गुरुवार, 21 मार्च 2013

मन गीला है अभी,


प्रियंका गुप्ता
1
तेरा यूँ जाना
बेचैन कर जाता
अपनो के बीच भी,
अकेलापन
मन को जैसे डँसे
अब आ भी जाओ न !
2
ख़्वाब जो टूटे
किरचें चुभती हैं
मन गीला है अभी,
उस चोट से
जो दिखी न किसी को
तू भी न जान सका ।
3
याद में तेरी
अब रोती नहीं हूँ
बस सोचा करती,
क्या तुम आके
पोंछ दोगे ये आँसू
अपनी आस्तीन से ?
4
खामोशियाँ हैं-
दिल के आँगन में
सन्नाटों की आवाज़
दूर तलक
सुनाई दे जाएगी
गर दिल से सुनो ।
5
ज़माना कभी
हँसने नहीं देगा
अपनी राह चुनो,
किसी की खुशी
उसे नहीं पसन्द-
बेपरवाह बनो ।
6
ग़ैरों से कैसा
शिकवा है करना
अपने ही तलाशें,
आसान रास्ता
राह में तेरे रोड़े
अटकाने के वास्ते ।
7
मन का पाखी
जाने किस डाल पे
कब जाकर बैठे,
खुद परखो
डाल की मजबूती
भरोसा न तोड़ दे ।
-0-

बुधवार, 20 मार्च 2013

सुमन खिलें



19मार्च को  आदरणीय रामेश्वर जी का जन्म दिन था । त्रिवेणी के रचनाकारों  तथा पाठकों की ओर  से हार्दिक बधाई । हम सब दुआ करते हैं कि आपकी कलम हर -दिन नए शिखर पर पहुँचे । मैं अपने शब्दों की भेंट प्रस्तुत कर रही हूँ ।

1
तेरे आँगन  
किरणों के उजाले 
भोर गुलाबी 
उड़ती चली आए 
नन्हे पंख फैलाए ।
2
सुमन खिलें 
कण -कण महके 
जीते तू नभ 
इन्द्रधनुषी रंग 
बिखरे तेरे मन।

डॉ हरदीप कौर सन्धु 

मन की झील


डॉ• भावना कुँअर
1

लहर आती
किनारों के कान में
चुपके -से ,हौले -से
न जाने क्या-क्या
कहकर है जाती
है सबसे छिपाती।



2

किरणें आज
गुदगुदाती जाएँ
सागर के तन को
सूर्य बुलाए
मंद-मंद मुस्काएँ
वापस ही न जाएँ।


3
मन की झील
शान्त थी बरसों से
कौन पथिक आया !
प्रेम-काँकर
फेंक इसमें,भागा
हाथ ही न आ पाया।
4
वक्त ने मुझे
बेबस ऐसा किया-
जलाया था मैंने जो
प्रेम का दीया
छोटी -सी इस लौ ने
जीवन जला दिया।
5
तूने ही दिए
अनगिनत ख्वाब
मेरी इन आँखों में,
पर क्या किया?
ख्वाबों के संग-संग
बेरौनक हुई अँखियाँ ।
6
आँखों में एक
बसा था सुरूर- सा
चिंगारियों से भरा
एक अदद
है कौन कमज़र्फ
ये जहान दे गया।
7
सहेजे रखी
जो बरसों से मैंने
यादों की पिटारियाँ
अचानक यूँ
एक निकल भागी
जा माँ के गले लगी
8
मन की बात
है छिप जाती कभी
सर्दी की धूप-जैसी
लहरों -संग
उछल जाती कभी
नन्ही मछलियों- सी।
9
मन की बात
लिख न पाए कोई
अठखेलियाँ करें
ये नटखट
चंचल लहरों -सी
ख्वाबों पे पहरे- सी।

10
दर पे मेरे
छोड़ी है किसने
दर्द भरी पोटली?
जादू भरी -सी
निकालूँ,थक जाऊँ
खत्म न कर पाऊँ।
-0-

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

बरसूँ सरसाऊँ |


1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
जलधारा -सी
उतरूँ जो निर्मल
तृषित धरा
संग में हरषाए
मुदित मना गाए  ।
2
मैं बदरी -सी
अम्बर में छा जाऊँ
तपा सताए
रवि- कर निकर
बरसूँ सरसाऊँ |
-0-
2-अनिता ललित
1
चढ़ो गर तो...
चंद्रमा की तरह...
कि खिल सको...
नज़रों में सबकी
ज्यों शीतल चाँदनी..!

2
ढलो गर तो..
सूरज की तरह...
कि टिक सको
नज़रों में सबकी
ज्यों लालिमा सिंदूरी 
 ।