बुधवार, 10 अगस्त 2022

1060

 अनिमा दास

1.

ऐसे क्या कहा

जो असहनीय था

काया से पृथक था

घृणा के शब्द

समाज न समझा

अंतस निःशब्द था ।

2.

साथी एक तू

भाग्य में सौभाग्य सा

घना वृक्ष पथ का

है संपूर्णता

संघर्षमय जग

नहीं है अपूर्णता।

3.

मृण्मय मूर्ति

अवरुद्ध कपाट

प्रश्नवाची कामना

व्यर्थ याचना

न पहुँचता स्वर

व्यर्थ है आराधना।

4.

एक कली- सी

हुई विकसित भी

किन्तु मुरझाई- सी

गुप्त अभीप्सा

बह गई स्वार्थ में

इच्छित मृत्यु जैसी।

5.

सांध्य वर्तिका

बुझती जा रही क्यों

दीप से क्या है रोष

श्वास में विष

वन का है विलाप

मूक प्राणी का दोष।

6.

दे दो विषाद

अवसाद व मृत्यु

अश्रु व दग्ध नभ

मौन रहेगी

इरा की आत्मा सदा

होगा इंदु निष्प्रभ।

7.

प्राण प्रत्यूष

कुहासों में है डूबा

तिक्त हुआ हृदय

विश्वास -रेखा

मिटती रही अब

ध्वस्त है स्वप्नालय।

8.

अनुरोदन

मिथ्या प्रयास मात्र

प्राणी-प्राण निमिष

कर ध्वंसित

वन उपवन,स्वार्थी

पिलाता रहा विष।

9.

मध्य निशिता

मंथर श्वास में सिक्त

लिखती है कविता

क्षुधित गर्भ

दरिद्रता में ढूँढे

एक नव सविता।

10.

प्रश्न में लुप्त

है जीवन दर्शन

अंतर्मन है रिक्त

निरुत्तर मैं

करूँ क्या अन्वेषण

जब है जग तिक्त।

-0-हिंदी सॉनेटियर, कटक, ओड़िशा

2-भीकम सिंह 

 

मेघ- 6

 

गन्ने चूसना 

अबकी बार मेघ !

पौष में आना 

पार साल रबी में 

विलम्ब हुआ 

सुनहरे गेहूँ की

मुस्कान मरी 

कर देना अबके 

तु हरी - भरी 

पलेवा करा जाना 

भटक मत जाना  

 

मेघ- 7

 

रिमझिम के 

काले मेघ उड़ाने 

पछुवा आँधी 

कभी-कभी आ जाती 

तोड़- ताड़के 

तरुदल की पाँति

हर रस्ते की 

बाधाएँ बन जाती 

शिला की भाँति 

उसका पक्ष लेता 

मेघ ! बने हिमाती  

 

मेघ- 8

 

नभ के मेघ !

स्वर्ग की लिए छटा 

नीचे ज्यों आती 

मनहर- सी घटा 

उसे देखके 

मानस का मयूर 

भूल जाता है 

उलझा दुःख- दर्द 

नाचे -बेपर्द 

अनंत-सी प्यास में 

जीवन की आस में  

 

मेघ  - 9

 

तुझे पुकारे 

अरबों के ऊपर 

नीले नभ के 

काले-श्वेत विभोर !

नदी का बल 

गिरा,  जल का तल

इस पर भी 

शीतल हवाओं की

तु लेता फिरे 

मृदुल- सी हिलोर 

सोचनाइस ओर  

 

मेघ- 10

 

धरा को भूला

मेघ के भूगोल में 

उलझा हुआ 

समूचा आसमान 

कोई ना गिने 

मेघ के टुकड़ों को

ना कोई देता 

राजस्व पर ध्यान 

अगर होता 

वहाँ कोई किसान 

उगा ही लेता धान  

 

मेघ- 11

 

धरा की प्यास 

बूँदों से उतरी है 

मेघों के साथ 

जलयुक्त कणों से 

रिसी ये बात 

एक टुकड़ा मेघ

जो था शायद 

वामपंथी सोच का

झोंपड़ी तक

बूँदें लेकर गया 

वादा देकर गया  

 -0-


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

1059

 मैं माँ हूँ तेरी!!

रश्मि विभा त्रिपाठी

 शाम का वक्त था। मैं रोजमर्रा के काम में उलझी हुई थी। फोन की घंटी बजी। कमरे में आक फोन अटेंड किया

  'नमस्ते मौसी! कैसी हो?'

मुझे जैसे कोई गढ़ा खजाना मिल गया- 'मैं बहुत अच्छी हूँ और तुम्हारी मीठी आवाज सुनने के बाद तो बहुत ही खुश हूँ। तुम अपने बारे में बताओ। कैसी हो?'

'मैं ठीक हूँ' उसकी दबी- सी आवाज ने मुझे बेचैन कर दिया। मैं छटपटा गई- 'क्या हुआ तुम्हें? कुछ हुआ है क्या? कोई बात हुई? किसी ने कुछ कहा?'

'नहीं। स्कूल से आते हुए रस्ते में बारिश में भीग गई थी; इसलिए गला खराब हो गया।'

मैं अभी भी आश्वस्त नहीं थी- 'सच- सच बताओ! यही बात है ना या...'

बोली- 'हाँ मौसी! सच में भीग गई थी।'

'छतरी नहीं है तुम्हारे पास? मैं तुम्हारे लिए रेनकोट, छतरी लेकर रख लूँगी।'

उसने पूछा- 'कब आओगी'

मैंने कहा- बहुत जल्दी'

बातों- बातों में बोली- 'आपको पता है! यहाँ मेरा अपना कोई नहीं! सब मेरी मम्मा की बुराई ही करते हैं। न जाने क्यों पापा ने दूसरी शादी कर ली? सात साल बाद एक बेबी भी कर लिया। पहले तो मेरी बात भी सुनते थे, पर अब तो ध्यान ही नहीं देते।' और भी न जाने कितनी बातें उसने मुझसे एक साँस में कह डालीं।

मैं अवाक् थी। दीदी जब उसे छोड़कर गई तब वह सिर्फ दो बरस की थी। जो कुछ मैं उसके बड़े होने पर उसे बताना चाहती थी, उस किस्से का एक बड़ा हिस्सा आज व मुझसे बाँट रही थी।

मैं सुन रही थी और व लगातार बोले जा रही थी- 'पता है आपको! मैंने मम्मा का एक छोटा- सा फ्रेम बनाकर उनके रूम में रखा है। वो बहुत चिढ़ती है देखकर। उनकी अलमारी में अपनी बेटी के कपड़े रखती है वह और तो और...'

'मेरी बात सुनो! तुम इन सब बातों को भूलकर सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम्हें अपनी मम्मा का सपना पूरा करना है। याद है ना तुम्हें?'

तपाक से बोली- 'हाँ याद है मुझे। आपने बताया था। एक दिन मेरे स्कूल में टीचर ने सब बच्चों से पूछा था- तुम क्या बनना चाहते हो? तो मैंने उन्हें बताया- डाक्टर।'

अचानक से उसने कहा- 'कल रात को मैं पढ़ाई करके बेड पर लेटी, तो उसने जाक सबसे शिकायत कर दी कि मैं चादर बिगाड़ देती हूँ, सोफे पर बैठूँ तो उसका कवर खींच देती हूँ फिर सबने मुझे बहुत डाँटा कि अगर लेटना और बैठना है,  तो कायदे से, वरना जमीन पर लेटो। य सब कुछ मेरे नाना का है। अगर आज मम्मा होतीं, तो कोई मुझे कुछ भी नहीं कह पाता। मैं उनको याद करके बहुत रोई। मेरी आँखें भी सूज गईं। मुझे आपकी भी बहुत याद आई। आप जल्दी आना।'

अपने फटे कलेजे की पीर दबाकर मैंने सहज होने की कोशिश की- 'मैं हूँ ना? कभी भी दुखी मत होना मेरे बच्चे। मैं तुमसे कहीं दूर गई ही नहीं। हर पल तुम्हारे पास हूँ ! बस तुम खुश रहो।'

उसका प्यार बरसाती नदी की तरह उमड़ने लगा- 'आई लव यू मौसी।'

1

रात अँधेरी!

छाती से चिपट जा

मैं माँ हूँ तेरी!!

2

आँसू पी जाऊँ

मैं फिर से जी जाऊँ

तू जो हँस दे!!

-0-


गुरुवार, 4 अगस्त 2022

1056-जब नाम पुकारा है

 

 रश्मि विभा त्रिपाठी

1
जब नाम पुकारा है
प्रिय का प्रेम मुझे


देता हरकारा है।
2
तुमको ऐसे पाया
तन के संग जुड़ी
रहती है ज्यों छाया।
3
बस प्यार निबाहूँ मैं
बिन तेरे कुछ भी
बिधि से ना चाहूँ मैं।
4
अपना तो इक मन है
टूटेगा कैसे
साँसों का बन्धन है।
5
प्राणों की है थाती
तेरी प्रीति प्रिये
सौ- सौ सुख बरसाती।
6
जादू- सा कर देते
तुम हौले हँसके
मेरा दुख हर लेते।
7
मुझको सबसे प्यारे
जगमग मैं तुमसे
आँखों के तुम तारे।
8
माही की मधु बानी
सब दुख हर लेती
सचमुच शुभ वरदानी।
9
माही की दो बातें
सुनकर मैं पाऊँ
सुख की सब सौगातें।
10
मन की किसने जानी
मेरी पीर सदा
तुमने ही पहचानी।
11
तुमको जबसे पाया
मन के मरुथल में
मधुमास नया आया।

12

बरसों की आदत है

कैसे भूलूँ मैं

तू खास इबादत है।




बुधवार, 3 अगस्त 2022

1055-मेघ

 

भीकम सिंह 

 

मेघ -1

 

बाद में देना 

यक्षिणी को संदेश 

कालिदास के

पुष्करावर्त मेघ !

पलभर को

ठिठककर देख

हमारे खेत

सूखी दरकी मेड़ 

तुझे गुहारे 

धान की पौध पड़ी

आँखें तुझपे गड़ी 

 

मेघ-2

 

कालिदास के 

पुष्करावर्त मेघ 

यक्ष वाले हो

या मालवा पे रुके

भटके मेघ

वो, रामगिरि वाले

कौन हो तुम 

जो सूखे खेतों पर

अफवाहों की

कुछ घटाएँ ताने

कड़कना ही जाने ।

 

मेघ- 3

 

इतना ढीठ

बना क्यों सत्यानाशी 


मेघ कपासी !

क्यों उड़वा रहा है 

खेती की हाँसी 

जाने कित्ते किसान 

चढ़के फाँसी 

पहुँच गए काशी 

फिर भी तेरी 

अँखियाँ सकुचाती

बरस नहीं पाती 

 

मेघ- 4

 

घर - बाहर

खाली पड़ी है सब

भात -पतीली 

केवल रहती हैं

अँखियाँ गीली 

होती है तेरी बात 

जल के  अति 

सूक्ष्म कणों के पुंज  !

सुन ली गूँज 

रिम झिम भी सुणा 

प्यासा है खेत घणा 

 

मेघ- 5

 

क्षितिज पर 

कोलाज की तरह

या फिर एक

आवारा की तरह

हवा के साथ 

घूमते देखा मैंने 

मेघ  ! तुमको 

किन्तु प्यासी धरा को 

नदी भरोसे 

क्षीण धार पे छोड़ा

यहाँवक़्त दो थोड़ा 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

नदी

 

भीकम सिंह

 

नदी  - 13

 


कुछ पहाड़
 

बहुत-सी नदियाँ 

वक्त के साथ 

ठोकरें खाते रहे 

गाँव- जवार

तमाशा बने रहे 

शहर सभी 

ऊँचे-ऊँचे उठके 

हवा के साथ 

बनाने लगे बात 

घुमा-घुमाके  हाथ ।

 

नदी  - 14

 

आजकल में 

गंगा पे होने लगी 

बिना बात के 

ये बात कैसी- कैसी 

हस्तिनापुर

करता खुलेआम 

ऐसी की तैसी 

नमामि गंगे से भी 

सुधरे नहीं

नालों की जात ऐसी

गंगा, वैसी की वैसी 

 

नदी  - 15

 

बीहड़ नदी 

पहाड़ से निकली 

आवेग में ज्यों 

पानी का वेग खोला

तटों के गिरे

सारे गठरी-झोला 

पेड़ों ने कुछ 

सँभाले फटे-टूटे 

कुछ को रोका 

लग्गी लगा-लगाके 

खड़े मान बचाके 

 

नदी- 16

 

नदी खुद को 

आज और कल में 

गँवाती रही 

नालों के दिये जख़्म

छिपाती रही 

बारिशों में  नहाके

जीने के पल

सागर को मगर

दिखाती रही 

वो सौन्दर्य अपना 

झूठ बोले कितना