शनिवार, 14 दिसंबर 2013

जीवन जिया (चोका)

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जीवन जिया
खुद को ही हमने
दण्डित किया
लगता जैसे कोई
ग़ुनाह किया ।
रस्मों के जाल  फँसे
बेड़ियों बँधे
अपनों के वेष में
व्याल ही मिले
सींची जो प्यार से वो
विषबेल थी
कंटक मग बिछे
पग में चुभे
लहूलुहान हुए
चलते रहे
थके, ढलते रहे
जान पाए ये-
हमें जो मीत मिले,
छलते रहे
छलनी हुआ मन
साँझ हो गई
जीवन की मिठास
कहीं खो गई ।
अनजाना बटोही
बाट में मिला
मन-मरुभूमि में
ज्यों फूल खिला
तप्त तन मन को
उसने छुआ
लगता जैसे कोई
जादू-सा हुआ
सीने से लगाकर
ताप था हरा
दर्द सारे पी गया
बुझता दीप
नेह मिला जी गया।
अब तो बची
मीत चाह इतनी-
जब जाना हो
अगले सफ़र में
तेरा  हाथ हो
सिर्फ़ मेरे  हाथ में
माथा तु्म्हारा
चूमकर अधर
बन्द हों जाएँ,
मेरी आँखों में मीत
तेरा हो रूप
दूर लोक जाएँगे
तुम्हें हम पाएँगे ।

-0-

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

तोलो फिर कुछ बोलो



डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा
1
कवि ऐसे मत डोलो
अर्थ अनर्थ करे
तोलो फिर कुछ बोलो
2
क्या बात लगी करने
बादल से धरती
फिर पीर लगी झरने
3
देंगें तो क्या देंगें
ग़म के शोलों को
वो सिर्फ हवा देंगें
4
अब यूँ न विचर तितली
धूप यहाँ ...दिन में !
कल डर-डर कर निकली
5
ऐसे न किरन हारी
जीत गई तम से
सूरज था सरकारी
6
उफ़ !आज हुआ बेकल
सुन-सुन के सागर
ये नदिया की कल-कल
-0-

शनिवार, 30 नवंबर 2013

मन की बात



डॉ भावना कुँअर
1
वक्त ने मुझे
बेबस ऐसा किया-
जलाया था मैंने जो
प्रेम का दीया
छोटी -सी इस लौ ने
जीवन जला दिया।
2
तूने ही दिए
अनगिनत ख्वाब
मेरी इन आँखों में,
पर क्या किया?
ख्वाबों के संग-संग
बेरौनक हुई अँखियाँ ।
3
आँखों में एक
बसा था सुरूरसा
चिंगारियों से भरा
एक अदद
है कौन कमज़र्फ
ये जहान दे गया।
4
सहेजे रखी
जो बरसों से मैंने
यादों की पिटारियाँ
अचानक यूँ
एक निकल भागी
जा माँ के गले लगी
5
मन की बात
है छिप जाती कभी
सर्दी की धूप-जैसी
लहरों -संग
उछल जाती कभी
नन्ही मछलियों- सी।
6
मन की बात
लिख न पाए कोई
अठखेलियाँ करें
ये नटखट
चंचल लहरों -सी
ख्वाबों पे पहरेसी।
7
दर पे मेरे
छोड़ी है किसने
दर्द भरी पोटली?
जादू भरी -सी
निकालूँ,थक जाऊँ
खत्म न कर पाऊँ।
8
बिखरी चीज़ें
हैं दिला रही याद
बीते हुए पलों की
सँभाले रखी
यादों की टहनियाँ
प्रेम न रख पाए।
9
शोर मचाएँ
उमड़ते ये आँसू
कोई न सुन पाए
पर चाँदनी
सहेजती  ही जाए
झरते मोतियों को  ।
10
धूप-सी खिली
अँधेरों को चीरती
वो मोहक मुस्कान
हर ले गई
गमों के पहाड़ को
मिला जीवन –दान
-0-

रविवार, 24 नवंबर 2013

दिल के राज (सेदोका)

रेनु चन्द्रा

1.
सफेद पोश 
सामने फिरते हैं
भीतर से देखो तो
काले  होते हैं
जपते राम नाम
कत्ल वो करते हैं ।

2.
जीवन जीते
अंधेरी गलियों में
फिर बढ़ता जाये
घोर अंधेरा
संतप्त मानव को
फिर प्रश्नों ने घेरा ।
-0- 


शशि पुरवार

१ 
धवल वस्त्र 
पहन इठलाये 
मन के कारे जीव 
मुख में पान 
खिसियानी हंसी 
अनृत कहे जीभ।  
२ 
भोले चेहरे 
कातिलाना अंदाज 
शब्द  गुड की डली 
मौकापरस्त 
डसते  है जीवन 
इनसे दूरी भली।
सांचा है साथी  
हर पल का साथ 
कोई बुझ न सका
दिल के राज
विषैला हमराही  
आस्तीन का है साँप।
 -0-