 2018

809


1-ताँका
डॉ.जेन्नी शबनम
1.
अँजुरी भर
सुख की छाँव मिली
वह भी छूटी
बच गया है अब
तपता ये जीवन।
2.
किसे पुकारूँ?
सुनसान जीवन
फैला सन्नाटा,
आवाज घुट गई
मन की मौत हुई।
3.
घरौंदा बसा
एक-एक तिनका
मुश्किल जुड़ा,
हर रिश्ता विफल
ये मन असफल।
4.
क्यों नहीं बनी
किस्मत की लकीरें
मन है रोता,
पग-पग पे काँटे
आजीवन चुभते।
5.
सावन आया
पतझर-सा मन
नहीं हर्षाया,
काश! जीवन होता
गुलमोहर -गाछ
6.
नहीं विवाद
मालूम है, जीवन
क्षणभंगूर
कैसे न दिखे स्वप्न
मन नहीं विपन्न।
7.
हवा के संग
उड़ता ही रहता
मन- तितली
मुर्झाए सभी फूल
कहीं मिला न ठौर।
8.
तड़प रहा
प्रेम की चाहत में
मीन -सा  मन,
प्रेम लुप्त हुआ, ज्यों
अमावस का चाँद।
9.
जो न मिलता
सिरफिरा ये मन
वही चाहता
हाथ पैर मारता
अंतत: हार जाता।
10.
स्वप्न -संसार
मन पहरेदार
टोकता रहा,
जीवन से खेलता
दिमाग अलबेला। 
-०-
2-सेदोका

डॉ.जेन्नी शबनम
1.
अपनी व्यथा
गुमसुम प्रकृति
किससे वो कहती
बेपरवाह
कौन समझे दर्द
सब स्वयं में व्यस्त।
2.
वन, पर्वत
सूरज, नदी ,पवन
सब हुए बेहाल
लड़खड़ाती
साँसें सबकी डरी
प्रकृति है लाचार।
3.
कौन है दोषी?
काट दिए हैं  वन
उगा कंक्रीट-वन
मानव दोषी
मगर है कहता-
प्रकृति अपराधी।
4.
दोषारोपण
जग की यही रीत
कोई न जाने प्रीत
प्रकृति तन्हा
किस-किस से लड़े
कैसे जखम सिले। 
5.
नदियाँ प्यासी
दुनिया ने छीन है
उसका मीठा पानी,
करो विचार
प्रकृति है लाचार
कैसे बुझाए प्यास।
6.
बाँझ निगोड़ी
कुम्हलाई धरती
नि:संतान मरती
सूखा व बाढ़
प्रकृति का प्रकोप
धरा बेचारी।
7.
सब रोएँगे
साँसें जब घुटेंगी
प्रकृति भी रोएगी,
वक्त है अभी
प्रकृति को बचा लो
दुनिया को बसा लो।
8.
विषैले  नाग
ये कल कारखाने
जहर उगलते
साँसें  उखड़ी
जहर पी-पी कर
प्रकृति है मरती। 

9.
लहूलुहान
खेत व खलिहान
माँगता बलिदान
रक्त पिपासु
खुद मानव बना
धरा का खून पिया 
10.
प्यासी नदियाँ
प्यासी तड़पे धरा
प्रकृति भी है प्यासी,
छाई उदासी,
अभिमानी मानव
विध्वंस को आतूर। 
-०-