सोमवार, 6 जुलाई 2020

923-भँवर


      
सुदर्शन रत्नाकर 

  
    उगते सूर्य का मनोरम दृश्य मुझे सागर के किनारे खींच कर ले गया।आसमानी झील में खिलता लाल कमल ,जैसे नवेली दुल्हन शर्माते हुए धीरे-धीरे चली रही हो।थोड़ी ही देर में सारी सृष्टि  सुनहरी किरणों से सुसज्जित हो इठलाने लगी । पेड-पौधे,फूल-पत्तियाँ किरणों को चूमने लगे। पक्षी चहचहाने लगे ।नहाने के लिए किरणें लहरों पर उतर आईं, उस समय ऐसा लग रहा था मानों वे खुशी से नृत्य कर रही हों। मंद -मंद बहती पवन, लहरों का ऊँचा उठना और फिर नीचे गिरना मन को आकर्षित कर रहा था ।ऐसा दृश्य देख कर मेरा मन मचल उठा।लहरों में झूलती उन किरणों को छूने का लालच मन में गया।जो अब चाँदी की तरह लहरों पर चमक रही थीं। मैं पानी में उतर गई। लहरों के संग खेलती आगे बढ़ती गई, उनका स्पर्श मुझे रोमांचित करने लगा लेकिन मैं यह भूल गई कि जितना आगे बढ़ रही हूँ उतनी ही सागर की गहराई और लहरों की ऊँचाई बढ़ रही है पर मैं रुकी नहीं , आगे बढ़ती ही गई, अब पानी मेरी कमर तक गया था और फिर जैसे ही एक उफनती हुई लहर मेरे पास आई, रेत मेरे पाँवों के नीचे से खिसक गई।मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं नीचे गिर गई। अब केवल मेरा सिर बाहर था। मैंने उठने की कोशिश की लेकिन उठ नहीं पाई,घुटनों पर दबाव के कारण फिर से गिर गई। मेरे आसपास कोई नहीं था, जिसे आवाज़ देकर सहायता माँग लेती।सागर में नहाता हुआ सूरज भी आगे बढ़ गया था। थोड़े ही समय में कितनी ही लहरें मेरे ऊपर से निकल गईं ।हर बार लगता ये लहरें मुझे निगल जाएँगी।मृत्यु की शंका मुझे भयभीत करने लगी। मुझे इस दुनिया का मोह, उत्तरदायित्वों का भँवर अपनी ओर खींचने लगा और मैं लहरों की तरह उठती गिरती रही।
    मैं प्रकृति का उत्सव देखने आई थी लेकिन मृत्यु के भय ने सब कुछ भुला दिया
           मुझे तैरना नहीं आता फ़िर भी मैं उठने की अपेक्षा  पानी में लेट कर हाथ -पाँव मारने की कोशिश करने लगी।मेरी कोशिश कामयाब होने लगी।मैं पहली लहर के साथ आगे बढ़ी।दूसरी लहर के साथ थोड़ा और आगे हुई और फिर धीरे -धीरे मैं उनके साथ साथ किनारे की ओर बढ़ने लगी थी। मेरे प्रयास  ने मुझे किनारे पर पहुँचा दिया जहाँ जीवन खड़ा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने सागर को ओर देखा, लहरें अब भी अठखेलियाँ कर रही थी। किरणों ने अपना सौन्दर्य खो दिया था और अब उष्मा दे रही थीं। प्रकृति वैसे ही मुस्कुरा रही थी। मैं सागर के किनारे बालू पर निढाल लेट गई।मृत्यु मेरे पास से निकल गई थी;  लेकिन उसका अहसास मेरे अन्तर्मन को अभी भी छू रहा था। मृत्यु जीवन का सत्य है और मोह जीवन का भँवर है, मृगतृष्णा है।

मृत्यु का डर
मृत्यु से भयावह
डराता मन।

-0-सुदर्शन रत्नाकर , -२९,नेहरू ग्राउण्ड ,फ़रीदाबाद १२१००१
मोबाइल ९८११२५११३५

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

922



1-सेदोका
कृष्णा वर्मा
1
नई उम्रों की
देख ख़ुदमुख्तारी
रुष्ट हो गए राम
कतरे पर
ताले उड़ान पर
लो भुगतो अंजाम।
2
कोरोना काल
भक्ष रहा बंदों को
क़ायनात बेहाल
मन हैरान
आलमी  ज़ाब का
कैसे होगा  निदान।
3
टोह न चाप
भोंका कोरोना का
खंजर चुपचाप
मिले सबक़
मूरख बंदे तुझे
चली वक़्त ने चाल।
4
कैसी बीमारी
किसी से भी मिले तो
ज़ा मिलेगी भारी
की जो कोताही
लील लेगा विषाणु
मचाएगा तबाही।
5
कहो कोरोना
कब तक रहेगा
सितम ये तुम्हारा
क्षमा दान दो
बख़्शो इस जग को
अहसान करदो
6
बाँधा स्त्री को
सीमित कीं सीमाएं
तुम कैसे अंजान
परिधि-घिरी
अविरल विशाल
छोड़ो बुनना जाल।
7
सब्ज़ पत्तों पे
मौसम का क़हर
ज़र्द दोपहरियाँ
तपे पहर
पी रहीं उदासियाँ
जुदाई का ज़हर।
8
अंजाम नहीं
होता बेकरारी का
फिर भी बेकरार
इंसा बहता
अपनी रवानी में
दरिया रवानी- सा।
9
सह न पाया
तुम से मिली ईर्ष्या
नफ़रत दुत्कार
लौटा रहा हूँ
शब्दों में पिरोकर
लय- तुक के साथ।
-0-
2-ताँका
अर्चना राय
1
मन-विहग
विचरे अविराम
अनंत चाह
उत्कंठित ढूँढता
गूढ़-सा ब्रह्म ज्ञान। 
-0-

शनिवार, 27 जून 2020

920


ज्योत्स्ना प्रदीप  
1
ये  प्रीत निराली है 
पग  पायल  बाँधी 
कितनी मतवाली है ।
2
जब मोहन मीत बना 
पायल की छम- छम 
बिरहा का गीत बना ।
3
माना  मैं ना  मीरा  
तेरा  नाम    लिए 
मन को  मैंने चीरा ।
4
राधा -सा  भाग  नहीं 
तुझसे   मिलने  की 
क्या मुझमें आग नहीं
5
अब श्याम  सहारा दो 
 तुम बिन  नाच रही 
 सुर  की नव - धारा दो ।
6
मीरा ना  राधा  हूँ 
तेरा   नाम  लिया 
बोलो क्या बाधा हूँ
7
मन में तुम आते हो  
मन - केकी  नाचे 
जब सुर बरसाते हो 

8
मोहन  वो  लूट गया   
पायल  का  मोती 
उसके  दर  छूट गया !
9
पीड़ा अब अठखेली 
मेरी पीर सभी
खुद मोहन ने  ले लीं 
-0-

शुक्रवार, 26 जून 2020

919


बेंच की पीठ
डॉ.पूर्वा शर्मा
          इस बार गर्मी की छुट्टियाँ समय से पहले ही आरंभ हो गई और अब खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही । कितना सूना-सूना लग रहा है पूरा स्कूल परिसर, मेरा तो मन ही नहीं लग रहा । कक्षा में रखी एक कुर्सी ने इतना कहकर अपना मुँह लटका लिया । उसे उदास देख ब्लैक बोर्ड ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा - अरे यूँ तो मुझे अच्छा नहीं लगता कि सब मुझ पर दिनभर चाक रगड़ते रहें,  पर हाँ ! इस बार तो मैं भी अकेला महसूस कर रहा हूँ । इससे अच्छा तो वहीं था जब सब मुझे चीरते रहते थे । कोने में पड़ा कचरे का डिब्बा जो आम दिनों में हरदम पेंसिल के छिलकों, टूटे पेन की निब/ रीफिल एवं काग़ज़ों के टुकड़ों आदि से खचाखच भरा रहता था, उसने झाँकते हुए अपने खाली पेंदे को ध्यान से देखा । लाट एवं पंखे चालू-बंद करने वाला स्विच वाला बोर्ड तो जैसे रोनी-सी शक्ल लेकर दीवार के सहारे खड़ा था, उसकी खटकों की आवाज़ सुनने के लिए तो कई बार बच्चे झगड़ पड़ते थे । उस रेग्युलेटर का कान मरोड़ने में तो सब माहिर थे, पर आज उस पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा । सब एक दूसरे का मुँह ताकते लगे फिर सभी कक्षा के बाहर झाँकने लगे । बाहर का वातावरण भी कुछ खास नहीं था ; बास्केट बॉल कोर्ट, म्यूजिक-डांस रूम, लेब, खेल का मैदान, बगीचे के खाली झूले आदि को देखकर सभी को ऐसा लगा , मानो पृथ्वी पर प्रलय आया हो और सब कुछ खत्म हो गया हो । कहीं कोई हलचल नहीं, कोई शोर नहीं और कहीं पर भी वो ............नन्हे शैतान भी नहीं । इतने में इस सूनेपन को तोड़ते हुए और अपनी अकड़ी पीठ सीधी करते हुए बेंच ने बोला – पता नहीं इस कोरोना के चक्कर में न जाने और कितने दिन यूँ ही बीतेंगे......
     बंद है स्कूल
    कौन थपथपाए ?
   बेंच की पीठ


मंगलवार, 23 जून 2020

918-पिता

      
पर्वत से बहता मीठा झरना

 अनिता ललित
    
पिता! –इस शब्द में ही घने पेड़ की छाँव का एहसास होता है! एक ऐसा पेड़, जो सर्दी-गर्मी, लू-धूप-आँधी-तूफ़ान-बरसात, मौसम के हर तेवर को सहते हुए, अडिग खड़ा रहकर, अपने साये में अपने परिवार को समेटे रहता है, उन्हें हर मुसीबत से बचाता है! बाहर से दिखने में कठोर मगर भीतर से एकदम कोमल –जैसे विराट पर्वत से बहता हुआ झरना, जैसे ठोस नारियल से निकला मीठा पानी! –बस इतनी सी ही होती है ‘पिता की कहानी’!
      जिस तरह माँ, अपनी जी-जान न्योछावर करके, घर का मोर्चा संभाले रहती है, उसी तरह पिता, बाहरी दुनिया से तारतम्य बिठाकर, हर ऊँच-नीच को झेलकर, अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं, उन्हें सुरक्षा देते हैं! बच्चों या परिवार पर कोई आफ़त आए, उसके पहले ही पिता ढाल बनकर उसे अपने ऊपर ले लेते हैं! वह बच्चों को इस कपटभरी दुनिया से निपटने के तैयार करते हैं! बच्चों के सिर पर पिता का हाथ होने भर से ही बच्चों में असीम शक्ति एवं आत्मविश्वास का संचार होता है तथा उनका व्यक्त्तित्व निखर के सामने आता है! पिता-विहीन बच्चों का बचपन और मासूमियत कठिन हालात के धरातल से टकराकर खो जाते हैं! उनको कई तरह के मानसिक व शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है!
     माँ का समय तो बच्चों के साथ प्यार-दुलार में हँस-बोलकर कट जाता है, परन्तु स्वार्थी दुनिया के बीच रहकर काम करते-करते, अक्सर पिता का स्वभाव कड़क, और व्यव्हार रूख़ा हो जाता है! इसके अतिरिक्त, माँ के लाड़-प्यार से बच्चे कहीं बिगड़ न जाएँ, इसलिए घर में अनुशासन बनाये रखने की ज़िम्मेदारी भी अमूमन पिता ही निभाते हैं! जिसके परिणामस्वरूप, कई बार डर के कारण, बच्चे, पिता से एक भावनात्मक दूरी बना लेते हैं! पिता के पास तो बच्चों के साथ खेलने-दुलारने का वक़्त भी नहीं होता! वे तो अपने बच्चों के लिए ऐशो-आराम के साधन जुटाने की धुन में स्वयं को ही बिसरा देते हैं! बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना, उनकी इच्छाओं एवं ज़रूरतों को पूरा करना, उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करना और फिर धूमधाम से उनका विवाह कर देना –इन्हीं सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में, पिता अपने जीवन के सभी सुखों को तिलांजलि दे देते हैं! जब तक उनके ये सपने पूरे होते हैं, तब तक उनके शरीर के पुर्ज़े घिस चुके होते हैं व बच्चे उस घोंसले से फुर्र हो चुके होते हैं! –आख़िर उन्हें भी तो अपने आशियाने का निर्माण करना होता है! अंत में उनका साथ निबाहने को रह जाती है -थकी-हारी उनकी पत्नी, जो स्वयं अब तक अधेड़ावस्था की कई बीमारियों से ग्रसित हो चुकी होती है! बाहर की दुनिया से अब उनके तार कट चुके होते हैं, और अब, जब उन्हें सहारे की आवश्यकता होती है, तो उनकी धुँधला चुकी आँखों पर वक़्त का मोटा चश्मा व हाथ में छड़ी आ चुकी होती है –परन्तु आसपास कोई नहीं होता! ऊपर से कभी सख्त़-मिज़ाज दिखने वाले पिता, ढलती उम्र के इस मोड़ पर बहुत बेबस और बेसहारा हो जाते हैं! वे माँ की तरह आँसू बहाकर या दिल के जज़्बात को शब्दों में पिरोकर, ज़बान से कुछ नहीं कहते मगर उनके सीने में भी ममताभरा दिल होता है, जो किसी को दिखाई तो नहीं देता, मगर अपने बच्चों के सानिध्य के लिए बेहद तरसता है!
        जिन कँधों पर उसका बचपन पला, जिन बाँहों ने उसे झूला झुलाया, अपने उस जन्मदाता, उस पालनहार का ऋण, कोई औलाद पूरा तो कभी नहीं चुका सकती, मगर कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि ज़िन्दगी के आख़िरी पड़ाव पर उन्हें अकेलेपन और अवसाद से जूझने के लिए कभी न छोड़े!
बहुत  ख़ुशनसीब होती हैं वे औलादें जिन्हें स्वयं अपने पिता एवं माँ की आँखें और छड़ी बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है!

घनी है छाँव
पिता के कन्धों पर
बच्चों का गाँव!

बनके देखो
कभी छड़ी औ चश्मा -
सुकूँ की ठाँव!
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