रामेश्वर काम्बोज
‘हिमांशु’
1- प्राणों की डोर
प्राणों की डोर
प्रेम -पगे दो छोर
हाथ तुम्हारे।
तुम जो चल दिए
व्याकुल उर,
रेत पर मीन ज्यों
जिए न मरे
तड़पे प्रतिपल
पूछे सवाल-
'पहले क्यों न मिले
छुपे थे कहाँ? '
भूल नहीं पाएँगे
सातों जनम
ये स्वर्गिक मिलन,
शब्द थे मूक
चीर ही गई
रोता है अंतर्मन-
'अब न जाओ
मेरे जीवन धन'
वक़्त न रुका
छूट गया हाथ से
मन बाँधके
पकड़ा नहीं गया
वो आँचल का छोर।
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2-चूमा
था भाल
चूमा था भाल
खिले नैनों के ताल
चूमे नयन
विलीन हुई पीर
चूमे कपोल
था बिखरा अबीर
भीगे अधर
पीकर मधुमास
चूमे अधर
खिला था रोम रोम
खुशबू उड़ी
भरा मन आकाश
कसे तुमने
थे जब बाहुपाश
तन वीणा के
बज उठे थे तार
कण्ठ से गूँजा
प्यार का सामगान
कानों में घोला
मादक मधुरस
तुम जो मिले
ताप भरे दिन में
धरा से नभ
खिले सौ-सौ वसन्त।
कामना यही-
हो पूर्ण ये मिलन
पुलके तन मन।
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(सभी चित्र गूगल से साभार )
(सभी चित्र गूगल से साभार )


